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क्या ‘डीप नेटवर्क्स’ मानव मस्तिष्क की तरह ही चीजों को समझते हैं, रिसर्च से हुआ खुलासा

आईआईएससी ने एक बयान में कहा कि ये नेटवर्क वैज्ञानिकों को हमारे मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को समझने में मदद करते हैं कि किसी वस्तु को देखने के बाद हमारा मस्तिष्क उसे कैसे समझता है. ‘डीप न्यूरल नेटवर्क्स’ मस्तिष्क की कोशिकाओं या मानव मस्तिष्क में तंत्रिका तंत्र से प्रेरित मशीनी अध्ययन प्रणाली है जिसे कुछ विशिष्ट कार्य करने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है.

बेंगलुरु: भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) में तंत्रिका विज्ञान केंद्र के एक नए रिसर्च से पता चला है कि दृश्य बोधगम्यता की बात आने पर मानव मस्तिष्क की तुलना में ‘डीप न्यूरल नेटवपर्क्स’ कितना सटीक काम करता है. ‘डीप न्यूरल नेटवर्क्स’ मस्तिष्क की कोशिकाओं या मानव मस्तिष्क में तंत्रिका तंत्र से प्रेरित मशीनी अध्ययन प्रणाली है जिसे कुछ विशिष्ट कार्य करने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है.


क्या ‘डीप नेटवर्क्स’ मानव मस्तिष्क की तरह समझते हैं?

आईआईएससी ने एक बयान में कहा कि ये नेटवर्क वैज्ञानिकों को हमारे मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को समझने में मदद करते हैं कि किसी वस्तु को देखने के बाद हमारा मस्तिष्क उसे कैसे समझता है. बीते दशक में ‘डीप नेटवर्क्स’ प्रणाली ने अध्ययन में उल्लेखनीय भूमिका निभायी है और मानव मस्तिष्क के दृश्य बोधगम्यता को समझने में ये अब भी अहम भूमिका निभा रहे हैं. हाल के अध्ययन में सीएनएस में एसोसिएट प्रोफेसर एस पी अरुण और उनकी टीम ने मानव मस्तिष्क की तुलना में इन डीप नेटवर्क्स की विभिन्न गुणों का गुणात्मक अध्ययन किया. किसी वस्तु को देखने पर मानव मस्तिष्क कैसे प्रतिक्रिया देता है, उसे कैसे समझता है, अन्य वस्तु को देखने पर क्या वह पहले की तुलना में अलग तरीके से कार्य करता है, डीप नेटवर्क्स इसे समझने का भी एक बेहतर मॉडल है.

भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरु के रिसर्च में खुलासा

जटिल गणना इसके सामने कुछ नहीं है, हालांकि कुछ ऐसे निश्चित कार्य जो मानव मस्तिष्क के लिए अपेक्षाकृत रूप से आसान होते हैं उन्हें पूरा करने में इन नेटवर्क्स को मुश्किल आ सकती है. हालिया रिसर्च के नतीजे ‘नेचर कम्युनिकेशंस’ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं. अरुण और उनकी टीम ने रिसर्च के जरिये यह समझने का प्रयास किया है कि इनमें किस दृश्य कार्य को ये नेटवर्क्स अपनी बनावट के अनुरूप स्वाभाविक रूप से पूरा कर लेते हैं और किस कार्य के लिए उन्हें आगे प्रशिक्षण की जरूरत है.

उदाहरण के लिए ‘थैचर इफेक्ट’ में मानव किसी स्थानीय स्वरूप में बदलाव को आसानी से पता लगा लेता है लेकिन इस तस्वीर को उलट दिया जाये तो यह नेटवर्क्स के लिए मुश्किल भरा हो सकता है. सीएनएस में लेखक और पीएचडी छात्र जॉर्जिन जैकब ने बताया कि इसी तरह मानव अगर किसी के चेहरे को देखता है तो सबसे पहले वह पूरा चेहरा देखता है और फिर आंख, नाक, मुंह आदि पर गौर करता है. इसका मतलब है कि मस्तिष्क की तुलना में नेटवर्क्स किसी तस्वीर को पहली बार देखने पर उनकी तरफ गहनता से ध्यान केंद्रित करते हैं. 

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