Explained: धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा बीजेपी की सबसे बड़ी हार क्यों?
Dharmendra Pradhan Resign: यह इस्तीफा दिखाता है कि बीजेपी का 'अजेय' होने का मिथक टूट गया है. जो सरकार किसान, मुसलमान और CAA-NRC से नहीं झुकी, उसे Gen Z ने कैसे झुका दिया?

26 जुलाई 2026 दोपहर 2:18 बजे... केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. यह मोदी सरकार के 12 साल के कार्यकाल में दूसरा इस्तीफा है. पहला 2018 में एमजे अकबर का था, जिन्होंने #MeToo आंदोलन के बीच इस्तीफा दिया था. लेकिन प्रधान का इस्तीफा उस पीढ़ी की जीत है, जिसे 'तिलचट्टा' कहा गया. मोदी सरकार किसान आंदोलन से नहीं झुकी, CAA-NRC के विरोध से नहीं डिगी, कोविड मैनेजमेंट की आलोचना से नहीं हिली, उसी सरकार को Gen Z ने कैसे घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया और बीजेपी सरकार की यह सबसे बड़ी हार बन गया है...
इस्तीफे के पहले 36 दिनों का संघर्ष
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने 20 जून 2026 को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन शुरू किया. मांग साफ थी- धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा. इसे लेकर 'संसद चलो' मार्च का आयोजन हुआ, जिसमें पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे और लाठीचार्ज भी किया. असर उल्टा हुआ यानी जो आंदोलन सिर्फ NEET तक सीमित था, वह अब सिस्टम विरोधी आंदोलन बन गया.
24 जुलाई को CJP और सरकार के बीच कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में बातचीत हुई. CJP ने साफ कहा, 'धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग नॉन-नेगोशिएबल है.' मोदी सरकार ने 25 जुलाई तक का समय मांगा. सरकार को लगा वह टिक जाएगी, लेकिन दोपहर प्रधान के इस्तीफे से सब कुछ बदल गया.
शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की कहानी क्या है?
धर्मेंद्र प्रधान ने X पर लेटर पोस्ट करते हुए इस्तीफे की जानकारी दी. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना इस्तीफा सौंप दिया. प्रधान ने लेटर में कहा, 'NEET-UG परीक्षा से जुड़ी घटनाओं ने उन्हें गहरी पीड़ा दी है.' उन्होंने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि उन्होंने 3 मई की NEET-UG परीक्षा में अनियमितताओं के बाद जिम्मेदारी मान ली है.
इसके बाद CJP ने इस्तीफे को अपनी बड़ी जीत करार किया. X पर अभिजीत दीपके का वीडियो पोस्ट किया गया. आखिर PM मोदी को आधी रात को सेल्फी वीडियो बनानी पड़ी, जो दिखाता है कि वे कितने दबाव में थे.
यह इस्तीफा बीजेपी की सबसे बड़ी हार क्यों है?
धर्मेंद्र प्रधान का यह इस्तीफा सिर्फ एक मंत्री का जाना नहीं है. यह बीजेपी के लिए 2014 के बाद की सबसे बड़ी राजनीतिक हार है. यह उस पार्टी के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ है जिसने एक दशक तक विपक्ष, किसानों और संस्थाओं को झुकते देखा था, लेकिन आज उसे Gen Z के आगे हार माननी पड़ी. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इसकी 5 बड़ी वजहें हैं:
1. बीजेपी का सबसे बड़ा हथियार: 'नैरेटिव कंट्रोल' हमेशा के लिए खो गया
बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत जमीनी मूड को पढ़ने और उसी के हिसाब से नैरेटिव को कंट्रोल करने की क्षमता थी. लेकिन इस बार पार्टी ने अपना यह सबसे बड़ा एज खो दिया. NEET पेपर लीक के विरोध को शुरू में बीजेपी ने एक 'ऑनलाइन मजाक' समझा. लेकिन यह 'मजाक' CJP में बदल गया, जिसे दुनिया भर ने 'Gen Z आंदोलन' करार दिया. जब सोनम वांगचुक का अनशन चल रहा था, तब तक कोई सुर्खी नहीं बन पाई थी. लेकिन जैसे ही सरकार ने उन्हें सफेद चादर में लपेटकर अस्पताल पहुंचाया, वो वीडियो इंस्टाग्राम से X तक वायरल हो गया.
एक ऐसी पीढ़ी ने उन्हें चुनौती दी, जिसे 'सिख अलगाववादी', 'मुस्लिम आतंकवादी' या 'पाकिस्तानी घुसपैठिया' नहीं कहा जा सकता था. वो उनकी अपनी हिंदू, मिडिल-क्लास और पढ़ी-लिखी संतानें थीं.
2. 'हम दबाव में नहीं झुकते': 12 साल की छवि का पूरा ढांचा ढह गया
बीजेपी ने 12 सालों में एक सख्त छवि बनाई थी कि कोई भी सड़क पर उतरकर मंत्री का इस्तीफा नहीं निकाल सकता. 2020 का किसान आंदोलन हो, CAA का विरोध हो, या 2021 का कोविड प्रबंधन, सरकार कभी नहीं झुकी. बीजेपी का स्टैंड था कि 'हमारे मंत्रियों को इस्तीफा नहीं देना पड़ता.' लेकिन 26 जुलाई को वो स्टैंड ढह गया. यानी जिस सरकार ने 'मजबूत' और 'अडिग' होने का नारा दिया, उसे Gen Z के सामने झुकना पड़ा.
3. 20 MPs का सियासी दबाव: पार्टी के भीतर का 'भूचाल'
यह इस्तीफा सिर्फ बाहरी दबाव नहीं था, बल्कि बीजेपी के भीतर के सियासी भूचाल को भी दिखाता है. धर्मेंद्र प्रधान सिर्फ एक मंत्री नहीं, बल्कि ओडिशा में बीजेपी के 20 सांसदों के 'नेता' थे. जब उन पर इस्तीफे का दबाव बढ़ा, तो उन्होंने 22 जुलाई को इन 20 सांसदों के साथ एक फोटो पोस्ट करके स्पष्ट संकेत दिया. 'मुझे हटाने की कोशिश करो और देखो क्या होता है.' क्योंकि NDA के पास लोकसभा में सिर्फ 298 सीटें हैं (बहुमत 272 से 26 ऊपर). यह इस्तीफा दिखाता है कि बीजेपी के अंदरूनी गलियारों में भी दरार आ गई है.
4. 'पहली बार राहुल गांधी और विपक्ष को मिली बड़ी जीत'
बीजेपी 12 सालों से विपक्ष को 'नाकाम' करने में माहिर रही है. किसान आंदोलन से लेकर CAA तक, कांग्रेस कभी भी बीजेपी को पीछे हटाने में कामयाब नहीं हुई. लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ. राहुल गांधी ने 21 जुलाई को PM आवास के बाहर धरना दिया. पुलिस का उन्हें उठाकर ले जाने वाले कारनामे ने सियासी मैसेज दे दिया. राहुल ने तीन मांगें रखीं, प्रधान का इस्तीफा, पुलिस कार्रवाई पर एक्शन, और PM से माफी.
CJP की मांगों के साथ विपक्ष का यह तालमेल बीजेपी के लिए मुश्किल बना. अगर प्रधान को हटाया जाता, तो इसका पूरा श्रेय राहुल गांधी और CJP को जाता. इस वजह बीजेपी ने पूरी कोशिश की कि प्रधान न हटे, लेकिन आखिरकार ऐसा ही हुआ. यह मोदी सरकार के खिलाफ राहुल गांधी की पहली बड़ी राजनीतिक जीत है.
5. RSS ने दिया 'सरेंडर' का सिग्नल
बीजेपी का आधार RSS है. 12 सालों में RSS ने कभी भी किसी जनआंदोलन के दबाव में बीजेपी को झुकने का संकेत नहीं दिया, लेकिन इस बार ऐसा हुआ. RSS प्रमुख मोहन भागवत ने 25 जुलाई को एक कार्यक्रम में कहा, 'अब वह समय नहीं है जब मां-बाप कहें और बच्चे चुप रहें. नई पीढ़ी सवाल पूछती है और तर्क मांगती है. अब हुक्म नहीं, संवाद करना होगा, सहमति बनानी होगी.'
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यह एक सीधा संकेत था कि सरकार, Gen Z से झगड़ा मत करो, झुक जाओ. अगर RSS ने यह नहीं कहा होता, तो शायद यह आंदोलन 'शासन परिवर्तन' की मांग तक पहुंच सकता था. भागवत ने खुद बीजेपी के रवैये को नकार दिया, जो यह पार्टी के लिए सबसे बड़ा अपमान था. यह पहली बार है जब RSS को अपनी ही सरकार को 'सरेंडर' का संकेत देना पड़ा. यह बीजेपी-RSS रिश्ते में एक बड़ी दरार है.
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के प्रमुख अभिजीत दीपके ने कहा, 'वे कहते थे, इस सरकार में इस्तीफे नहीं होते, लेकिन झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए.'
CJP की दो मांगें बाकी हैं, अब आगे क्या होगा?
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बावजूद CJP ने अपना अगला कदम तय कर लिया है. CJP ने 26 जुलाई की शाम 6 बजे देशव्यापी मोमबत्ती मार्च करने का ऐलान किया है. इसका मकसद 20 जुलाई की 'संसद चलो' मार्च में पुलिस ब्रुटैलिटी के पीड़ितों के साथ एकजुटता दिखाना है. CJP का कहना है, '20 जुलाई को जिन शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया और जिन पर FIR दर्ज की गईं, उनके साथ हमारी एकजुटता है.'
मुआवजे पर सरकार ने सैद्धांतिक सहमति तो दे दी है, लेकिन अभी तक कोई औपचारिक ऐलान नहीं हुआ है. CJP चाहता है कि यह जल्द से जल्द लागू हो. वहीं, दिल्ली पुलिस ने 20 जुलाई के प्रदर्शन के खिलाफ 13 FIR दर्ज की हैं. CJP की मांग है कि ये सभी FIR वापस ली जाएं और भविष्य में ऐसी कोई कार्रवाई न हो. सरकार ने सैद्धांतिक सहमति दी है, लेकिन FIR वापसी की प्रक्रिया में समय लग सकता है.
CJP के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने साफ कहा है, 'जब तक मुआवजे और FIR वापसी पर लिखित आश्वासन नहीं मिलता, आंदोलन जारी रहेगा.'
























