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IN DETAIL: क्या है राफेल डील और क्या हैं इस फाइटर प्लेन की खासियतें?

यूपीए सरकार ने 600 करोड़ रुपये में एक राफेल का सौदा किया था. अब बताया जा रहा है कि सरकार को एक राफेल करीब 1600 करोड़ रुपये का पड़ेगा.

नई दिल्ली: राफेल हवा से हवा में मार करने वाली दुनिया की सबसे घातक मिसाइल मेटेओर से लैस है.  मेटेओर मिसाइल 100 किलोमीटर दूर उड़ रहे फाइटर जेट को मार गिराने में सक्षम है  और ये चीन-पाकिस्तान सहित पूरे एशिया में किसी के पास नहीं है.

 इसके अलावा राफेल में हवा से सतह पर मार करने वाली सबसे खतरनाक क्रूज़ मिसाइल स्कैल्प है. जो करीब 560 किलोमीटर दूर तक मार कर सकती है. राफेल हवा से हवा में मार करने वाली खतरनाक माइका मिसाइल से भी लैस है जो 50 किलोमीटर तक के टारगेट को मार सकती है.

यूपीए सरकार ने 600 करोड़ रुपये में एक राफेल का सौदा किया था. अब बताया जा रहा है कि सरकार को एक राफेल करीब 1600 करोड़ रुपये का पड़ेगा.

राफेल डील में क्या है?

राफेल डील में 50 प्रतिशत ऑफसेट क्लॉज यानि प्रावधान है. यानि इस सौदे की पचास प्रतिशत कीमत को रफाल बनाने वाली कंपनी, दसॉल्ट को भारत में ही रक्षा और एयरो-स्पेस इंडस्ट्री में लगाना होगा. इसके लिए दसॉल्ट कंपनी ने भारत की रिलायंस इंडस्ट्री से करार किया है.  अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस इंडस्ट्री ने जो कंपनी बनाई है, उसके साथ मिलकर दसॉल्ट कंपनी भारत में ज्वाइंट वेंचर कर रही है. ये दोनों मिलकर भारत में नागरिक विमानों के स्पेयर पार्ट्स बनाने जा रही हैं.

हालांकि रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने मंगलवार को राज्यसभा को बताया था कि "36 राफेल आईजीए (इंटर गर्वमेंटल एग्रीमेंट) में ऑफसेट्स की मात्रा 50 प्रतिशत है, जिसमें योग्य उत्पादों और सेवाओं के निर्माण या रखरखाव के लिए प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण में निवेश शामिल हैं.

रक्षा मंत्रालय के उच्च सूत्रों ने बताई राफेल की बढ़ी कीमत की वजह

सरकार ने गोपनीयता का हवाला देकर राफेल डील की कीमत नहीं बताई है, लेकिन रक्षा मंत्रालय के उच्च सूत्रों ने राफेल की बढ़ी कीमत की वजह बताई.

 राफेल के 36 विमानों की कीमत 3402 मिलियन यूरो है. यानी 27 हजार 216 करोड़ रुपये. विमानों के स्पेयर पार्ट्स के लिए 14 हजार 400 करोड़ रुपये. जलवायु के अनुरूप बदलाव करने में 13 हजार 600 करोड़ रुपये और उसके यहां रखरखाव के इंतजाम करने में 2 हजार 824 करोड़ रुपये खर्च पड़ा है. सब जोड़कर 36 राफेल की डील 58 हजार 40 करोड़ रुपये में हुई और इस तरह एक राफेल 1612 करोड़ रुपये का पड़ा.

यूपीए के समय की डील सिर्फ विमान- सूत्र

 मोदी सरकार के सूत्रों के मुताबिक, यूपीए के समय में जो डील हुई थी वो सिर्फ राफेल विमान की थी. उसमें हथियार और दूसरे उपकरण नहीं थे. बता दें कि विमान उड़ाने में नट-बोल्ट खराब हो जाते हैं, जो पार्ट्स इंपोर्ट करने पड़ते हैं वो बहुत महंगे मिलते हैं. उनकी खरीद प्रक्रिया में लंबा समय लगता है. जिसके चलते विमान लंबे समय तक हैंगर में ही खड़े रह जाते और उड़ नहीं पाते थे. इसलिए अब जरूरी कल-पुर्जे कंपनियों से पहले ही खरीद लिए जाते हैं.

 क्यों बढ़ी डील की कीमत?

 इस डील में राफेल लड़ाकू विमान के रखने की जगह से लेकर खराब होने पर होने वाले बदलावों का खर्च भी शामिल कर लिया गया है. माना जा रहा है कि पहला राफेल विमान सितंबर 2019 तक वायुसेना के जंगी बेड़े में शामिल हो जाएगा. राफेल का पहला बेड़ा अंबाला में तैनात किया जाएगा और पश्चिम बंगाल के हाशिमारा बेस पर एक स्क्वाड्रन की तैनाती होगी. यानी पाकिस्तान से निपटने के लिए अंबाला में राफेल तैनात रहेंगे और चीन को हद बताने के लिए हाशिमारा में राफेल की तैनाती होगी.

फ्रांस की कंपनी, डेसॉल्ट (Dassault) 227  करोड़ रूपये की लागत से बेस में मूलभूत सुविधाएं तैयार कर रही है. जिसमें विमानों के लिए रनवे, पाक्रिंग के लिए हैंगर और ट्रेनिंग के लिए सिम्युलेटर शामिल है. सिम्यूलेटर मतलब वैसे ही सुविधाएं से लैस मॉडल जो ट्रेनिंग के लिए उपलब्ध कराया जाता है.

जानकारी के मुताबिक राफेल बनाने वाली कंपनी से भारत ने ये भी सुनिश्चित कराया है कि एक समय में 75 प्रतिशत प्लेन हमेशा ऑपरेशनली-रेडी रहने चाहिए. यानी हमले के लिए तैयार. इसके अलावा भारतीय जलवायु और लेह-लद्दाख जैसे इलाकों के लिए खास तरह के उपकरण भी राफेल में लगाए गए हैं.

जिस राफेल डील पर राजनीति हो रही है उसे खरीदना इतना जरूरी क्यों है?

पाकिस्तान-चीन से अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए एयरफोर्स को कम से कम 42 स्क्वाड्रन की ज़रूरत है. आज की तारीख में वायुसेना के पास 31 स्क्वाड्रन हैं. एक स्क्वाड्रन में 18 लड़ाकू विमान होते हैं.

दो स्क्वाड्रन में रफाल के 36 लड़ाकू विमान होंगे. यानी लड़ाकू विमानों की कमी तो है लेकिन जो राफेल वायुसेना के बेड़े में शामिल होगा तो भारत को नई ताकत मिलेगी, क्योंकि अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, लीबिया और माली में हुए ऑपरेशंस में इसका इस्तेमाल हो चुका है.

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