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भगत सिंह की जयंती मनाने पाकिस्तान से भारत पहुंचे इम्तियाज़, लड़ रहे हैं इंसाफ की लड़ाई

लाहौर हाई कोर्ट में जल्द ही इस मसले पर संविधान पीठ के गठन की उम्मीद है. याचिका में फांसी के फैसले को अवैध घोषित करने, शहीदों को निर्दोष घोषित करने, परिवार को मुआवजा देने और ब्रिटिश सरकार से माफ़ी की मांग की गई है.

नई दिल्ली: शहीद ए आज़म भगत सिंह के चाहने वाले भारत में ही नहीं पाकिस्तान में भी हैं. भगत सिंह की फांसी को कानूनन गलत साबित करने के लिए पाकिस्तान में बकायदा कानूनी लड़ाई लड़ी जा रही है. इस बारे में लाहौर हाई कोर्ट में मुकदमा दाखिल करने वाले इम्तियाज़ रशीद कुरैशी इन दिनों भारत आए हुए हैं. शहीद ए आज़म का 110वां जन्मदिन मनाना उनका मकसद है. इम्तियाज़ रशीद कुरैशी और भारत से उनकी मदद कर रहे वकील नफीस अहमद सिद्दीकी से एबीपी न्यूज़ ने एक्सक्लूसिव बातचीत की. कुरैशी ने लाहौर हाई कोर्ट में दाखिल मुकदमे के बारे में विस्तार से बताया. उन्होंने कहा कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी देने की प्रक्रिया पूरी तरह अवैध थी. कानून की धज्जियां उड़ा कर ये फैसला किया गया और फांसी दी गई. लाहौर हाई कोर्ट में जल्द ही इस मसले पर संविधान पीठ के गठन की उम्मीद है. याचिका में फांसी के फैसले को अवैध घोषित करने, शहीदों को निर्दोष घोषित करने, परिवार को मुआवजा देने और ब्रिटिश सरकार से माफ़ी की मांग की गई है. दरअसल, इस याचिका की प्रेरणा भारतीय वकील नफीस अहमद सिद्दीकी का एक लेख बना. इस लेख में सिद्दीकी ने फांसी के लिए अपनाई गई कानूनी प्रक्रिया की कमियां गिनाईं थीं. उन्होंने ये दावा भी किया था कि एफआईआर में नाम न होने के बावजूद ज़बरन तीनों को दोषी ठहराया गया. उन्हें बचाव का मौका नहीं दिया गया. उनकी गैरमौजूदगी में फैसला सुना दिया गया. भारतीय अख़बार में छपे इस लेख को लाहौर के डेली ट्रिब्यून ने भी बाद में छापा. इम्तियाज़ रशीद कुरैशी ने इसे पढ़ा और 2013 में लाहौर हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर दी. हाई कोर्ट की सिंगल जज बेंच ने मामले की गंभीरता को समझा और बड़ी बेंच के गठन के लिए इसे चीफ जस्टिस के पास भेज दिया. 1931 में तीनों शहीदों की फांसी पर मुहर 3 जजों की बेंच ने लगाई थी. ऐसे में ये मसला 5 जजों की बेंच के पास भेजा जा सकता है. भारतीय वकील नफीस सिद्दीकी ने एबीपी न्यूज़ को बताया कि मुकदमे के लिए गठित विशेष कोर्ट का कार्यकाल 6 महीने का था. तब की नेशनल असेंबली की मंजूरी लिए बिना एक अध्यादेश के जरिए विशेष कोर्ट बनाई गई थी. इसके गठन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. इससे मामला कुछ दिनों के लिए रुक गया. बाद में विशेष कोर्ट ने आरोपियों की गैरमौजूदगी में फांसी का आदेश दिया. तब तक 6 महीने से ज़्यादा का वक़्त हो चुका था. इसलिए कोर्ट को फैसला देने का अधिकार ही नहीं था. नफीस सिद्दीकी ने बताया कि जब लाहौर हाई कोर्ट में मामले की आखिरी जिरह होगी, तब भारत से भी वकीलों की एक टीम वहां पेश होगी. भगत सिंह की जयंती 28 सितंबर को फिरोजपुर के हुसैनीवाला बॉर्डर पर मनाया जाएगी. ये वही जगह है जहां तय तारीख से एक दिन पहले फांसी के बाद अंग्रेजों ने तीनों शहीदों के शरीर को जलाने की कोशिश की थी. कार्यक्रम में भगत सिंह का परिवार भी मौजूद रहेगा.

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