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IVF Success Rate: क्या ब्लैक स्किन वाली औरतों पर कामयाब नहीं IVF? नई स्टडी ने खोले चौंकाने वाले राज

Women Fertility Issues: पहले माना जाता था कि इसका कारण उनके शरीर में फाइब्रॉइड्स की ज्यादा मौजूदगी हो सकती है, जो एम्ब्रियो के इम्प्लांटेशन में बाधा डालते हैं.चलिए बताते हैं कि नया क्या निकला है.

Why IVF Success Rate Is Lower In Black Women: क्या ब्लैक स्किन वाली महिलाओं पर IVF उतना असरदार नहीं होता जितना बाकी महिलाओं पर? यह सवाल लंबे समय से साइंटिस्ट और डॉक्टरों के बीच चर्चा का विषय रहा है. हाल ही में आई एक नई स्टडी ने इस मुद्दे पर कुछ चौंकाने वाले तथ्य सामने रखे हैं, जो इस बहस को और गहरा कर देते हैं.

करीब दो दशकों से फर्टिलिटी एक्सपर्ट्स यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर क्यों ब्लैक महिलाओं में IVF के बाद सफल जन्म दर  कम देखी जाती है. पहले माना जाता था कि इसका कारण उनके शरीर में फाइब्रॉइड्स की ज्यादा मौजूदगी हो सकती है, जो एम्ब्रियो के इम्प्लांटेशन में बाधा डालते हैं. इसके अलावा, IVF के दौरान दिए जाने वाले हार्मोनल इंजेक्शन्स पर शरीर का अलग रिस्पॉन्स भी एक वजह माना गया.

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क्या निकला रिसर्च में?

हालांकि, हाल ही में जर्नल फर्टिलिटी एंड स्टेरिलिटी  में पब्लिश एक बड़े स्टडी ने इस धारणा को आंशिक रूप से चुनौती दी है. इस स्टडी में 2.46 लाख से ज्यादा IVF साइकिल्स का एनालिसिस किया गया, जिनमें करीब 7 प्रतिशत केस ब्लैक महिलाओं के थे. रिसर्च में पाया गया कि ओवेरियन स्टिमुलेशन दवाओं पर ब्लैक महिलाओं का रिस्पॉन्स अन्य समूहों की तुलना में थोड़ा बेहतर था. दिलचस्प बात यह रही कि इन महिलाओं के एग्स से बनने वाले एम्ब्रियो की क्वालिटी भी अच्छी पाई गई. यानी IVF की शुरुआती प्रक्रिया में कोई बड़ी कमी नहीं दिखी. रिसर्च में उम्र, बॉडी मास इंडेक्स, हार्मोन लेवल और इंफर्टिलिटी से जुड़ी समस्याओं जैसे फैक्टर्स को भी ध्यान में रखा गया.

रिजल्ट चौंकाने वाले

इसके बावजूद, अंतिम परिणाम यानी सफल जन्म दर में फर्क देखने को मिला. जहां व्हाइट महिलाओं में यह दर करीब 60 प्रतिशत थी, वहीं ब्लैक महिलाओं में यह लगभग 45 प्रतिशत ही रही. यही अंतर वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ा सवाल बन गया है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि कहीं न कहीं कोई ऐसा फैक्टर है, जो आखिरी स्टेज में सफलता को प्रभावित कर रहा है. यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया में  OB-GYN एक्सपर्ट Iris Tien-Lynn Lee के मुताबिक,"स्पष्ट रूप से कोई ऐसी रुकावट है, जो इस प्रक्रिया को अंतिम लक्ष्य तक पहुंचने से रोक रही है."

कई छिपे हुए कारण हो सकते हैं

रिसर्चर का यह भी कहना है कि इसके पीछे कई छिपे हुए कारण हो सकते हैं, जैसे गर्भाशय में फाइब्रॉइड्स की अधिकता या एनवायरमेंट से जुड़े ऐसे तत्व, जिनका असर ब्लैक महिलाओं पर ज्यादा पड़ता है.  नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी फीनबर्ग स्कूल ऑफ मेडिसिन में प्रोफेसर तरुन जैन का मानना है कि इस तरह के अध्ययन हेल्थकेयर सिस्टम की कमियों को समझने में भी मदद करते हैं. उनके अनुसार, ब्लैक महिलाओं को स्वास्थ्य सेवाओं में अक्सर खराब परिणामों का सामना करना पड़ता है, चाहे बात मातृत्व की हो या इंफर्टिलिटी ट्रीटमेंट की.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. 

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About the author सोनम

सोनम एबीपी लाइव में कंटेंट राइटर हैं. यहां वह लाइफस्टाइल कैटिगरी और इसके अंतर्गत आने वाली सब-कैटिगरीज हेल्थ, होम टिप्स, रिलेशनशिप, ट्रैवल, पैरेंटिंग, ब्यूटी और फैशन की जिम्मेदारी संभाल रही हैं.

सोनम करीब 15 साल से लेखन की दुनिया में कार्यरत हैं. इससे पहले वह अमर उजाला, दैनिक जागरण के आईनेक्स्ट में अपनी सेवाएं दे चुकी हैं. इन सभी जगहों पर उन्होंने महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं. सोनम ने लखनऊ यूनिवर्सिटी से जर्नलिज्म में ग्रैजुएशन किया है.

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