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घर के पासवाले सुनार से या फिर बड़े-बड़े शोरूम से... कहां से ज्वैलरी लेना पड़ता है सस्ता?

भारतीय परिवारों सोना खरीदना काफी आम बात है. सेविंग्स करने के लिए या फिर किसी शुभ मौके के लिए हम तुरंत ज्वेलर के यहां पहुंच जाते हैं. आइये जानते हैं बड़े शोरूम और लोकल दुकानों में से किसे चुनें.

भारत दुनिया में सबसे ज्यादा सोने यानी गोल्ड की खपत वाले देशों में शुमार है. सोने के प्रति हमारी दीवानगी इससे समझी जा सकती है कि कई बार आर्थिक तौर पर कमजोर समझे जाने वाले परिवारों में भी ठीक-ठाक मात्रा में गहने मिल जाते हैं. मध्यम और उच्च वर्ग का तो फिर कहना ही क्या. लेकिन सोना खरीदने से पहले जो बड़े सवाल दिमाग में कौंधते हैं उनमें से एक प्रमुख उसकी क्वालिटी से जुड़ा हुआ है. इसका समाधान कैरेट की जानकारी और हॉलमार्क से काफी हद तक मिल जाता है. यानी कि 22 कैरेट सोने की कीमत हमेशा 18 कैरेट से ज्यादा ही होगी. लेकिन जो बड़ा सवाल अब भी कईयों को परेशान करता है वह यह कि आखिरकार सोना खरीदा कहां से जाए. घर के पास वाली किसी लोकल शॉप से, जहां दो-तीन पीढ़ियों से ज्वैलरी की खरीददारी की जा रही है या फिर उन बड़ी ब्रांड्स से जिनके विज्ञापन और पोस्टर्स आंखों को ललचाते हैं. 

बड़े ब्रांड्स और लोकल शॉप में अंतर

इस कन्फ्यूजन की भी दो बड़ी वजह हैं. इनमें से पहली है कीमत. आप पूछेंगे कि सोने और चांदी के भाव तो हर दिन सुबह ही तय हो जाते हैं तो ज्वैलरी की कीमतों में अंतर कैसे आ सकता है, फिर चाहे कोई कहीं से भी खरीदे. ऐसा नहीं है. भले ही सोने और चांदी के दाम समान रहें. लेकिन जो बड़ा अंतर आता है वह होता है मैकिंग चार्जेस यानी डिजाइनर की लागत का. जानकार बताते हैं कि यह एक ऐसा पहलू है जहां ब्रांड्स कई बार बड़ा मार्जिन लेकर चलते हैं. हालांकि इसके पीछे एक बड़ी वजह खूबसूरत डिजाइन्स में लगने वाला समय और श्रम तो है ही. लेकिन आपको यह भी समझना होगा कि ब्रांड्स अपने शोरूम में एंप्लॉइज की सैलेरी, शोरूम का किराया और लागत, बिजली का बिल और एडवरटाइजिंग कॉस्ट जैसे तमाम छोटे-बड़े खर्चे आप ही की जेब से वसूलेंगी. ऐसे में उनकी डिजाइनिंग कॉस्ट ज्यादा होना जाहिर सी बात है, जिस पर कोई सरकार काबू नहीं कर सकती है.

मार्केट में दो तरह के मेकिंग चार्जेस होते हैं. एक में तो दर फिक्स रहती है. इसमें गोल्ड मेकर्स प्रति ग्राम ज्वैलरी बनाने की लागत तय कर देते हैं. जैसे 250 रुपए प्रति 10 ग्राम. दूसरे तरीके में वजन के हिसाब से मेकिंग चार्ज तय होते हैं. जैसे सोने की कीमत का 12%. उदाहरण के लिए 22 कैरेट सोने का भाव 50 हजार रुपए प्रति 10 ग्राम है. आपने 10 ग्राम ज्वैलरी खरीदी तो फिक्स रेट के हिसाब से मेकिंग चार्ज हुए 250*10= 2500 रुपए. वहीं  50 हजार रुपए की ज्वैलरी का 12% के हिसाब से मेकिंग चार्ज हुआ 6 हजार रुपए. सीधे-सीधे 3500 का अंतर. वजन के प्रतिशत के हिसाब से मेकिंग चार्ज चुकाने का एक नुकसान ज्वैलरी बेचते समय भी आता है. 

मान लो आज सोने के भाव ज्यादा हैं तो आपने मेकिंग चार्ज भी ज्यादा ही दिए. कल को दाम घट गए और आप अपनी ज्वैलरी बेचना चाहते हैं तो आपको अतिरिक्त नुकसान होने की संभावना रहती है.ब्रांड्स अमूमन सोने की कीमत के प्रतिशत को ही मेकिंग चार्ज के तौर पर वसूलते हैं. वहीं लोकल शॉप्स प्रति दस ग्राम एक निश्चित कीमत तय रखते हैं. तो ज्वैलरी की कीमत के मामले में आपके गांव-शहर में आस-पास की ही दुकान आपके जेब को राहत दे सकती हैं.

लेकिन इसमें मुश्किल भरोसे की होती है. ब्रांड्स से खरीदी गई ज्वैलरी की क्वालिटी की पूरी गारंटी होती है. वहीं, लोकल मार्केट में कभी-कभार काम केवल भरोसे पर ही चलता है. इसके अलावा लोकल मार्केट में आपको डिजाइन के मामले में थोड़ा कॉम्प्रोमाइज भी करना पड़ सकता है. क्योंकि बड़ी कंपनियों के पास डिजाइनर्स की एक बड़ी टीम है, जो नेशनल-इंटरनेशनल मार्केट्स से इंस्पिरेशन लेकर और रिसर्च के जरिए नए-नए डिजाइन्स पैटर्न तैयार करती है. इन कंपनियों के पास आधुनिक मशीनरी भी मौजूद है जो बारीक डिजाइन को भी बेहद खूबसूरती से आपकी ज्वैलरी पर उकेर सकती हैं. लेकिन लोकल मार्केट में ऐसा नहीं होता.

इसलिए डिजाइन प्रमुख मोर्चा है, जिसकी वजह से ब्रांड्स ने तेजी से मार्केट में अपनी जगह बनाई है. जानकारी के अनुसार पिछले दस से पंद्रह वर्षों में ब्रांडेड ज्वैलरी ने मार्केट में अपनी जगह 5 प्रतिशत से बढ़ाकर 35% तक कर ली है.

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