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Jagannath Rath Yatra 2026: रथ नहीं, नाव से होती थी भगवान जगन्नाथ की यात्रा! IIT खड़गपुर की रिसर्च ने खोला 700 साल पुराना रहस्य

Jagannath Rath Yatra 2026: क्या आप जानते हैं कि कभी भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा बीच रास्ते रुकती थी? मालिनी नदी पार कराने के लिए नाव का सहारा लिया जाता था, IIT की रिसर्च ने इस रहस्य को फिर चर्चा में ला दिया.

Jagannath Rath Yatra 2026: पुरी की जगन्नाथ रथ यात्रा दुनिया के सबसे भव्य धार्मिक आयोजनों में गिनी जाती है. आज भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के तीनों रथ श्रीमंदिर से सीधे गुंडीचा मंदिर तक पहुंचते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक समय ऐसा भी था जब यह यात्रा बीच रास्ते में रुक जाती थी? 

इसके पीछे वजह थी मालिनी नदी, जो कभी श्रीमंदिर और गुंडीचा मंदिर के बीच बहती थी. धार्मिक परंपराओं में इस नदी का विशेष उल्लेख मिलता है और हाल के सालों में हुए वैज्ञानिक शोध ने भी इस प्राचीन मान्यता को नई मजबूती दी है. आइए जानते हैं शारदा बाली, मालिनी नदी और रथ यात्रा से जुड़ी यह अनोखी कहानी.

जब रथ यात्रा दो चरणों में होती थी:

प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, आज जिस मार्ग को बड़ा डंडा (Grand Road) कहा जाता है, वहां कभी मालिनी नदी बहती थी. यह भार्गवी नदी की एक शाखा(Tributary) मानी जाती थी. नदी श्री जगन्नाथ मंदिर और गुंडीचा मंदिर के बीच प्राकृतिक अवरोध का काम करती थी.

इसी कारण उस समय रथ यात्रा एक ही बार में पूरी नहीं हो पाती थी. पहले चरण में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा अपने-अपने रथों पर सवार होकर मालिनी नदी के किनारे तक पहुंचते थे. इसके बाद विग्रहों को सम्मानपूर्वक रथों से उतारकर विशेष नावों के जरिए नदी पार कराई जाती थी. नदी के दूसरे किनारे पहले से तीन अन्य रथ तैयार रहते थे, जिन पर विराजमान होकर भगवान गुंडीचा मंदिर तक पहुंचते थे. इस तरह कुल छह रथों के माध्यम से यात्रा पूरी होती थी.

रानी शारदा देवी के सपने से बदली परंपरा:

लोक मान्यताओं के अनुसार, 13वीं शताब्दी में गजपति राजा नरसिंह देव की पत्नी रानी शारदा देवी को सपने में भगवान जगन्नाथ के दर्शन हुए. कहा जाता है कि भगवान ने इच्छा व्यक्त की कि उनकी यात्रा बिना किसी रुकावट के सीधे गुंडीचा मंदिर तक पहुंचे.

रानी ने इसे ईश्वरीय आदेश मानते हुए मालिनी नदी को बंद करने का संकल्प लिया. जब इस विशाल कार्य के लिए राजकोष पर्याप्त नहीं रहा, तब पुरी और आसपास के क्षेत्रों के हजारों श्रद्धालु स्वयं आगे आए. लोगों ने समुद्र तट से अपने हाथों से रेत लाकर नदी के मुहाने को भरना शुरू किया. लंबे सामूहिक प्रयास के बाद नदी का मार्ग बंद कर दिया गया.

इसी ऐतिहासिक और धार्मिक घटना की स्मृति में उस विशाल रेतीले क्षेत्र का नाम शारदा बाली रखा गया. 'शारदा' रानी के नाम का प्रतीक माना गया, जबकि 'बाली' का अर्थ रेत होता है. इसके बाद रथ यात्रा केवल तीन रथों के साथ बिना रुके पूरी होने लगी.

क्या वैज्ञानिक शोध भी इस कहानी का समर्थन करता है?

धार्मिक मान्यताओं के अलावा इस विषय पर वैज्ञानिकों ने भी अध्ययन किया है. साल 2020 में IIT खड़गपुर के भूविज्ञान एवं भूभौतिकी विभाग के शोधकर्ताओं ने पुरी क्षेत्र में विस्तृत अध्ययन किया. इस शोध का उद्देश्य यह पता लगाना था कि क्या बड़ा डंडा के नीचे वास्तव में किसी प्राचीन नदी का अस्तित्व था.

शोधकर्ताओं ने ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार (Ground Penetrating Radar - GPR) और पैलियो-चैनल (Paleo-channel) टैकनोलजी का उपयोग किया. पैलियो-चैनल उस प्राचीन नदी के मार्ग को कहा जाता है, जो समय के साथ जमीन के नीचे दब जाता है.

अध्ययन में बड़ा डंडा के नीचे लगभग 128 मीटर चौड़ा सूखा नदी मार्ग मिलने की बात सामने आई. मिट्टी के विश्लेषण में यह भी पाया गया कि वहां मौजूद रेत सामान्य नदी की नहीं बल्कि समुद्री रेत (Marine Sand) जैसी विशेषताओं वाली थी. शोधकर्ताओं ने इसे इस संभावना से जोड़ा कि किसी समय इस नदी को बाहरी रेत लाकर कृत्रिम रूप से भरा गया होगा.

लेकिन, यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि वैज्ञानिक शोध भू-आकृतिक साक्ष्य प्रस्तुत करता है, जबकि रानी शारदा देवी के सपने और उससे जुड़ी घटनाएं मुख्य रूप से धार्मिक परंपराओं और लोककथाओं का हिस्सा हैं. दोनों को उनके-अपने संदर्भ में समझना उचित माना जाता है.

आस्था और इतिहास का अनोखा संगम:

पुरी की रथ यात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है. शारदा बाली और मालिनी नदी की कथा इस विरासत को और भी रोचक बनाती है. एक ओर लोक मान्यताएं भगवान जगन्नाथ की इच्छा और रानी शारदा देवी के समर्पण की कहानी सुनाती हैं, तो दूसरी ओर आधुनिक वैज्ञानिक शोध यह संकेत देता है कि इस क्षेत्र में कभी वास्तव में एक प्राचीन नदी बहती रही होगी.

यही कारण है कि शारदा बाली आज भी केवल रेत का मैदान नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और विज्ञान के संगम का एक महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है. रथ यात्रा से जुड़ी यह कहानी बताती है कि भारत की सांस्कृतिक धरोहर में कई ऐसे रहस्य छिपे हैं, जिनकी परतें समय-समय पर इतिहास और विज्ञान दोनों मिलकर खोलते रहते हैं.

यह भी पढ़े- Jagannath Puri 2026: 200 साल पहले समुद्र में हुआ चमत्कार! आज भी पुरी मंदिर में टंगी है फ्रांस की घंटी

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

अणिमा शुक्ला | डिजिटल पत्रकार (इंटर्न), ABP Live धर्म-एस्ट्रो सेक्शन

अणिमा शुक्ला एक उभरती हुई डिजिटल पत्रकार और वीडियो स्टोरीटेलर हैं, जो वर्तमान में ABP Live के धर्म और एस्ट्रो सेक्शन में इंटर्न के रूप में कार्यरत हैं. उन्होंने AAFT, नोएडा से BAJMC और AIMC, दिल्ली से TV & Radio Journalism (TVRJ) में पत्रकारिता की शिक्षा प्राप्त की है, जिसने उनके कंटेंट को व्यावहारिक, तकनीकी रूप से मजबूत और ऑडियंस-फोकस्ड बनाया है.

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