विशेष: तुलसीदास ने रामचरितमानस संस्कृत में क्यों नहीं लिखी? जानें दिलचस्प कहानी
Tulsidas Jayanti Special: WhatsApp पर भेजते हैं रामचरितमानस की चौपाइयां, लेकिन क्या जानते हैं तुलसीदास ने इसे संस्कृत में क्यों नहीं लिखा? कहानी बेहद दिलचस्प है.

Tulsidas Jayanti Special: सुबह का समय हो, कोई त्योहार हो या जिंदगी में मुश्किल दौर, WhatsApp खोलते ही रामचरितमानस की कोई न कोई चौपाई सामने आ जाती है. कभी परिवार के ग्रुप में, कभी Instagram Reel पर तो कभी किसी दोस्त की स्टोरी में. सदियां बीत गईं, लेकिन तुलसीदास की लिखी पंक्तियां या चौपाई आज के डिजिटल दौर में भी लोगों की रोजमर्रा की भाषा का हिस्सा हैं.
पर क्या आपने कभी सोचा है कि संस्कृत के विद्वान होने के बावजूद गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस संस्कृत में क्यों नहीं लिखी? इसके पीछे केवल भाषा का चुनाव नहीं, बल्कि भारत में भक्ति को जन-जन तक पहुंचाने वाली एक बड़ी सोच और बेहद दिलचस्प लोककथा जुड़ी हुई है.
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संस्कृत जानते थे तुलसीदास, फिर अवधी क्यों चुनी?
गोस्वामी तुलसीदास 16वीं शताब्दी के महान संत और कवि थे. उन्हें संस्कृत का अच्छा ज्ञान था. उस समय धर्म, दर्शन और शास्त्रों के प्रमुख ग्रंथ संस्कृत में लिखे जाते थे. संस्कृत विद्वानों और पंडितों की भाषा मानी जाती थी, लेकिन आम लोगों के लिए उसे पढ़ना और समझना आसान नहीं था.
तुलसीदास चाहते थे कि भगवान राम की कथा केवल मंदिरों, मठों या विद्वानों तक सीमित न रहे. गांव में रहने वाला किसान, घर में काम करने वाली महिला और पढ़ना-लिखना न जानने वाला व्यक्ति भी रामकथा को सुन और समझ सके. इसलिए उन्होंने उस समय उत्तर भारत में बोली और समझी जाने वाली अवधी को रामचरितमानस की मुख्य भाषा बनाया.
यही वजह है कि मानस की चौपाइयां कठिन दर्शन समझाने के बाद भी लोगों को अपनी भाषा जैसी लगती हैं. उन्हें पढ़ना, याद करना और गाकर सुनाना आसान था.
क्या भगवान शिव ने दिया था अवधी में लिखने का आदेश?
तुलसीदास के जीवन से जुड़ी एक प्रसिद्ध लोकमान्यता इस फैसले को और रोचक बनाती है. कथा के अनुसार तुलसीदास शुरुआत में संस्कृत में काव्य रचना करते थे. वे दिन में जो श्लोक लिखते, वे रात में गायब हो जाते थे. ऐसा लगातार कई दिनों तक हुआ.
मान्यता है कि इसके बाद भगवान शिव ने तुलसीदास को स्वप्न में दर्शन दिए और उनसे अपनी भाषा में काव्य रचने को कहा. भगवान शिव की प्रेरणा मानकर तुलसीदास ने लोकभाषा में रामकथा लिखने का निश्चय किया. वे एक स्थान पर लिखते भी हैं-
स्वपनहूं सांचेहु मोहि पर जौ हरगौरी पसाउ।
तौ फुर होउ जो कहेउं सब भाषा भनिति प्रभाउ।।
यह एक धार्मिक लोककथा है, ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित घटना नहीं. तुलसीदास ने स्वयं किसी अलग दस्तावेज में यह दर्ज नहीं किया कि संस्कृत छोड़कर अवधी चुनने का उनका केवल यही कारण था. इतिहास की दृष्टि से सबसे मजबूत कारण यही माना जाता है कि वे रामकथा को सामान्य लोगों तक पहुंचाना चाहते थे.
रामनवमी से शुरू हुई थी रामचरितमानस की रचना
प्रचलित मान्यता के अनुसार तुलसीदास ने विक्रम संवत 1631 यानी 1574 ईस्वी में रामनवमी के दिन अयोध्या में रामचरितमानस की रचना शुरू की. इस ग्रंथ में सात कांड या सोपान हैं-
- बालकांड
- अयोध्याकांड
- अरण्यकांड
- किष्किंधाकांड
- सुंदरकांड
- लंकाकांड और उत्तरकांड
रामचरितमानस केवल वाल्मीकि रामायण का सरल अनुवाद नहीं है. तुलसीदास ने रामकथा को भक्ति, नीति, परिवार, आदर्श शासन और मानवीय रिश्तों से जोड़कर अपने ढंग से प्रस्तुत किया. इसकी मुख्य भाषा अवधी है, लेकिन इसमें संस्कृत सहित दूसरी भारतीय भाषाओं और बोलियों का प्रभाव भी दिखाई देता है.
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विद्वानों का विरोध भी झेलना पड़ा
लोकभाषा में इतना बड़ा धार्मिक ग्रंथ लिखना उस दौर में सामान्य बात नहीं थी. परंपराओं में उल्लेख मिलता है कि वाराणसी के कुछ संस्कृत विद्वानों ने इसका विरोध भी किया. उन्हें शायद यह स्वीकार करना कठिन लगा कि गहरे धार्मिक और दार्शनिक विषयों को आम लोगों की भाषा में लिखा जा सकता है.
लेकिन मानस की लोकप्रियता को रोका नहीं जा सका. लोग इसकी चौपाइयां याद करने लगे, घरों में पाठ होने लगा और रामलीला जैसी परंपराओं को नई ताकत मिली. आधुनिक प्रकाशन की सुविधा न होने के बावजूद तुलसीदास की रचनाएं जन-जन तक पहुंच गई थीं. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र भी रामचरितमानस को उनकी सर्वाधिक लोकप्रिय कृति बताता है.
तब मौखिक परंपरा, आज WhatsApp और Reels
जिस काम को तुलसीदास ने लगभग साढ़े चार सौ साल पहले अवधी चुनकर किया था, वही काम आज सोशल मीडिया कर रहा है. तब चौपाइयां कथा, पाठ और भजन के जरिए एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंचती थीं. आज वे WhatsApp स्टेटस, YouTube Shorts और Instagram Reels के जरिए आगे बढ़ रही हैं.
तुलसीदास शायद अपने समय के सबसे प्रभावशाली जन-संचारकों में से एक थे. उन्होंने समझ लिया था कि कोई संदेश तभी समाज में टिकता है, जब वह लोगों की भाषा में हो.
उनका यह निर्णय कितना दूरदर्शी था, इसका प्रमाण यह है कि रामचरितमानस की सचित्र पांडुलिपियों को 2024 में UNESCO के Memory of the World Asia-Pacific Regional Register में शामिल किया गया. UNESCO ने भी इसे 16वीं शताब्दी में अवधी भाषा में रची गई हिंदू साहित्य की महान कृतियों में माना है.
इसलिए अगली बार जब रामचरितमानस की कोई चौपाई WhatsApp पर भेजें, तो याद रखिएगा उसका आपके फोन तक पहुंचना संयोग नहीं है. तुलसीदास ने उसे सदियों पहले ही आम लोगों की भाषा में लिखकर हर पीढ़ी तक पहुंचने योग्य बना दिया था.
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