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दक्षिण कोरिया की यात्रा पर सेना प्रमुख ने किया डीएमजेड का दौरा, दुनिया के सबसे खतरनाक बॉर्डर में से है एक

थलसेना प्रमुख जनरल एम एम नरवणे ने दक्षिण कोरिया के अपने तीन दिन की यात्रा को खत्म करने से पहले उत्तर कोरिया से सटे डीएमजेड बॉर्डर का दौरा किया.

दक्षिण कोरिया की अपनी तीन दिन की यात्रा खत्म होने से पहले थलसेना प्रमुख जनरल एम एम नरवणे ने उत्तर कोरिया से सटे डीएमजेड (बॉर्डर) का दौरा किया. डि-मिलिट्राइज जोन यानि डीएमजेड दुनिया के सबसे खतरनाक बॉर्डर में से एक माना जाता है जहां 250 किलोमीटर के दायरे में करीब 10 लाख सैनिक तैनात हैं और चप्पे-चप्पे पर लैंड-माइन्स बिछी हैं.

तीन दिन (28-30 दिसम्बर) की यात्रा पूरी होने पर जनरल नरवणे गुरूवार को भारत पहुंच गए. उनके भारत पहुंचने पर भारतीय सेना ने थलेसना प्रमुख की डीएमजेड का दौरा करने की तस्वीरें साझा की. इन तस्वीरों में दक्षिण कोरियाई सैनिक डीएमजेड पर उत्तर कोरिया की सीमा को थलसेना प्रमुख को दिखाते और वहां दोनों देशों की सेनाओं की तैनाती के बारे में ब्रीफिंग देते दिखे. डीएमजेड की सुरक्षा करने वाली दक्षिण कोरिया की 30वीं ब्रिगेड का भी जनरल नरवणे ने दौरा किया.

अमेरिकी सेना की एक कमान दक्षिण कोरिया में तैनात रहती है

आपको बता दें कि डीएमजेड कहने को तो डि-मिलिट्राइज जोन है लेकिन यहां सबसे ज्यादा सैनिक तैनात है. ये दुनिया का एकमात्र ऐसा बॉर्डर है जहां करीब दस लाख सैनिक तैनात हैं. इनमें करीब 6 लाख सैनिक उत्तर कोरिया के हैं और बाकी चार लाख दक्षिण कोरिया और अमेरिकी सेना के हैं. उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच हुए कोरियाई युद्ध (1950-53) के बाद से ही अमेरिकी सेना की एक कमान दक्षिण कोरिया में तैनात रहती है. डीएमजेड क्योंकि 38 पैरलल से होकर गुजरता है इसलिए इसे ‘38 पैरलल लाइन’ के नाम से भी जाना जाता है, जो कोरियाई प्रायद्वीप को दो भागों में विभाजित करता है- उत्तर और दक्षिण कोरिया.

250 किलोमीटर लंबे डीएमजेड के चप्पे-चप्पे पर लैंड माइन्स यानि बारूदी-सुरंग बिछी हैं और दोनों देशों के टैंक, तोप और मिसाइल तैनातें हैं. दोनों देशों ने पूरी डीएमजेड की तार-बंदी कर रखी है ताकि सैनिकों के साथ साथ दुश्मन देश के जासूसों को अपने देश में दाखिल ना होने दिया जाए. गौरतलब है कि एबीपी न्यूज की टीम तीन बार इस डीएमजेड का दौरा कर चुकी है. एक बार दक्षिण कोरियाई सरकार के बुलावे पर तो दूसरी बार वर्ष 2018 में उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच हुई शांति-वार्ता के लिए, जिसमें दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति, मून और उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन ने हिस्सा लिया था.

रक्षा मंत्री समेत चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी से रक्षा मंत्री ने मुलाकात की

थलेसना प्रमुख जनरल नरवणे के तीन दिवसीय दौरे से भारत और दक्षिण कोरिया के सैन्य संबंधों में एक नया आयाम जुड़ गया है. ये किसी भी भारतीय सेना प्रमुख की पहली कोरियाई यात्रा थी. अपने इस दौरे के दौरान थलसेना प्रमुख ने दक्षिण कोरिया के रक्षा मंत्री, अपने समकक्ष (कोरियाई सेना प्रमुख) और चैयरमैन, चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी से मुलाकात की. इसके अलावा कोरियाई सेना के कॉम्बेट ट्रेनिंग सेंटर और कोरिया की एडवांस डिफेंस डेवलपमेंट (एजेंसी) के मुख्यालय का भी दौरा किया.

दक्षिण कोरिया भले ही एक शांति-प्रिय देश हो लेकिन उत्तर कोरिया से चिर-परिचित दुश्मनी के चलते कोरियाई सेना (नौसेना और वायुसेना) हमेशा हाई-अलर्ट पर रहती है. उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन के सनकी रवैया और कोरियाई प्रायद्वीप में लगातार बैलस्टिक मिसाइलों के परीक्षण से उकसाने की कोशिश के चलते कोरियाई सेना डीएमजेड पर हमेशा कॉम्बेट-फॉर्म में रहती है. डीएमजेड की सुरक्षा इसलिए भी बेहद जरूरी है क्योंकि दक्षिण कोरिया की राजधानी, सियोल की दूरी वहां से मात्र 35 किलोमीटर की है.

भारत ने दक्षिण कोरिया से 100 के-9 वज्र तोप भी ली है

भारतीय सेना का दक्षिण कोरियाई सेना के साथ तालमेल इसलिए भी बेहद जरूरी है क्योंकि दक्षिण कोरिया में अमेरिका सेना की एक कमान है. जहां करीब 30 हजार सैनिक तैनात रहते हैं. अमेरिकी सेना के साथ ट्रैनिंग और ऑपेरशन्ली तैनात रहने के चलते कोरियाई सेना पूरी तरह से एक प्रोफेशनल-आर्मी है. दक्षिण कोरियाई के सैन्य-अफसर भारतीय सेना के नेशनल डिफेंस कॉलेज, स्टाफ कॉलेज और काउंटर इनसर्जेंसी एंड जंगल-वॉरफेयर स्कूल में कोर्स करने के लिए आते हैं. भारतीय सेना भी अपने अफसर्स को कोरिया की नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी और ज्वाइंट फोर्सेज मिलिट्री यूनिवर्सिटी में भेजती रही है. दक्षिण कोरिया हथियार और सैन्य उपकरणों के निर्माण में काफी अग्रणीय है जहां टैंक और तोप से लेकर युद्धपोत, पनडुब्बी, एयरोनोटिक्स और मिसाइल तक का निर्माण होता है. भारत ने दक्षिण कोरिया से 100 के-9 वज्र तोप भी ली है.

यही वजह है कि दोनों देशों के बीच ‘स्पेशल स्ट्रेटेजिक पार्टनर्शिप’ है. दोनों देशों के सामरिक और सैन्य संबंध भारत की ‘एक्ट-ईस्ट पॉलिसी’ और कोरिया की ‘नई दक्षिण नीति’ में आकर मिलते हैं. क्योंकि दोनों ही देशों के लिए चीन की दादागिरी एक बड़ी परेशानी का सबब है. भारत के लिए लाइन ऑफ कंट्रोल यानि एलएसी पर और दक्षिण कोरिया के लिए साउथ चायना सी में. इसके अलावा जहां चीन दक्षिण कोरिया के दुश्मन-देश उत्तर कोरिया और उसके तानाशाह किम जोंग उन को खुला समर्थन करता है तो वहीं भारत के दुश्मन पाकिस्तान को भारत के खिलाफ उकसाता है.

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नीरज राजपूत वॉर, डिफेंस और सिक्योरिटी से जुड़े मामले देखते हैं. पिछले 20 सालों से पत्रकारिता के क्षेत्र में हैं और प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया का अनुभव है. एबीपी न्यूज के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अनकट के 'फाइनल-असॉल्ट' कार्यक्रम के प्रेजेंटर भी हैं.
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