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कोरोना की दोहरी मार, 'ब्लैक फंगस' कर रहा तेजी से वार

ब्लैक फंगस यानि म्यूकोरमायकोसिस इलाज में इस्तेमाल होने वाले इंजेक्शन एम्फोटेरिसिन-बी की किल्लत हो गई है.

नई दिल्ली: कोरोना अभी देश से गया भी नहीं है कि काले काल का असर दिखना शुरु हो गया है. ब्लैक फंगस यानी म्यूकोरमायकोसिस ने जिस तेजी से कोहराम का आगाज़ किया है,उससे यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि अंजाम तक पहुंचते-पहुंचते यह बीमारी कितने लोगों को अपनी चपेट में लेगी. देश के 13 राज्यों में अब तक करीब चार हजार मामले सामने आए हैं और महाराष्ट्र इसमें भी अव्वल है जहां दो हजार से ज्यादा लोग इसका शिकार बन चुके हैं. पांच राज्यों समेत चंडीगढ़ में भी इसे महामारी घोषित कर दिया गया है और यदि मामले बढ़ने की यही रफ़्तार रही तो इसे देशव्यापी महामारी का ऐलान करना पड़ सकता है.

कहा जा रहा है कि कोरोना संक्रमण से ठीक हुए लोगों को ही ज्यादातर यह बीमारी चपेट में ले रही है.हालांकि डॉक्टरों का मानना  है कि इसका कोरोना से सीधा कोई संबंध नहीं है लेकिन इसे संक्रमण के साइड इफ़ेक्ट के रुप में ही देखा जा रहा है.लेकिन चिंताजनक बात ये है कि बच्चे भी इससे अछूते नहीं हैं.अहमदाबाद में ऐसा पहला केस सामने आया है जहां 13 साल के ऐसे बच्चे को ब्लैक फंगस हुआ है,जिसे पिछले महीने ही कोरोना का संक्रमण हुआ था.

हैरानी के साथ चिंता का विषय यह भी है कि इसके इलाज में इस्तेमाल होने वाले इंजेक्शन एम्फोटेरिसिन-बी की किल्लत हो गई है. दुनिया में शायद भारत ही केवल ऐसा देश है जहां महामारी के इलाज में काम आने वाली जीवनरक्षक दवाओं /इंजेक्शनों की पहले जमाखोरी कर ली जाती है और फिर उनकी कालाबाज़ारी करके आपदा में अवसर तलाशा जाता है. शायद यही वजह है कि इसकी कमी को दूर करने के लिए कल दिल्ली हाइकोर्ट को भी सख़्त लहजे में सरकार से यह कहना पड़ा कि इसकी दवाई या इंजेक्शन को दुनिया के किसी भी देश से मंगवाईये और भारत में इसकी कमी को जल्द दूर कीजिये. हालांकि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने सफाई दी है कि एम्फोटेरिसिन-बी की सप्लाई बढ़ाने के लिए पांच और दवा कंपनियों को इसे बनाने की इजाज़त दी गई है. मंत्रालय के मुताबिक छह कंपनियां पहले से ही यह इंजेक्शन बना रही हैं.

ऐसे में सवाल उठता है कि जब इतनी कंपनियां इसे बना रही हैं,तो बीमारी की शुरुआत में ही इसकी कमी आखिर कैसे हो गई? क्योंकि मरीजों की संख्या तो अभी कई हजारों में भी नहीं पहुंची है.मतलब साफ है कि इस इंजेक्शन की जमाखोरी शुरु हो चुकी है और जैसे-जैसे इसकी डिमांड बढ़ेगी,इसे कई गुना मोटी कीमत पर बेचा जायेगा.

लिहाज़ा जीवनरक्षक दवाओं की जमाखोरी पर लगाम कसने के लिए सरकार को तत्काल सख्त कदम उठाने चाहिए. मसलन,ऐसे इंजेक्शन या दवा निर्माता कंपनी ने उसका कितनी मात्रा में उत्पादन किया और फिर कितनी संख्या में उसे आगे अपने डिस्ट्रीब्यूटर को बेचा.उन डिस्ट्रीब्यूटर ने इसमें से कितनी संख्या अस्पतालों को दी और कितना माल रिटेल मार्किट में किस-किस केमिस्ट को बेचा.आगे हर केमिस्ट इसका रिकॉर्ड अपने पास रखे कि उसने डॉक्टर के पर्चे पर कितने मरीजों को ऐसी दवाएं बेची हैं.इन सबका ब्यौरा सार्वजनिक होने पर पता चल जायेगा कि धांधली कहाँ हुई, बड़ा मुनाफाखोर कौन है और इसमें ड्रग कंट्रोलर की मिलीभगत किस हद तक है.

वैसे तो इसके लिए हर राज्य सरकार को अपने यहां एक अलग टास्क फ़ोर्स बनानी चाहिए जो आकस्मिक निरीक्षण के जरिये सिस्टम में फैली भ्रष्टाचार की इस गन्दगी की जिला स्तर पर पूरी तरह से सफाई कर सके. इस बीच दिल्ली एम्स के डायरेक्टर रणदीप गुलेरिया ने कहा कि ब्लैक फंगस की रोकथाम के लिए तीन चीजें बहुत महत्वपूर्ण हैं. पहला शुगर कंट्रोल बहुत अच्छा होना चाहिए, दूसरा हमें स्टेरॉयड कब देने हैं,इसके लिए सावधान रहना चाहिए और तीसरा स्टेरॉयड की हल्की या मध्यम डोज़ देनी चाहिए. वहीं मेदांता अस्पताल के चेयरमैन डॉ नरेश त्रेहन ने कहा कि ब्लैक फंगस खासकर मिट्टी में मिलता है, जो लोग स्वस्थ होते हैं उन पर ये हमला नहीं कर सकता है. हम इस बीमारी को जितनी जल्दी पहचानेंगे,इसका इलाज उतना ही सफल होगा.

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