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भागवत के ‘मुसलमान और हिंदुत्व’ पर दिए गए बयान पर क्या कहते हैं विश्लेषक?

भागवत के इस बयान की अलग अलग व्याख्या हो रही है. सब इसके अलग अलग मायने निकाल रहे हैं. कोई इसे संघ की छवि बदलने की कवायद बता रहा है तो कोई इसे साल 2019 के चुनावों से जोड़ रहा है.

नई दिल्ली: आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने दिल्ली में आयोजित 'भविष्य का भारत' कार्यक्रम में साफ किया कि इस देश में मुसलमान नहीं रहेंगे, तो ये हिंदुत्व नहीं होगा. भागवत ने कहा, ''हम कहते हैं कि हमारा हिंदू राष्‍ट्र है. हिंदू राष्‍ट्र है इसका मतलब इसमें मुसलमान नहीं चाहिए, ऐसा बिल्‍कुल नहीं होता. जिस दिन ये कहा जाएगा कि यहां मुस्लिम नहीं चाहिए, उस दिन वो हिंदुत्‍व नहीं रहेगा.''

भागवत के इस बयान की अलग अलग व्याख्या हो रही है. सब इसके अलग अलग मायने निकाल रहे हैं. कोई इसे संघ की छवि बदलने की कवायद बता रहा है तो कोई इसे साल 2019 के चुनावों से जोड़ रहा है. इस मुद्दे पर संघ की विचारधारा से सहानुभूति रखने वाले संगीत रागी और वरिष्ठ पत्रकार अभय कुमार दूबे ने अपनी-अपनी तरह से व्याख्या की है.

प्रोफेसर और संघ विश्लेषक संगीत रागी का क्या कहना है? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने मुस्लिमयुक्त हिंदुत्व की व्याख्या कर सबको चौंका दिया है. कई ने इसमें से उपसंहार निकाला कि संघ शायद बीजेपी से किनारा कर रहा है. एक व्याख्या ये भी है कि संघ ने समाज में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने और अपनी उग्र हिंदुत्व की छवि को सुधारने के लिए ये कहा है. कुछ विश्लेषक का यह भी मानना है कि संघ ने नई युवा पीढ़ी को साधने के लिए यह कवायद की है. जितने विश्लेषक उतनी बातें. ये ठीक भी है. लेकिन संघ को जानने वाले यह अच्छी तरह से जानते हैं कि मोहन भागवत ने हिंदुत्व की उसी व्याख्या को आगे बढ़ाया है जो संघ के विचार का मूल केंद्र रहा है. उसमें थोड़ा भी बदलाव नहीं है. न ही कुछ अलग कहा है. संघ प्रमुख ने संघ के खिलाफ उसके हिंदुत्व की गलत प्रचार से उपजे आशंकाओं का निदान किया है और हिंदुत्व के दार्शनिक और मौलिक चिंतन को सबसे सामने रखा है.

संघ प्रमुख की तरफ से मुसलमानों को भी हिंदुत्व का भाग बताना कहीं से भी अतिश्योक्ति नहीं है बल्कि हिंदुत्व के दार्शनिक आधार के अनुरूप है. विश्व में पाए जाने वाले सभी धार्मिक दर्शनों में से मात्र हिंदुत्व ही एक ऐसा दर्शन है जो न केवल विविधताओं से भरा हुआ है बल्कि उन सभी विविधताओं के समावेशन का दम भी रखता है. हिंदुत्व का दार्शनिक आधार ही उपासना की सभी पद्धतियों का सम्मान है, जो इसके बहुलवादी स्वरुप का परिचायक है. इसमें चयन की स्वतंत्रता है, जिसके तहत आप कोई भी आराध्य चुन सकते हैं और उसके उपासना की पद्धति भी चुन सकते है. विश्व में मात्र हिंदुत्व ही एक ऐसी पद्धति है जो आस्तिकों के साथ साथ नास्तिकों को भी न केवल अपने दर्शन में समावेशित करती है बल्कि उनके प्रति सम्मान का भी भाव रखती है.

हिंदुत्व कोई सजातीय दर्शन नहीं है बल्कि विजातीयता और भिन्नता इसकी पहचान रही है. वैचारिक भिन्नता को संवाद के द्वारा दार्शनिक समरूपता में बदलना हमेशा से आर्यावर्त की एक समृद्ध परंपरा रही है. संघ प्रमुख का संबोधन और संवाद का यह प्रयास उसी परंपरा का निर्वहन है. चूंकि हिंदुत्व दर्शन सभी आराध्यों और उपासना की सभी पद्धतियों के सम्मान में निहित है अतः किसी भी उपासना या आराध्य के प्रति द्वेष रखना खुद हिंदुत्व के मूल्य से पलायन होगा. दूसरे शब्दों में, मुस्लिम ही नहीं बल्कि प्रत्येक वह व्यक्ति, संगठन या दर्शन हिंदुत्व का भाग नहीं हो सकता जो दूसरी दार्शनिक पद्धतियों को स्वीकार्य नहीं करें.

आज जो लोग हिंदुत्व के समावेशी दर्शन को बिना जाने समझे एकतरफा रूप से दोष-प्रत्यारोप करते हैं, उनके लिए संघ प्रमुख का वक्तव्य सत्यता का बोधक हो सकता है. हिंदुत्व कभी भी दार्शनिक श्रेष्टता का दावा नहीं करता बल्कि दार्शनिक बहुलता की वकालत करता है. वर्तमान में समस्या यह है कि तथाकथित बुद्धिजीविओं द्वारा एकपक्षीय अवधारणाओं का सामान्यीकरण और सामान्य अवधारणा का विशेषीकरण करने की प्रवृति बढती जा रही है. यही कारण है कि हिंदुत्व के सार्वभौमिक समानता और बंधुता के दर्शन को नजरंदाज कर दिया जा रहा है. जबकि प्राणियों में सद्भावना और विश्व का कल्याण हिंदुत्व दर्शन का आधार है और मुस्लिम या कोई भी अन्य मतावलंबी उसी प्राणी जगत व विश्व का भाग है.

जब सरसंघचालक मोहन भागवत या संघ यह कहता है कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है तो इसका मतलब सांस्कृतिक संबोधन है. विविधता को स्वीकारना और सम्मान देना हिंदू संस्कृति का घोष वाक्य और मौलिक आधार है. चूंकि ये सोच सनातन धर्म और उसके मानने वालों की देन है. इसलिए यह हिंदू धर्म का प्रर्याय बन जाता है. भारतीय धर्म और भारतीय संस्कृति में कोई भेद नहीं रह जाता है. भारत अथवा अपने को हिंदू मानने वालों का राष्ट्रबोध विश्वबोध के बिना अधूरा है. संघ ये नहीं कहता है कि भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना है. संघ यह कहता है कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है. हिंदुत्व की सोच भारत की आत्मi है. अगर ये चला गया तो भारत भारत नहीं रहेगा.

वरिष्ठ पत्रकार अभय कुमार दुबे का क्या कहना है?

संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा है कि 'अगर देश में मुसलमान नहीं होगा तो ये हिंदुत्व नहीं होगा.' उनकी बात सही है. हिंदुत्व की विचारधारा मुसलमानों को भारत से बाहर नहीं निकालना चाहती. सावरकर द्वारा दी गई हिंदुत्व की परिभाषा के अनुसार भारतीय मुसलमानों की पितृभूमि भारत ही है, इसलिए वे भारत में रह सकते हैं. लेकिन भारत में रहते हुए उनकी हैसियत क्या वैसी ही होगी जैसी हिंदुओं, सिखों, जैनों और बौद्धों (ये सभी भारत में पैदा हुए धर्म हैं) की होती है? यह सवाल इसलिए उठता है कि हिंदुत्व की परिभाषा में ऐसे सभी धर्मों की अलग श्रेणी बना दी गई है जिनकी पुण्यभूमि भारत नहीं है, अर्थात जो भारत में पैदा नहीं हुए हैं. जैसे, ईसाइयत और इस्लाम. हिंदुत्व के अनुसार ऐसे धर्मों को मानने वाले लोगों का वजूद कुछ शर्तों के आधीन ही हो सकता है. वे शर्तें क्या होंगी, यह मोहन भागवत ने साफ़ नहीं किया है. लेकिन हम उन शर्तों और उन्हें लागू करने के तरीक़ों के बारे में कुछ ठोस अनुमान अवश्य लगा सकते हैं.

मसलन, मुसलमान रहेंगे लेकिन संघ परिवार की प्रमुख सदस्य भाजपा उन्हें या तो न के बराबर टिकट देगी या बिल्कुल नहीं देगी. मुसलमान रहेंगे, लेकिन बांग्लादेश से आए हिंदू शरणार्थी का संघ के विचारक छाती ठोक कर स्वागत करेंगे, और मुसलमान शरणार्थी घुसपैठिया करार दे दिया जाएगा. टीवी पर बहस में साफ़ तौर पर कहा जाएगा कि भाजपा पहले भी मुसलमान वोटों के बिना सत्ता में आई थी, और उनके बिना ही सत्ता में फिर से आएगी. मुसलमान रहेंगे, लेकिन अल्पसंख्यक आयोग की ज़रूरत पर सवालिया निशान लगाया जाता रहेगा. मुसलमान रहेंगे, लेकिन संघ परिवार का ही संगठन बजरंग दल उन्हें थपड़ियाने के एजेंडे पर काम करता रहेगा. मुसलमान रहेंगे, लेकिन गौमांस रखने के आरोप में अख़लाक की हत्या और मवेशियों का व्यापार करने वाले मुसलमानों की भीड़-हत्या के कारण बने माहौल के असर में बहुतेरे मुसलमान परिवार अपने घर में गोश्त पकाना ही बंद कर देंगे. उन्हें जब खाना होगा तो रेस्त्राँ में खा आएँगे.

संघ जानता है कि पंद्रह-सोलह करोड़ मुसलमानों को इस देश से बाहर नहीं निकाला जा सकता है. न ही संविधान के तहत उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक घोषित किया जा सकता है. लेकिन उन्हें अघोषित रूप से एक ऐसी स्थिति में ज़रूर पहुँचाया जा सकता है जिसमें उनकी राजनीतिक और सांस्कृतिक दावेदारियाँ पूरी तरह से शून्य हो जाएँ. ऐसा होने पर कोई भी समुदाय तकनीकी रूप से नागरिक होते हुए भी नागरिकता से प्राप्त होने वाली शक्तियों से वंचित हो जाता है. मुसलमानों के साथ नियोजित रूप से पिछले साढ़े चार साल से ऐसा ही किया जा रहा है.

ऐसा कर पाने के लिए ज़रूरी है कि पहले मुसलमानों के वोट की ताकत को ज़ीरो कर दिया जाए. उत्तर प्रदेश की मिसाल बताती है कि चालीस-पैंतालीस फ़ीसदी हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण होते ही मुसलमान वोट अपनी अहमियत खो देते हैं. ऐसा होते ही सभी दल हिंदू वोटों के सौदागर बनने की कोशिश करने लगते हैं. पार्टियाँ रामभक्त, शिवभक्त और विष्णुभक्त में बँट जाती हैं. मुसलमानों के पक्ष में बोलना या उन्हें अपनी रणनीति का मुख्य अंग बनाना नुकसानदेह मान लिया जाता है. देश की राजनीति बहुसंख्यकवाद की प्रतियोगिता बन गई है. पूरा मुसलमान अधूरा बन गया है. इसलिए मोहन भागवत को यह कहने की सुविधा मिल गई है कि हिंदुत्व मुसलमानों के खिलाफ़ नहीं है.

'भविष्य का भारत' कार्यक्रम में दिए गए भागवत के बड़े बयान यहां पढ़ें-

भविष्य का भारत: भागवत बोले- देश में मुसलमान नहीं रहेंगे तो ये हिंदुत्व नहीं होगा

मोहन भागवत बोले- RSS में जाति नहीं पूछते, जाति एक अव्यवस्था, ये खत्म होना तय

आरक्षण के समर्थन में भागवत, एससी-एसटी एक्ट पर कहा -दुरुपयोग नहीं होना चाहिए

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