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क्या आप भी ऐसा सोचते हैं कि पैसों से खरीदी जा सकती हैं सारी खुशियां?

अक्सर इस मुद्दे पर बहस होती है कि पैसे से खुशियां खरीदी जा सकती है या नहीं? जानिए इसी पर आई नई रिसर्च क्या कहती है.

नई दिल्ली: ‘पैसे से खुशियां नहीं खरीदी जा सकती’. पता नही कब से ये बात कही जा रही है और इस पर बहस भी होती रही है. अभी तक यही माना और कहा जाता रहा है कि पैसों से खुशियां नही खरीदी जा सकती है. लेकिन अब हम आपको बताने जा रहे हैं उस रिसर्च के बारे में जिसमें पता करने की कोशिश की गयी है कि पैसे से खुशियां खरीदी जा सकती है या नहीं?

क्या कहती है रिसर्च ये रिसर्च इस बात को सीधे चुनौती देती है कि पैसों से खुशी नही खरीदी जा सकती. रिसर्च के मुताबिक,पैसे आपको खुशी दे सकते हैं या नही ये इसपर निर्भर करता है कि आप उसे कैसे खर्च करते हैं. क्योंकि पैसे से भले ही आप सीधे सीधे खुशी नही खरीद सके लेकिन अपने लिए फ्री टाईम खरीद सकते हैं जिससे आपको खुशी मिले. रिसर्च करने वालों ने अपने नतीजे में पाया कि जिन लोगों ने अपना समय घर के काम काज में नही खपाया वो ज्यादा खुश रहे. यानि अपना पैसा खर्च कर घर का काम काज किसी औऱ से करा अपने लिए समय बचाया वो ज्यादा खुश रहे. इसलिए रिसर्च ये सलाह देती है कि बेहतर महसूस करने या खुशी के लिए शापिंग करने की बजाय अपने लिए समय की बचत करनी चाहिए. अगर पैसे हैं तो रोजमर्रा के घर के काम दूसरे को पैसे देकर करा लेना चाहिए. मसलन , घर की साफ सफाई, खाना बनवाना जैसे काम के लिए पैसे खर्च कर ‘रिटेल थेरेपी’ (यानि बेहतर महसूस करने के लिए शापिंग) से ज्यादा संतुष्टि हासिल कर सकते हैं.

कैसे की गई रिसर्च- ये रिसर्च यूएस, कनाडा, डेनमार्क और नीदरलैंड्स के 6,200 लोगों पर की गयी. इन लोगों से ये पूछा गया कि वो हर महीने अपने लिए फ्री टाईम बचाने की खातिर कितना खर्च करते हैं. उनसे ये सवाल भी पूछे गए कि अपनी जिंदगी से वो कितने संतुष्ट हैं वगैरह. नतीजे में साफतौर पर सामने आय़ा कि जिन लोगों घर का काम काज दूसरों से कराने पर पैसा खर्च किया औऱ अपने लिए फ्री टाईम निकाला वो ज्यादा संतुष्ट थे. इसके अलावा रिसर्च के लिए प्रैक्टिकल एक्सपेरिमेंट भी किए गए. इसके लिए , वैंकूवर में रहने वाले 60 लोगों को कुछ पैसे दिए गए. उन्हें कहा गया कि पैसों से एक वीकेंड वो घर का सामान खरीदें. और दूसरे वीकेंड में घर के कामों के लिए किसी को हायर करें. नतीजे में पाया गया कि ज्यादातर लोगों को वो वीकेंड ज्यादा अच्छा लगा जिस वीकेंड उन्होंने घर का काम दूसरे से कराने पर पैसा खर्च किया. उस वीकेंड उन्हें ज्यादा पाजिटिव महसूस हुआ.

रिसर्च के नतीजे नतीजों के मुताबिक, स्ट्रेसफुल जिंदगी जीनेवाले लोग सेविंग सर्विसेज में पैसा नहीं लगाते. यानि वो अपने काम खुद ही करते हैं. ऐसे लोग अपनी लाइफ से संतुष्ट नहीं होते. वहीं दूसरी और जो लोग सेविंग सर्विसेज के लिए पैसा लगाते हैं यानि दूसरों से काम कराने पर पैसा खर्च करते हैं, उनकी जिंदगी में स्ट्रेस की कोई जगह नहीं होती.

इसी रिसर्च के अंदर वैंकूवर में ही 98 नौकरीपेशा लोगों को 40 डालर देकर पूछा गया कि वो उसे कैसे खर्च करेंगे. 98 में से महज दो फीसदी का जवाब था कि वो इसे अपने लिए समय की बचत पर खर्च करेंगे. वैज्ञानिकों का कहना है कि कई पैसे वालों लोगों में इस बात की चाहत नही दिखी कि वो समय की बचत के लिए पैसा खर्च करेंगे. उनका कहना है कि ये वाकई चौंकाने वाली बात है कि जो लोग इस तरह के काम आउटसोर्स कर सकते हैं वो भी इसपर खर्च नही करते. और समय की कमी के कारण लोग दुःखी, स्ट्रेस, ज्यादा एंजाइटी और इंसोम्निया जैसी दिक्कतें महसूस करने लगते है. दरअसल लोगों को ये तो दिखता है कि वो काम कराने के लिए कतना पैसा खर्च कर रहे हैं लेकिन खुशी का वाल्यूम नही जोड़ पाते औऱ इसलिए दूसरों से काम कराने पर पैसा खर्च करने में हिचकते है.

रिसर्च में ये भी कहा गया कि जिन देशों में लोगों की सैलरी बढ़ी है वहां के लोग ना सिर्फ खुश रहते हैं बल्कि ऐसे लोग फ्री टाइम को भी खूब एन्जॉय करते हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट रिसर्चर और प्रोफेसर एलिजाबेथ डुन का कहना है कि कुछ लोग रोजाना के काम के प्रेशर के कारण अपने लिए समय बचाने पर खर्च नहीं कर पाते हैं. लेकिन रिसर्च से ये बात सामने आयी है कि अगर आप अपने लिए थोड़ा खाली समय बचाते हैं तो आपको ज्यादा बेहतर फील होता है. अपने लिए मिला थोड़ा खाली समय उन्हें खुशी देती है. ऐसे में एक्सपर्ट्स को उम्मीद है कि इस नए रिसर्च के नतीजों से लोग अपने लिए समय बचाने की अहमियत को समझेंगे. और ये बात समझ सकेंगे कि खुद को थोड़ा ज्यादा समय देना हमें ज्यादा खुशी देता है.

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