Explained: 'आर्टेमिस 2' जैसा मिशन कब कर सकेगा भारत? NASA से कितने साल पीछे ISRO, जानें सबकुछ
ISRO vs NASA: अमेरिका ने 'आर्टेमिस 2' लगभग पूरा कर लिया है और भारत इसमें एक साइन करके शामिल हो गया. लेकिन सवाल है कि भारत कब ऐसा मिशन कर पाएगा? ISRO चीफ की चांद पर एस्ट्रोनॉट भेजने की प्लानिंग क्या?

अमेरिका ने आर्टेमिस 2 मिशन को लगभग पूरा कर लिया है. NASA के आर्टेमिस प्रोग्राम में भारत के शामिल होने की चर्चा भी हुई, क्योंकि भारत ने इस पर हस्ताक्षर किए थे. लेकिन अब आर्टेमिस के जश्न से बाहर निकलें तो सवाल उठता है कि भारत कब आर्टेमिस जैसा मिशन करेगा? क्या ISRO भी चांद के उस हिस्से में जा पाएगा, जहां कोई नहीं गया? अगर हां- तो कब? समझते हैं एक्सप्लेनर में...
सवाल 1: आर्टेमिस 2 मिशन क्या है और यह क्यों इतना खास है?
जवाब: नासा का आर्टेमिस 2 मिशन 1 अप्रैल 2026 को केनेडी स्पेस सेंटर से सफलतापूर्वक लॉन्च हुआ. इसमें 4 एस्ट्रोनॉट्स रीड वाइजमैन, विक्टर ग्लोवर, क्रिस्टीना कोच (नासा) और जेरेमी हांसन (कनाडा) ओरियन स्पेसक्राफ्ट में सवार होकर चांद के पास से फ्लाई-बाय किया. यह 10 दिन का मिशन था, जिसमें एस्ट्रोनॉट्स पृथ्वी से 2.52 लाख मील यानी करीब 4 लाख किलोमीटर दूर गए और चांद के पीछे 40 मिनट तक कम्युनिकेशन ब्लैकआउट का सामना किया.
यह 1972 के अपोलो 17 के बाद पहला मौका था जब इंसान लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) से बाहर गए. मिशन का मकसद ओरियन स्पेसक्राफ्ट, SLS रॉकेट और डीप स्पेस टेक्नोलॉजी को टेस्ट करना था. सफलता के बाद आर्टेमिस 3 का चांद पर लैंडिंग का रास्ता साफ हो गया.
इस मिशन में भारत भी हिस्सेदार था. भारत ने 50 देशों की लिस्ट में साइन किए थे, जिससे आर्टेमिस समझौता बना.
सवाल 2: अब सवाल है कि क्या भारत आर्टेमिस 2 जैसा मिशन कर सकता है?
जवाब: हां, भारत आर्टेमिस 2 जैसा मिशन कर सकता है. इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (ISRO) ने रोडमैप बनाया है, जिसमें 2038-39 तक पहला क्रूड लूनर फ्लाई-बाय या ऑर्बिट (Chandrayaan-H1) और 2040 तक क्रूड लूनर लैंडिंग (Chandrayaan-H2) भेजने का लक्ष्य है. भारत ने आर्टेमिस समझौते पर साइन किए हैं, इसलिए NASA के साथ सहयोग का पूरा रास्ता खुला है, लेकिन अभी हम सिर्फ LEO (पृथ्वी की निचली कक्षा) तक एस्ट्रोनॉट्स भेजने की तैयारी में हैं. इसकी शुरुआत गगनयान से होगी, फिर चंद्रयान-4 से चांद की तैयारी और फिर धीरे-धीरे डीप स्पेस तक पहुंचेंगे.
सवाल 3: भारत की मौजूदा स्थिति क्या है और गगनयान प्रोग्राम कहां पहुंचा है?
जवाब: ISRO का गगनयान भारत का पहला स्वदेशी मानवयुक्त स्पेस मिशन है...
- पहला अनक्रूड टेस्ट (G1) व्योमित्रा रोबोट के साथ मार्च 2026 में प्लान था, लेकिन अब 2026 के सेकेंड हाफ में होने की संभावना है. यह 90% तैयार हो चुका है.
- 2026 में कुल 3 अनक्रूड मिशन G1, G2 और G3 होना है.
- 2027 में 3 भारतीय एयरफोर्स पायलट्स प्रशांत बालकृष्णन, अजित कृष्णन, अंगद प्रताप और शुभांशु शुक्ला को LEO (300-400 किमी ऊंचाई) में 3-7 दिन के लिए भेजा जाएगा.
- LVM3 रॉकेट को पहले ही ह्यूमन-रेटेड कर लिया गया है. 8,000 से ज्यादा ग्राउंड टेस्ट हो चुके हैं.
यह सिर्फ LEO मिशन है. आर्टेमिस जैसा डीप स्पेस नहीं.
सवाल 4: भारत को आर्टेमिस 2 जैसा मिशन करने में कितना समय लगेगा? पूरा रोडमैप क्या है?
जवाब: ISRO चेयरमैन वी. नारायणन के मुताबिक:
- 2027: गगनयान क्रूड LEO मिशन.
- 2027-28: चंद्रयान-4 (अनक्रूड सैंपल रिटर्न).
- 2035: भारतीय स्पेस स्टेशन LEO में तैयार होगा.
- 2036-37: अनक्रूड मून लैंडिंग सीरीज.
- 2038-39: पहला क्रूड लूनर फ्लाई-बाय/ऑर्बिट (चंद्रयान-H1) यानी आर्टेमिस 2 जैसा मिशन.
- 2040: पहला क्रूड लूनर लैंडिंग यानी चंद्रयान-H2.
- 2047 तक: भारतीय चंद्र निवास यानी चांद पर स्थायी बेस.
PM मोदी के निर्देश पर 2040 तक भारतीयों को चांद पर उतारकर वापस लाना है. कुल 15-20 साल का समय लगेगा क्योंकि ISRO स्टेप-बाय-स्टेप, बिना जल्दबाजी के आगे बढ़ रहा है.
सवाल 5: तो अमेरिका के आर्टेमिस 2 से भारत कितना पीछे है?
जवाब: एक्सर्ट्स का मानना है कि भारत आर्टेमिस 2 जैसे मिशन में बहुत पीछे है.
- NASA ने 1969 में अपोलो 11 से चांद पर उतर चुका था और 57 साल बाद आर्टेमिस 2 लाया.
- भारत का पहला मानवयुक्त मिशन 2027 में सिर्फ LEO तक होगा.
- NASA का SLS रॉकेट 27 टन से ज्यादा पेलोड को चांद की तरफ ले जा सकता है. भारत का LVM3 सिर्फ 8 टन तक LEO में ले जा सकता है.
- ओरियन जैसा एडवांस्ड क्रू मॉड्यूल (डीप स्पेस रेडिएशन शील्डिंग, हाई-स्पीड री-एंट्री) भारत के पास अभी नहीं है.
- इसके अलावा बजट की बात करें तो एक आर्टेमिस लॉन्च करीब 4.1 बिलियन डॉलर (34,000 करोड़ रुपये) का है. भारत का पूरा चंद्रयान प्रोग्राम (3 मिशन) सिर्फ 2,000 करोड़ रुपये का है. नासा का एक साल का बजट ISRO के पूरे इतिहास से ज्यादा है. फिर भी ISRO ने चंद्रयान-3 जैसे मिशन सबसे सस्ते में किए.
Source: IOCL



























