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क्या चीफ इलेक्शन ऑफिसर को हटाया जा सकता है? संविधान में क्या है प्रावधान?

CEC को केवल उसी तरीके से और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है, और नियुक्ति के बाद उनकी सेवा की शर्तों में उनके नुकसान के लिए कोई बदलाव नहीं किया जा सकता है.

CEC यानी चीफ इलेक्शन ऑफिसर को हटाना एक औपचारिक और अर्ध-न्यायिक प्रक्रिया है, जिसे भारत के चुनाव आयोग (ECI) की स्वतंत्रता को कार्यपालिका के दखल से बचाने के लिए बनाया गया है. लोकतांत्रिक प्रक्रिया की गरिमा बनाए रखने के लिए, CEC को भारत के सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह ही कार्यकाल की सुरक्षा दी गई है.

संवैधानिक प्रावधान

संविधान का अनुच्छेद 324(5)

इसमें कहा गया है कि संसद द्वारा बनाए गए किसी भी कानून के अधीन रहते हुए, चुनाव आयुक्तों और क्षेत्रीय आयुक्तों की सेवा की शर्तें और कार्यकाल राष्ट्रपति द्वारा तय किए जाते हैं. CEC को केवल उसी तरीके से और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है, और नियुक्ति के बाद उनकी सेवा की शर्तों में उनके नुकसान के लिए कोई बदलाव नहीं किया जा सकता है. अन्य चुनाव आयुक्तों या क्षेत्रीय आयुक्तों को केवल CEC की सिफारिश पर ही हटाया जा सकता है.


क्या चीफ इलेक्शन ऑफिसर को हटाया जा सकता है? संविधान में क्या है प्रावधान?

इसके बाद, संसद ने 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' पारित किया, जिसमें इस्तीफे और हटाने की प्रक्रिया का प्रावधान है. यह संविधान में बताई गई प्रक्रिया का ही पालन करता है.

हटाने के आधार

संविधान सुप्रीम कोर्ट के जज (और इसी तरह CEC) को हटाने के आधारों को केवल दो विशिष्ट आरोपों तक सीमित करता है-साबित कदाचार या अक्षमता.

हालांकि राजनीतिक चर्चा में इसे आमतौर पर "महाभियोग" (impeachment) कहा जाता है, लेकिन संविधान तकनीकी रूप से महाभियोग शब्द को विशेष रूप से भारत के राष्ट्रपति (अनुच्छेद 61) के लिए ही सुरक्षित रखता है. जजों और CEC के लिए, औपचारिक संवैधानिक शब्द 'हटाना'  है.

हटाने की प्रक्रिया
CEC को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने की प्रक्रिया के समान ही अर्ध-न्यायिक (quasi-judicial) होती है, जो 'जज जांच अधिनियम, 1968' द्वारा शासित होती है. 

हटाने के प्रस्ताव की शुरुआत

हटाने के आधार बताते हुए हटाने का प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है. इस पर लोकसभा में 100 सदस्यों या राज्यसभा में 50 सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहिए. इसके बाद हस्ताक्षरित प्रस्ताव संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी (लोकसभा में स्पीकर या राज्यसभा में चेयरमैन) को सौंपा जाता है.

स्वीकृति और जांच

स्पीकर/चेयरमैन प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं. यदि स्वीकार कर लिया जाता है, तो आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति (सुप्रीम कोर्ट के जज, हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, प्रतिष्ठित कानून विशेषज्ञ) का गठन किया जाता है.

रिपोर्ट सौंपना

समिति जांच करती है, और CEC को अपना बचाव करने का अधिकार होता है. यदि समिति इस नतीजे पर पहुंचती है कि आरोप साबित नहीं हुए हैं, तो प्रस्ताव को रद्द कर दिया जाता है और प्रक्रिया समाप्त हो जाती है. अगर कमिटी CEC को गलत व्यवहार या काम करने में अक्षम पाती है, तो रिपोर्ट उस सदन में पेश की जाती है जहां प्रस्ताव सबसे पहले लाया गया था.

संसद में वोटिंग

प्रस्ताव को पास करने के लिए, संसद के दोनों सदनों में एक ही सत्र के दौरान 'विशेष बहुमत' (Special Majority) का समर्थन ज़रूरी है. विशेष बहुमत का मतलब है सदन के कुल सदस्यों का बहुमत, और साथ ही मौजूद और वोट देने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई सदस्यों का बहुमत.

हटाने के लिए राष्ट्रपति का आदेश

अगर प्रस्ताव दोनों सदनों में सफलतापूर्वक पास हो जाता है, तो भारत के राष्ट्रपति को एक औपचारिक अनुरोध भेजा जाता है. आखिर में, राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का आधिकारिक आदेश जारी करते हैं.

संकल्प ठाकुर पिछले 10 वर्षों से मीडिया जगत में सक्रिय हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत न्यूज़ 24 से की, इसके बाद न्यूज़ नेशन में कार्य किया. वर्तमान में वह एबीपी हिंदी डिजिटल में डिप्टी प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं और पिछले सात वर्षों से संस्थान के साथ जुड़े हुए हैं. उन्हें खेल, अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और चुनावी राजनीति से जुड़ी खबरों की गहरी समझ है. इसके अलावा साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े विषयों पर लेखन उनकी विशेष रुचि और विशेषज्ञता का क्षेत्र है. उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है.

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