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Explained: सम्राट चौधरी ने गृह मंत्रालय अपने पास क्यों रखा? बिहार में कर्पूरी से लेकर नीतीश तक ट्रेंड क्या, इसके बिना कैसे कमजोर होता CM

Home Ministry Value: सम्राट चौधरी का गृह विभाग अपने पास रखना कोई नई बात नहीं, बल्कि एक पुरानी और अहम राजनीतिक परंपरा है. यह महज एक विभाग नहीं, बल्कि राज्य की सुरक्षा और CM की सर्वोच्चता की गारंटी है.

7 मई 2026 को जब बिहार के नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अपने मंत्रियों के बीच विभागों का बंटवारा किया, तो गृह विभाग सबकी नजर में आया. उन्होंने राज्य का सबसे ताकतवर गृह विभाग खुद अपने पास रख लिया. मजेदार बात यह है कि ठीक ऐसा ही उनसे पहले नीतीश कुमार भी करते थे और उनसे पहले भी यही होता आया है. आखिर यह 'गृह विभाग' ऐसा क्या है कि हर मुख्यमंत्री इसकी चाबी किसी और को क्यों नहीं देना चाहता? यह कोई कानूनी मजबूरी नहीं, बल्कि सत्ता की एक अनिवार्य शर्त है. आइए, इस पूरी परंपरा को गहराई से समझते हैं...

सवाल 1: सम्राट चौधरी और उनसे पहले नीतीश कुमार गृह विभाग अपने पास क्यों रखते रहे?

जवाब: इसकी सबसे बड़ी वजह है सत्ता पर पूरा कंट्रोल. गृह विभाग किसी भी राज्य सरकार की रीढ़ की हड्डी होता है. इसे अपने पास रखने का मतलब है कानून-व्यवस्था, पुलिस बल, खुफिया एजेंसियों और जेलों के संचालन पर सीधी कमान.

मुख्यमंत्री बनने के बाद सम्राट चौधरी ने न सिर्फ गृह, बल्कि सामान्य प्रशासन, मंत्रिमंडल सचिवालय, निगरानी और चुनाव जैसे अहम विभाग भी अपने पास रखे हैं. इसके पीछे एक बड़ी वजह यह है कि बिहार में कानून-व्यवस्था एक बड़ा मुद्दा है. गृह विभाग के जरिए मुख्यमंत्री सीधे अफसरों की ट्रांसफर-पोस्टिंग और पुलिस की कार्रवाई पर नजर रख सकता है.

इससे पहले नीतीश कुमार 2005 में पहली बार मुख्यमंत्री बने और करीब 20 सालों तक अपनी हर सरकार में गृह विभाग अपने पास रखा. उनका मानना था कि राज्य की कानून-व्यवस्था और भ्रष्टाचार पर अंकुश रखने के लिए यह विभाग सीधे मुख्यमंत्री के पास होना चाहिए. हालांकि, नवंबर 2025 में राजनीतिक मजबूरियों के चलते उन्हें यह विभाग पहली बार अपने उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी (बीजेपी) को सौंपना पड़ा था.

सवाल 2: क्या नीतीश कुमार से पहले भी बिहार में यह परंपरा थी?

जवाब: जी हां, यह महज नीतीश कुमार की निजी पसंद नहीं थी, बल्कि यह परंपरा 1977 से चली आ रही है:

  • कर्पूरी ठाकुर (1977-1979): जनता पार्टी सरकार में बिहार के मुख्यमंत्री बने कर्पूरी ठाकुर ने भी गृह विभाग अपने पास रखा. सामाजिक न्याय के इस बड़े नेता ने आपातकाल के बाद के दौर में कानून-व्यवस्था को मजबूत करने के लिए ऐसा किया था. हालांकि, इससे पहले 1972 में अपने पहले कार्यकाल के दौरान उन्होंने रामानंद तिवारी को गृह मंत्री बनाया था.
  • रामसुंदर दास (1979-1980): कर्पूरी ठाकुर के बाद जनता पार्टी के ही रामसुंदर दास मुख्यमंत्री बने. इसके बाद 1980 में कांग्रेस सरकार बनी. यह वह दौर था जब राजनीतिक अस्थिरता के कारण मुख्यमंत्रियों ने अपनी पकड़ मजबूत रखने के लिए गृह विभाग को अपने हाथ में रखना शुरू किया.
  • लालू प्रसाद यादव (1990-1997): जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव जब 1990 में मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने भी इसी परंपरा का पालन किया. उनके कार्यकाल में राजनीति का मंडल-कमंडल दौर था और राज्य में कानून-व्यवस्था कई बार सवालों के घेरे में रहती थी. ऐसे में, गृह विभाग पर उनकी पकड़ बहुत मायने रखती थी.
  • राबड़ी देवी (1997-2005): लालू प्रसाद यादव पर चारा घोटाले के आरोप लगने के बाद उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाया. तब राबड़ी देवी ने भी गृह विभाग अपने पास ही रखा. हालांकि, परोक्ष रूप से इसका कंट्रोल लालू प्रसाद यादव के पास ही माना जाता था.

सवाल 3: लेकिन क्या बिहार में कभी कोई और गृह मंत्री भी बना था?

जवाब: बिल्कुल, बिहार के राजनीतिक इतिहास में यह एक दुर्लभ अपवाद है. जब 2025 में सम्राट चौधरी को गृह मंत्री बनाया गया, तो वे करीब 58 सालों में किसी मुख्यमंत्री के अलावा यह पद संभालने वाले दूसरे नेता बने.

इससे पहले, रामानंद तिवारी नाम के एक प्रख्यात समाजवादी नेता ने यह कमान संभाली थी. उन्होंने दो बार बिहार के गृह मंत्री के रूप में काम किया था:

  • पहली बार 1967 में महामाया प्रसाद सिन्हा के नेतृत्व वाली संयुक्त विधायक दल की सरकार में.
  • दूसरी बार 1972 में कर्पूरी ठाकुर की सरकार में.

रामानंद तिवारी के बाद यह सिलसिला टूट गया और फिर अगले 58 सालों तक कोई भी मुख्यमंत्री इस विभाग को किसी और को सौंपने को तैयार नहीं हुआ. रामानंद तिवारी खुद एक बहुत बड़े नेता थे, जिन्होंने राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में मुख्यमंत्री पद के प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया था. यह बात उनके कद और प्रभाव को दर्शाती है.

सवाल 4: क्या यह परंपरा सिर्फ बिहार तक ही सीमित है?

जवाब: कतई नहीं. यह भारत के लगभग हर राज्य की राजनीति का एक अलिखित लेकिन स्थापित नियम है. कुछ बड़े उदाहरण देखिए:

  • उत्तर प्रदेश: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी अपनी दोनों सरकारों में गृह विभाग खुद अपने पास रखा है. उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और कानून-व्यवस्था की चुनौतियों से जूझने वाले राज्य में, यह विभाग सीएम के सीधे नियंत्रण में होने से पुलिसिया कार्रवाई और अपराध नियंत्रण पर सीधी पकड़ रहती है.
  • ओडिशा: नवीन पटनायक ने अपने 24 साल से भी लंबे मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान हमेशा गृह, सामान्य प्रशासन और लोक निर्माण जैसे विभाग अपने पास रखे.
  • महाराष्ट्र: यहां की राजनीति में भले ही गृह विभाग को लेकर अक्सर खींचतान होती है, लेकिन जब देवेंद्र फडणवीस 2014 में मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने भी यह विभाग अपने पास ही रखा.

यह लिस्ट बहुत लंबी है. आंकड़े बताते हैं कि देश के ज्यादातर राज्यों में मुख्यमंत्री ही गृह मंत्री होता है.

सवाल 5: आखिर इस परंपरा की शुरुआत कैसे और क्यों हुई?

जवाब: इस परंपरा की कोई एक निश्चित तारीख नहीं है, लेकिन इसकी 3 बड़ी वजहें हैं:

  1. सत्ता का असली केंद्र: गृह विभाग वह विभाग है जो पूरे प्रशासनिक ढांचे, पुलिस बल और खुफिया तंत्र को नियंत्रित करता है. यह मुख्यमंत्री को सबसे शक्तिशाली बनाता है.
  2. आपातकाल के बाद की सीख: 1975-77 के आपातकाल के दौरान संवैधानिक तंत्र के दुरुपयोग की कड़वी यादों के बाद, राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने अपनी सत्ता को किसी भी अतिक्रमण से बचाने के लिए इस विभाग को अपने हाथ में रखा. यही वजह है कि 1977 के बाद यह एक मजबूत चलन बन गया.
  3. राजनीतिक स्थिरता की गारंटी: खासकर गठबंधन सरकारों के दौर में गृह विभाग को अपने पास रखने से सरकार की असली बागडोर मुख्यमंत्री के हाथ में होती है. जैसे ही नीतीश कुमार ने यह विभाग बीजेपी को दिया, इसे उनके कमजोर होते राजनीतिक प्रभाव का संकेत माना गया.

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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