बोर्ड के अनुसार, देशभक्ति का आकलन किसी गीत या नारे से नहीं, बल्कि देश, संविधान और नागरिकों के अधिकारों के प्रति प्रतिबद्धता से होता है। देश से प्रेम करना और देश की पूजा करना दो अलग बातें हैं।
वंदे मातरम् बिल पास होने पर AIMPLB ने जताई आपत्ति, जानें क्या कहा?
Vande Mataram Bill: बिल को लेकर बोर्ड ने कहा कि कानून के माध्यम से किसी विशेष धार्मिक अवधारणा या विश्वास को सभी नागरिकों पर थोपना भारतीय संविधान की मूल भावना के अनुरूप नहीं है.

- सरकार वास्तविक मुद्दों पर केंद्रित रहे, विभाजनकारी कदमों से बचे।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने संसद के दोनों सदनों की तरफ से पारित उस संशोधन विधेयक पर गंभीर चिंता व्यक्त की है, जिसके तहत वंदे मातरम् के कथित अपमान को दंडनीय अपराध बनाया गया है. बोर्ड का कहना है कि यह कदम संविधान, धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है और नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता पर गंभीर हमला है.
बोर्ड के अनुसार, कानून के माध्यम से किसी विशेष धार्मिक अवधारणा या विश्वास को सभी नागरिकों पर थोपना भारतीय संविधान की मूल भावना के अनुरूप नहीं है.
वंदे मातरम् पर क्या बोले AIMPLB के प्रवक्ता?
बोर्ड के प्रवक्ता डॉ. एसक्यूआर इलियास ने कहा, ‘सभी वर्गों और धार्मिक समुदायों के लोगों के लिए वंदे मातरम् को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाना न केवल आपत्तिजनक है, बल्कि संविधान के मूल सिद्धांतों के भी खिलाफ है.’
उन्होंने कहा, ‘संविधान निर्माण के समय संविधान सभा ने विस्तृत विचार-विमर्श के बाद वंदे मातरम् के केवल पहले दो अंतरों को ही राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किया था. गीत के अन्य हिस्सों में मौजूद धार्मिक संदर्भों को देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के अनुरूप नहीं माना गया था.’
वंदे मातरम् में देवी की पूजा का आह्वान किया गयाः इलियास
डॉ. इलियास ने मुताबिक, वंदे मातरम् के कुछ अंशों में मातृभूमि को देवी के रूप में प्रस्तुत किया गया है और उसकी पूजा का आह्वान किया गया है. उनका कहना है कि यह अवधारणा इस्लाम के मूल सिद्धांत तौहीद (ईश्वर की पूर्ण एकता) के विपरीत है. उन्होंने कहा, ‘मुसलमान केवल एक ईश्वर, अल्लाह, की इबादत करता है और किसी अन्य को उसके साथ साझीदार मानना इस्लामी आस्था के खिलाफ है. इसलिए किसी मुसलमान को ऐसे गीत, नारे या गतिविधि में भाग लेने के लिए बाध्य करना, जिसका धार्मिक अर्थ उसकी आस्था के विपरीत हो, स्वीकार्य नहीं है.’
उन्होंने आगे कहा, ‘भारतीय संविधान का अनुच्छेद-25 प्रत्येक नागरिक को अपनी धार्मिक आस्था को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है, जबकि अनुच्छेद-19 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है. इन संवैधानिक प्रावधानों का स्पष्ट अर्थ है कि किसी भी नागरिक को उसकी धार्मिक मान्यताओं या अंतरात्मा के विरुद्ध किसी गीत, नारे, विचारधारा या प्रतीक को अपनाने या उसमें भाग लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता.’
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का डॉ. इलियास ने किया जिक्र
डॉ. इलियास ने बिजो एमैनुअल बनाम केरल राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का भी उल्लेख किया. उन्होंने कहा, ‘अदालत ने राष्ट्रगान जन गण मन के संदर्भ में भी यह सिद्धांत स्वीकार किया था कि यदि किसी व्यक्ति की धार्मिक मान्यताएं किसी गतिविधि में भाग लेने की अनुमति नहीं देतीं, तो उसे इसके लिए दंडित नहीं किया जा सकता. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि कुछ परिस्थितियों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में मौन रहने का अधिकार भी शामिल है और सम्मानपूर्वक भाग न लेना अपमान नहीं माना जा सकता.’
उन्होंने इस पर भी सवाल खड़े किए कि मातृभूमि से प्रेम और मातृभूमि की पूजा, दोनों अलग-अलग बातें हैं. मुसलमान अपने देश से गहरा प्रेम करते हैं और इसे अपना नागरिक तथा नैतिक दायित्व मानते हैं, लेकिन वे देश को देवी या ईश्वर का स्वरूप नहीं मान सकते. उन्होंने कहा कि देशभक्ति का आकलन किसी विशेष गीत या नारे के आधार पर नहीं, बल्कि देश, संविधान, नागरिकों और उनके अधिकारों के प्रति व्यक्ति की प्रतिबद्धता के आधार पर होना चाहिए.
उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि वह बेरोजगारी, महंगाई, गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, आर्थिक असमानता और सामाजिक न्याय जैसे वास्तविक मुद्दों पर ध्यान दें, न कि ऐसे संवेदनशील और विभाजनकारी कदम उठाए जो धार्मिक विवादों को बढ़ावा दें. उनका कहना था कि भावनात्मक और धार्मिक विवादों के जरिए लोगों का ध्यान मूल समस्याओं से हटाना न तो राष्ट्रीय हित में है और न ही लोकतंत्र के लिए उचित है.
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