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कांग्रेस के दो छंद की रट के बीच जानें कैसे BJP ने वंदे मातरम् को बनाया ‘रक्षा कवच’

कांग्रेस का कहना है कि वह कोई नया फैसला नहीं ले रही, बल्कि उसी परंपरा का पालन कर रही है जिसे महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और संविधान सभा ने स्वीकार किया था.

Vande Matram Row: 80वें स्वतंत्रता दिवस के बाद राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् एक बार फिर देश की राजनीति के केंद्र में आ गया है. कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) द्वारा 1937 के अपने ऐतिहासिक प्रस्ताव को दोहराते हुए पार्टी कार्यक्रमों में केवल पहले दो छंद गाने के निर्णय ने भाजपा को कांग्रेस पर राष्ट्रवाद के मुद्दे पर हमला करने का अवसर दे दिया है. अब यह विवाद सिर्फ एक गीत तक सीमित नहीं है, बल्कि इतिहास, संविधान, राष्ट्रवाद और वोट बैंक की राजनीति तक पहुंच चुका है.

विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी के एक इशारे को लेकर भाजपा ने आरोप लगाया कि राष्ट्रगीत का सम्मान नहीं किया गया. इसके बाद गोवा में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में वंदे मातरम् के केवल पहले दो छंद गाए गए. विवाद बढ़ा तो कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने स्पष्ट कर दिया कि पार्टी आगे भी अपने कार्यक्रमों में केवल पहले दो छंद ही गाएगी. यहीं से भाजपा ने आक्रामक रुख अपनाया और कांग्रेस पर राष्ट्रगीत को "विभाजित" करने का आरोप लगाना शुरू कर दिया.

अमित शाह का हमला

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि 1937 में कांग्रेस ने मुसलमानों को खुश करने के लिए वंदे मातरम् को बांट दिया था और उसी समय देश के विभाजन की नींव रखी गई थी. अमित शाह ने कहा कि कांग्रेस आज भी 1937 के उसी प्रस्ताव को लागू कर रही है, लेकिन संसद द्वारा बनाए गए कानून को स्वीकार नहीं कर रही. भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस राष्ट्रवाद के प्रश्न पर लगातार भ्रम की स्थिति पैदा कर रही है.

कांग्रेस का पक्ष क्या है?

कांग्रेस का कहना है कि वह कोई नया फैसला नहीं ले रही, बल्कि उसी परंपरा का पालन कर रही है जिसे महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और संविधान सभा ने स्वीकार किया था. कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने वंदे मातरम् के पहले दो छंदों को ही राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया था. इसलिए केवल पहले दो छंद गाना किसी प्रकार से राष्ट्रगीत का अपमान नहीं माना जा सकता. पार्टी का कहना है कि भाजपा इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश कर रही है और एक भावनात्मक विषय को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर रही है.

1937 में क्या हुआ था?

विवाद की जड़ 1937 तक जाती है. उस समय कुछ मुस्लिम संगठनों ने वंदे मातरम् के बाद के छंदों पर आपत्ति जताई थी. उनका कहना था कि गीत के कुछ हिस्सों में देवी स्वरूप की आराधना है, जिसे वे धार्मिक दृष्टि से स्वीकार नहीं कर सकते. 20 अक्टूबर 1937 को जवाहरलाल नेहरू ने सुभाष चंद्र बोस को लिखे एक पत्र में इस विवाद का उल्लेख किया था. नेहरू ने माना था कि गीत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और आनंदमठ उपन्यास से जुड़ाव कुछ समुदायों में असहजता पैदा कर सकता है. इसके बाद नेहरू ने गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की राय मांगी.

टैगोर ने क्या कहा था?

26 अक्टूबर 1937 को टैगोर ने नेहरू को लिखे पत्र में कहा कि गीत का प्रारंभिक भाग मातृभूमि की सुंदरता और महिमा का वर्णन करता है और उसे स्वतंत्र रूप से अपनाने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए. टैगोर ने संकेत दिया कि पहले दो छंदों को बाकी हिस्सों से अलग करके राष्ट्रीय अवसरों पर गाया जा सकता है. इसी सलाह के आधार पर 29 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस कार्यसमिति ने प्रस्ताव पारित किया कि राष्ट्रीय सभाओं में केवल पहले दो छंद गाए जाएंगे.

संविधान सभा का फैसला

24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि जन गण मन राष्ट्रगान होगा, जबकि वंदे मातरम् को समान सम्मान के साथ राष्ट्रगीत का दर्जा प्राप्त रहेगा. व्यवहारिक रूप से उसी समय यह स्वीकार किया गया कि राष्ट्रीय आयोजनों में वंदे मातरम् के पहले दो छंद ही गाए जाएंगे. यही परंपरा स्वतंत्र भारत में दशकों तक चलती रही.

जिन्ना और वंदे मातरम् का विवाद

भाजपा कांग्रेस पर तुष्टिकरण का आरोप लगा रही है, लेकिन इतिहास में एक और महत्वपूर्ण तथ्य मौजूद है. 1938 में मोहम्मद अली जिन्ना ने जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखकर वंदे मातरम् का उपयोग बंद करने की मांग की थी. नेहरू ने इस मांग को खारिज करते हुए जवाब दिया था कि वंदे मातरम् तीन दशकों से भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा रहा है और उससे लाखों भारतीयों की भावनाएं तथा स्वतंत्रता संग्राम के बलिदान जुड़े हुए हैं. हालांकि उन्होंने यह भी दोहराया था कि राष्ट्रीय मंचों पर केवल उन छंदों का उपयोग होना चाहिए जो सर्वस्वीकार्य हों.

नया कानून और नई बहस

अब स्थिति पहले जैसी नहीं है. हाल में संसद द्वारा वंदे मातरम् को कानूनी संरक्षण दिए जाने के बाद विवाद और बढ़ गया है. सरकार का तर्क है कि अब राष्ट्रगीत का अपमान या उसके गायन में जानबूझकर बाधा डालना दंडनीय माना जा सकता है. भाजपा इसी आधार पर कांग्रेस पर कानून और संविधान की भावना का उल्लंघन करने का आरोप लगा रही है. वहीं कांग्रेस का कहना है कि वह राष्ट्रगीत का विरोध नहीं कर रही, बल्कि उसी ऐतिहासिक और संवैधानिक परंपरा का पालन कर रही है जिसे संविधान सभा ने स्वीकार किया था.

क्या यह इतिहास का विवाद है या राजनीति का?

सवाल यह है कि अगर 1950 से लेकर अब तक राष्ट्रीय मंचों पर मुख्य रूप से पहले दो छंद ही गाए जाते रहे हैं, तो यह मुद्दा अचानक इतना बड़ा क्यों बन गया? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब सरकार कई अन्य मुद्दों पर विपक्ष के हमलों का सामना कर रही है- जैसे नीट पेपर लीक, छात्रों के आंदोलन, जातीय जनगणना, महंगाई और अन्य राजनीतिक विवाद. ऐसे में राष्ट्रवाद का मुद्दा भाजपा को स्वाभाविक रूप से मजबूत राजनीतिक जमीन देता है. दूसरी ओर कांग्रेस भी अपने ऐतिहासिक रुख से पीछे हटना नहीं चाहती.

वंदे मातरम् सिर्फ एक गीत नहीं है. यह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की पहचान, भावनाओं और बलिदानों का प्रतीक रहा है. लेकिन आज इसके इर्द-गिर्द खड़ी बहस इतिहास और संविधान की व्याख्या से ज्यादा राजनीति की दिशा में जाती दिखाई दे रही है. एक पक्ष 1937 के फैसले को तुष्टिकरण की राजनीति बता रहा है, तो दूसरा पक्ष उसे संविधान सभा की स्वीकृत परंपरा कह रहा है. सच यह है कि वंदे मातरम् के पहले दो छंदों को लेकर जो व्यवस्था 1937 में बनी और 1950 में स्वीकार हुई, वही दशकों तक चलती रही. अब देखना यह होगा कि यह विवाद केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहता है या फिर राष्ट्रवाद की राजनीति का एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनकर उभरता है.

राजेश कुमार पत्रकारिता जगत में पिछले करीब 14 सालों से ज्यादा वक्त से अपना योगदान दे रहे हैं. राष्ट्रीय और सामाजिक मुद्दों से लेकर अपराध जगत तक, हर मुद्दे पर वह स्टोरी लिखते आए हैं. इसके साथ ही, किसी खबरों पर किस तरह अलग-अलग आइडियाज के साथ स्टोरी की जाए, इसके लिए वह अपने सहयोगियों का लगातार मार्गदर्शन करते रहे हैं. इनकी अंतर्राष्ट्रीय जगत की खबरों पर खास नज़र रहती है, जबकि भारत की राजनीति में ये गहरी रुचि रखते हैं. इन्हें क्रिकेट खेलना काफी पसंद और खाली वक्त में पसंद की फिल्में भी खूब देखते हैं. पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखने से पहले उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में मास्टर ऑफ ब्रॉडकास्ट जर्नलिज्म किया है. राजनीति, चुनाव, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दों पर राजेश कुमार लगातार लिखते आ रहे हैं.
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