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तानाशाह चीन को क्यों नापसंद है लोकशाही? कोरोना फैलाकर अब लोकतंत्र के शिकार पर निकला चीन

चीन की नजर लोकतांत्रिक देशों पर है और इसी नीति पर काम कर रहा है. चीन नहीं चाहता है कि आम लोगों को उसका अधिकार मिले.

नई दिल्ली: दुनिया में कोरोना फैलाने के अपराधी तानाशाह चीन को सबसे ज़्यादा डर लोकतंत्र से लगता है. लगे भी क्यूं ना, चीन में न तो बहस की गुंजाइश है और न ही विरोध का अधिकार. सिस्टम की सुस्ती सोने से भी कीमती अधिकारों को मिट्टी जैसा बना देती है. आजादी ही लोकतंत्र का असली मजा है, उसकी आत्मा है. कोई क्या पहनेगा, क्या खाएगा, किस धर्म को मानेगा, किस विचारधारा से जुड़ेगा, किसे चुनेगा और किसका विरोध करेगा ये सब हक लोकतंत्र में ही मिलते हैं, चीन में नहीं.

सब जानते हैं कोरोना वायरस पर झूठ बोलकर चीन ने दुनिया के करोड़ों लोगों को घरों में घुटते रहने पर मजबूर कर दिया. लेकिन आपकी ये घुटन तब और बढ़ जाएगी जब आपको पता चलेगा कि कोरोना फैलाने के बाद चीन दुनिया में लोकतंत्र खरीद रहा है. लोकतांत्रिक सरकारों को परेशान कर रहा है. उन देशों की सरकारों पर कब्जा करने की कोशिश कर रहा है. चीन चाहता है कि जैसे उसकी जनता बंधन में जीती है, उसी तरह दुनिया उसके इशारों पर चले. चीन की तरह दुनिया में एक पार्टी का राज हो.

इसके लिए वो ऑस्ट्रेलिया, इटली, फ्रांस, स्पेन, बेल्जियम हंगरी समेत पूरे यूरोप में जमकर निवेश कर रहा है. इसके अलावा वो कमजोर लोकतंत्र वाले देशों मालदीव, श्रीलंका, नेपाल, पाकिस्तान को कर्ज देकर अपना गुलाम बना रहा है. पड़ोसियों का चीन का कर्जदार होना भारत के लिए बड़ी चिंता का विषय हो गया है. चीन के इन इरादों का कुछ देशों की सरकारें जमकर विरोध कर रही हैं. इसमें पहला नाम ऑस्ट्रेलिया का है. जिसने चीन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है.

ऑस्ट्रेलिया में चीन का दखल?

ऑस्ट्रेलिया में चीन के विरोध की सबसे बुलंद आवाज गृह राज्य मंत्री जेसन वुड की है. जेसन वुड ने ABP न्यूज से कहा कि ऑस्ट्रेलिया पहला ऐसा देश था, जिसने चीन से आने वाले लोगों पर कोविड संकट के मद्देनजर यात्रा प्रतिबंध लगाए. स्वाभाविक रूप से चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी इससे खुश नहीं थी. जबकि यह एक सही फैसला था.

दरअसल ऑस्ट्रेलिया में चीन ने लोकतंत्र की बुनियाद को कैसे हिला दिया है. दुनिया के सबसे खूबसूरत देशों में ऑस्ट्रेलिया का नंबर आता है. भारत से ऑस्ट्रेलिया का सबसे गहरा रिश्ता क्रिकेट से है. प्रति व्यक्ति आय में ऑस्ट्रेलिया का 10वां नंबर है. मानव विकास सूचकांक में तीसरे, सबसे कम गरीब देशों में उसका 21वां स्थान है.

ऑस्ट्रेलिया के पास कोयला, लोहा, डायमंड, सोना और यूरेनियम का बहुत बड़ा भंडार है. जिसे दुनिया को बेचकर वो बहुत अमीर बन गया. आपको जानकर हैरानी होगी कि पिछले 29 सालों में ऑस्ट्रेलिया को आर्थिक मंदी छू भी नहीं सकी है. जबकि इतने सालों में दुनिया कई वैश्विक मंदी का गवाह बना.

ऑस्ट्रेलिया से होने वाले कुल निर्यात में 33 फीसदी हिस्सा चीन का है. ऑस्ट्रेलिया के खनिज पदार्थों का सबसे बड़ा ग्राहक चीन है. जिससे वो हर साल करीब साढ़े 9 लाख करोड़ रुपये कमाता है. इस तरह ऑस्ट्रेलिया के वैभव में चीन का बहुत बड़ा रोल है. ऑस्ट्रेलिया भले ही सामाजिक और वैचारिक रूप से अमेरिका-यूरोपीय देशों के करीब हो लेकिन उसकी जेब को चीन की नाराजगी सीधे प्रभावित करती है.

चीन का असर ऑस्ट्रेलिया के दूसरे सबसे कमाऊ एजुकेशन सेक्टर में भी है. हर वर्ष ऑस्ट्रेलिया की इकोनॉमी में 2.47 लाख करोड़ रुपये यही सेक्टर जोड़ता है. इसके लिए भी वो चीन पर निर्भर है..क्योंकि ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी के कुल छात्रों में 30 फीसदी चीन से आते हैं. आप ये जानकर हैरान रह जाएंगे कि चीन और ऑस्ट्रेलिया के बीच कुल कारोबार 15 लाख करोड़ रुपये का होता है, जो अमेरिका और जापान के संयुक्त कारोबार 11.19 लाख करोड़ से भी ज्यादा है. लेकिन ऑस्ट्रेलिया अब ये सब बदलना चाहता है, जिसके लिए वो भारत की तरफ देख रहा है.

ऑस्ट्रेलिया ऐसा इसलिए करना चाहता है क्योंकि बीते कुछ सालों के दौरान ऑस्ट्रेलिया की राजनीति चीनी दबदबे का अखाड़ा बन चुकी है. एक तरफ वेस्टर्न डेमोक्रेसी का असर है, तो वहीं दूसरी तरफ चीनी मूल के ऑस्ट्रेलियाई नागरिकों की डेमोग्राफी के सहारे चीन का दबदबा दिखाने की चाहत है.

इन विपरीत प्रभावों का खेल, खुलकर तब सामने आया जब ऑस्ट्रेलिया के एक सीनेटर को चीनी कारोबारी से आर्थिक मदद लेने और दक्षिण चीन सागर पर बीजिंग के रुख पर समर्थन का मामला सामने आया. इस विवाद ने इतना तूल पकड़ा कि न्यू साउथ वेल्स से ईरानी मूल के ऑस्ट्रेलियाई सांसद सैम दस्तयारी को जनवरी 2018 में अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा.

ऑस्ट्रेलिया के इस सांसद ने ये कबूला कि उसने एक कानूनी मामला सुलझाने के लिए एक चीनी कारोबारी हुआंग शियांगो और उनके यूहू समूह से 40 हजार डॉलर लिए थे. एक्सपर्ट मानते हैं कि चीन भ्रष्ट नेताओं के अलावा सिस्टम की कमजोरी का भी फायदा उठाता है.

ऑस्ट्रेलिया में 3 स्तर पर कानून बनते हैं, इसीलिए उसे तीन सरकारों वाला देश भी कहा जाता है. केंद्रीय सरकार पूरे देश के लिए कानून बनाती है. 6 राज्य और 2 मेनलैंड टेरिटरी पार्लियामेंट अपने राज्य और क्षेत्र के लिए कानून बनाते हैं और 500 लोकल काउंसिल जिलों के लिए कानून का निर्माण करती हैं. यहीं से शुरू होता है चीन का खेल. कुछ जानकार सत्ता के अलग अलग ढांचे को ऑस्ट्रेलिया में चीन के दबदबे की वजह मानते हैं.

चीन अपने ही लोगों की जान से करता है खिलवाड़

ऐसा सिर्फ लोकतंत्र में ही संभव है. जब देश का प्रधानमंत्री लॉकडाउन की वजह से जनता को होने वाली परेशानी के लिए माफी मांगे. लेकिन चीन की सरकार ने अपने लोगों की जान से खिलवाड़ किया. शी जिनपिंग समेत चीन के तीन सर्वोच्च नेताओं को 14 जनवरी को ही कोरोना वायरस के खतरे की बात पता चल गई थी. वो जानते थे कि कोरोना वायरस इंसान से इंसान में फैल सकता है. फिर भी चीन की सरकार ने इसे रोकने के लिए कुछ नहीं किया. जनता को कोरोना से बचाने की बजाए चीन के अफसर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना के सबसे बड़े सम्मेलन की तैयारियों में जुटे थे. यही वजह है कि अब दुनिया इस मामले की जांच चाहती है.

चीन में जनता को इसलिए मरने के लिए छोड़ दिया गया क्योंकि वहां उसकी कोई अहमियत नहीं है. जबकि लोकतंत्र में जनता मालिक है, क्योंकि उसके वोट से सरकार बनती और बिगड़ती है. चीन में एक पार्टी का राज है.

नेपाल, श्रीलंका, मालदीव ये भारत के वो पड़ोसी देश हैं, जहां की राजनीति में चीन समर्थक पैदा हो गये हैं. पाकिस्तान का मामला इससे अलग है, क्योंकि वहां पूरा सिस्टम ही चीन के आगे नतमस्क है. लेकिन असल चिंता यूरोप को लेकर है, जहां इटली में सिल्वियो बर्लुस्कोनी, फ्रांस में फ्रांसवा ओलांद जैसे नेताओं ने चीन को ग्रीन सिग्नल दे दिया है. ऐसा ही आरोप ऑस्ट्रेलिया की प्रमुख पार्टी लेफ्ट लिबरल पर भी है, जो चीन समर्थक है.

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