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Manusmriti: ‘न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हति’... मनुस्‍मृति आज भी प्रासंगिक, यह बताने के लिए BHU कर रहा रिसर्च 

Research On Manusmriti: बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी का एक विभाग प्राचीन भारतीय ग्रंथ मनुस्मृति पर शोध आयोजित करवा रहा है. इस अध्ययन पर सवाल उठ रहे हैं.

Manusmriti Study In BHU: मनुस्मृति ऐसा ग्रंथ है जो खूब विवादों में रहा है. कई बार इसकी प्रतियां जलाई गई हैं. मनुस्मृति एक संहिता ग्रंथ है जिसमें जाति व्यवस्था को लेकर नियम बताए गए हैं. इसी ग्रंथ में महिलाओं को परिवार की संपत्ति के रूप में वर्णित किया गया है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय (Banaras Hindu University) में मनुस्मृति पर रिसर्च हो रहा है. यह रिसर्च इस बात को लेकर किया जा रहा है कि मनुस्मृति आज भी प्रासंगिक है.

बीएचयू के धर्मशास्त्र मीमांसा विभाग में मनुस्मृति पर आज की उपयोगिता के संबंध में काम हो रहा है. इस शोध पर कुछ शिक्षाविदों ने सवाल उठाया है और कहा है कि मनुस्मृति जिस सामाजिक व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करती है, उसका आधुनिक समाज में कोई स्थान नहीं है.

बीएचयू के पाठ्यक्रम में है मनुस्मृति
शंकर कुमार मिश्रा बीएचयू में धर्मशास्त्र मीमांसा विभाग के अध्यक्ष हैं. वे शोध कार्यक्रम के प्रमुख इन्वेस्टिगेटर भी है. मनुस्मृति विभाग के पाठ्यक्रम का हिस्सा है. मिश्रा ने टेलीग्राफ को बताया कि मनुस्मृति की बातें आज भी प्रासंगिक हैं.

उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय ने केंद्र की इंस्टीट्यूशन ऑफ एमिनेंस योजना के तहत प्राप्त धन से शोध कार्यक्रम को मंजूरी दी है. इस योजना के तहत जो 10 चुनिंदा सार्वजनिक वित्त पोषित संस्थानों में से प्रत्येक को 1,000 करोड़ रुपये तक का अनुसंधान और विकास अनुदान (ग्रांट) दिया जाता है.

मनुस्मृति के अध्ययन का विरोध
कई विद्वान मनुस्मृति को आधुनिक समाज के विपरीत दिशा में ले जाने वाला ग्रंथ मानते हैं. इनमें जेएनयू के अमित थोराट और मैरीलैंड विश्वविद्यालय के ओंकार जोशी भी हैं. थोराट और जोशी ने भारत में छुआछूत पर किताब भी लिखी है. थोराट और जोशी का कहना है कि मनुस्मृति ने जाति व्यवस्था को संहिताबद्ध किया. उच्च जातियों के लिए शिक्षा और संसाधनों के अधिकार को संरक्षित किया. इस ग्रंथ ने निचली जाति कहे जाने वाले शूद्रों और अछूतों को उच्च जातियों की सेवा करने को मजबूर किया. इसमें महिलाओं को परिवार की संपत्ति के रूप में बताया गया.

मिश्रा ने किया बचाव
विभागाध्यक्ष शंकर मिश्रा मनुस्मृति का बचाव करते हैं. उनका कहना है कि मनुस्मृति की आलोचना ग्रंथों के बारे में कम जानकारी के चलते की जाती है. धार्मिक ग्रंथों में जो कुछ कहा गया है, उसका एक संदर्भ है. टेलीग्राफ से उन्होंने कहा, शोध का उद्देश्य इसमें कही बातों का संदर्भ में अध्ययन करना और उस भाषा में प्रस्तुत करना है जिसे आम लोग समझ सकें.

मिश्रा ने ग्रंथ में लिखी एक विवादित श्लोक की पंक्ति न स्त्री स्वातंत्रमर्हति का उदाहरण दिया, जिसका अर्थ है कि स्त्री को स्वतंत्र जीवन जीने की अनुमति नहीं देनी चाहिए. 

मिश्रा कहते हैं अगर आप इसके संदर्भ को देखेंगे तो कहा गया है कि यह आज भी प्रासंगिक है. यह उन महिलाओं के बारे में है जिनके कोई संतान या पति नहीं है. ऐसी महिलाओं को परिवार के सहयोग की आवश्यकता होती है.

इस श्लोक का विरोध
जानिए वह श्लोक क्या है जिसमें स्त्री को स्वतंत्र न रखने की बात की गई है. 

पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने
रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यं अर्हति

इसका अर्थ है कौमार्य (शादी से पहले) में पिता को, युवावस्था में पति को, वृद्धावस्था में पुत्र को स्त्री की रक्षा करनी चाहिए. स्त्री स्वतंत्रता के योग्य नहीं है.

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