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चार्जशीट पर सुप्रीम कोर्ट का क्या है आदेश, जानिए एफआईआर से ये कितना होती है अलग?

सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला दिया है कि चार्जशीट यानी आरोप पत्र को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता है. इसके साथ ही अब इस बात की भी गुंजाइश खत्म हो गई है कि इसको आरटीआई के तहत हासिल किया जा सकता है.

एफआईआर और चार्जशीट जैसे शब्द तो हम सभी ने सुने हैं लेकिन वास्तव में इनका मतलब क्या होता है और  ये वास्तविकता में एक दूसरे से कितने अलग होते हैं इस बात की जानकारी लोगों को कम ही है. 

हाल ही के दिनों में एक  जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है कि सीबीआई, ईडी या पुलिस कोई भी जांच एजेंसी चार्जशीट को सार्वजनिक नहीं करेगा. जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस सीटी रविकुमार की पीठ ने ये फैसला दिया है.

दरअसल सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल कर चार्जशीट को सार्वजनिक करने की मांग की गई थी. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चार्जशीट सार्वजनिक दस्तावेज नहीं है और इसे ऑनलाइन अपलोड नहीं किया जा सकता है.

कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि चार्जशीट 'इंडियन एविडेंस एक्ट' की धारा 74 के तहत सार्वजनिक दस्तावेज को अंतर्गत नहीं आता है, साथ ही इसे सार्वजनिक करने से अपराधी या पीड़ित किसी को भी फायदा होते नजर नहीं आता.

दरअसल कोर्ट ने एफआईआर को सार्वजनिक करने का आदेश दिया था. इसके पीछे तर्क था कि आरोपी को यह पता चल सके कि उसके खिलाफ क्या मामला दर्ज हुआ है. अब यहां ये समझने वाली बात ये है कि एफआईआर और चार्जशीट में क्या फर्क होता है.

इस सवाल को लेकर जब सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता से बातचीत की गई तो उन्होंने बताया कि सीआरपीसी की धारा-154 के तहत एफआईआर दर्ज होती है. पुलिस 60 से 90 दिन के भीतर अपराध की जांच करके मजिस्ट्रेट के सामने चार्जशीट फाइल करती है. इसके लिए सीआरपीसी की धारा-173 में प्रावधान हैं. समय पर चार्जशीट फाइल नहीं होने पर सीआरपीसी क़ानून की धारा-169 के तहत अभियुक्त को जमानत मिलने का कानूनी अधिकार है.

विराग गुप्ता ने बताया कि एफआईआर दर्ज होने से कोई व्यक्ति गुनहगार नहीं होता. चार्जशीट दाखिल होने के बाद मजिस्ट्रेट जब अपराध का संज्ञान लेते हैं तो उसके बाद व्यक्ति को अभियुक्त माना जाता है और सजा के बाद उसे दोषी करार दिया जाता है.
 
वकील विराग गुप्ता ने बताया कि एफआईआर कुछ पेज का दस्तावेज होता है जिसमें शिकायतकर्ता, शिकायत और संदिग्ध व्यक्तियों का विवरण होता है. जबकि चार्जशीट कई बार हजारों पेज की होती है जिसमे बयान और सबूत शामिल होते हैं.

चार्जशीट में अपराध, अपराध में शामिल नामों की जानकारी, सूचना की प्रकृति, आरोपी गिरफ्ता है, या बाहर है, उसके खिलाफ कोई कार्रवाई की गई या नहीं, ये सारी महत्त्वपूर्ण जानकारी शामिल होती है.
 
चार्जशीट तैयार करने के बाद पुलिस स्टेशन का प्रभारी इसे एक मजिस्ट्रेट के सामने पेश करता है, जिससे इसमें बताए गए अपराधों पर किस प्रकार की कार्रवाई होनी चाहिए , इन पर नोटिस लेने का अधिकार है या नहीं ताकि आरोप तय किये जा सकें.

सुप्रीम कोर्ट ने चार्जशीट को सार्वजनिक करने से क्यों इनकार किया?
विराग गुप्ता ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक एविडेंस एक्ट की धारा-74 और 76 के अनुसार इन्हें सार्वजनिक दस्तावेज नहीं माना जा सकता है.

चार्जशीट को सार्वजनिक करने का क्या असर हो सकता है?
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के 2016 के फैसले का उल्लेख किया था जिसके तहत एफआईआर का विवरण अपलोड करने का आदेश दिया गया था. लेकिन वर्तमान मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एफआईआर और चार्जशीट दोनों अलग हैं. एफआईआर को सार्वजनिक करने के पीछे अभियुक्तों के कानूनी अधिकार सुरक्षित करने का मकसद था. जबकि चार्जशीट को सार्वजनिक करने से उनकी व्यक्तिगत और संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक हो सकती है. इससे अभियोजन पक्ष, जांच एजेंसी और अभियुक्त किसी को भी लाभ नहीं होगा. 

क्या चार्जशीट RTI के दायरे में हासिल की जा सकती है?
विराग गुप्ता ने बताया कि अभियुक्त को मुकदमे की पैरवी के लिए सभी दस्तावेजों के साथ चार्जशीट मिलती है. यदि दस्तावेजों में कोई कमी हो तो जांच एजेंसी या फिर अदालत के माध्यम से अभियुक्त के परिवारजन या वकील चार्जशीट को हासिल कर सकते हैं.  सुप्रीम कोर्ट ने एविडेंस एक्ट की धारा-75 के तहत चार्जशीट को प्राइवेट डाक्यूमेंट माना है. इसलिए इसे आरटीआई के तहत हासिल करना मुश्किल है. 

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