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अब तक कूटनीति की कठिन रस्सी पर चला है भारत, ट्रंप-जेलेंस्की समझौते के बाद बदलेगी तस्वीर!

ट्रंप और मोदी की दोस्ती ने भारत और अमेरिका के बीच संबंधों को मजबूत किया है. दोनों नेताओं ने कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए, जिनमें रक्षा उपकरणों की खरीद और व्यापारिक रियायतें शामिल हैं. 

दो हफ्ते पहले, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो-दिवसीय अमेरिका दौरे पर थे. डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति के तौर पर कार्यभार संभालने के बाद मोदी मात्र चौथे ऐसे अंतरराष्ट्रीय नेता थे, जिन्होंने अमेरिका का दौरा किया थी और यह यात्रा बेहद हाई-प्रोफाइल मानी गयी थी. हालांकि, ट्रंप ने राष्ट्रपति पद संभालते ही जिस तरह से ताबड़तोड़ घोषणाएं की थीं, टैरिफ को लेकर सख्ती दिखायी थी, घुसपैठियों पर कार्रवाई शुरू की थी और भारत के लिए भी कठोर बयान दिए थे, उससे यह मान लिया गया था कि यह यात्रा आसान नहीं होगी. मोदी भी पूरी तैयारी के साथ गए थे और इस यात्रा ने कम से कम भारत को उन चुनौतियों के बारे में एक सोच दी कि आनेवाले दिनों में ट्रंप किस तरह से भारत को लेकर बरतने वाले हैं? 

अब जेलेंस्की की ट्रंप से मुलाकात हुई है और इस पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हैं. जेलेंस्की ने पहले तो बड़ा कड़ा रुख अपनाया था, लेकिन अब वो भी पिघलते हुए नजर आ रहे हैं. इस समझौते से भारत के ऊपर भी राजनीतिक और राजनयिक असर पड़ने की उम्मीद है. 

डोनाल्ड ट्रंप और नरेंद्र मोदी के संबंध

डोनाल्ड ट्रंप और नरेंद्र मोदी के बीच संबंधों की शुरुआत ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद हुई. दोनों नेताओं ने कई बार मुलाकात की और विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की. ट्रंप और मोदी के बीच संबंधों का मुख्य आधार व्यापार, रक्षा और आतंकवाद के खिलाफ सहयोग रहा है. ट्रंप और मोदी की दोस्ती ने भारत और अमेरिका के बीच संबंधों को मजबूत किया है. दोनों नेताओं ने कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए, जिनमें रक्षा उपकरणों की खरीद, व्यापारिक रियायतें और आतंकवाद के खिलाफ संयुक्त प्रयास शामिल हैं. 

डोनाल्ड ट्रंप और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के बीच संबंधों में भी कई उतार-चढ़ाव आए हैं. ट्रंप ने जेलेंस्की पर दबाव डालकर अमेरिका के साथ खनिज समझौता करने के लिए मजबूर किया. इस समझौते के तहत, यूक्रेन ने अमेरिका को अपने खनिज संसाधनों तक पहुंच देने की सहमति दी, जिसके बदले में अमेरिका ने यूक्रेन को सुरक्षा गारंटी देने का वादा किया. यहां यह याद रखनेवाली बात है कि पहले जेलेंस्की इस समझौते के लिए नहीं तैयार थे, लेकिन समय को देखते हुए उन्होंने सहमति दी है. ट्रंप ने अपने ब्रिटिश समकक्ष स्टार्मर से भरी महफिल में यह पूछा है कि क्या वे अपने दम पर रूस से लड़ सकते हैं...और यह मौज यूरोपियन यूनियन के लिए भी एक सबक है. ट्रंप ने अमेरिकी जनता को जो भी वादे किए थे, उसको पूरा करने में लगे हैं. 

भारत पर प्रभाव

डोनाल्ड ट्रंप और नरेंद्र मोदी के संबंधों का भारत पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है. दोनों देशों के बीच व्यापारिक और रक्षा सहयोग में वृद्धि हुई है. जेलेंस्की के साथ ट्रंप के समझौते का भारत पर भी प्रभाव पड़ सकता है. अमेरिका और यूक्रेन के बीच खनिज समझौते से भारत को भी लाभ हो सकता है, क्योंकि इससे वैश्विक खनिज बाजार में स्थिरता आ सकती है. इसके अलावा, ट्रंप की नीतियों में परिवर्तन का भारत पर भी प्रभाव पड़ा है. ट्रंप के कार्यकाल के दौरान अमेरिका ने कई नीतिगत बदलाव किए, जिनका भारत पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव पड़े. लंबे समय तक भारत अमेरिका का प्राकृतिक सहयोगी भी रहा है और सरकार चाहे रिपब्लिकन पार्टी की हो, या डेमोक्रेट्स की, भारत के संबंध हमेशा सधे रहे हैं. 

मोदी ने अमेरिका की यात्रा पर जाने से पहले दर्जनों ऐसी वस्तुओं पर टैरिफ घटाया था, जिससे अमेरिका को फायदा हो सकता है. अमेरिका चूंकि जैसे को तैसा यानी रेसिप्रोकल टैरिफ और ट्रेड में यकीन रखता है, तो भारत को भी कुछ देना पड़ेगा, अन्यथा भारत के पक्ष में झुका हुआ व्यापार हमें उल्टा भी पड़ सकता है. जब मोदी अपनी अमेरिका यात्रा पर थे, तो अमेरिका ने खुले तौर पर कहा था कि अमेरिका के मुकाबले भारत का टैरिफ बहुत अधिक है और जहां भारत मोटरसाइकिल पर 100 फीसदी टैरिफ लगाता है, अमेरिका केवल ढाई प्रतिशत ही टैरिफ भारतीय मोटरसाइकिल पर लगाता है. 

ट्रंप दुनिया में युद्ध को खत्म कर और अमेरिकी चौधराहट को आर्थिक मोर्चे से संभालना चाहते हैं. इसीलिए, उन्होंने हमास-इजरायल युद्ध को भी खत्म करवाने का ऐलान किया, तो रूस-यूक्रेन युद्ध में भी यूक्रेन को सीधा संकेत दे दिया कि अमेरिका अब उसकी और अधिक मदद नहीं करेगा. यूरोपीय यूनियन हो या ब्रिटेन, ट्रंप का रवैया किसी भी डिप्लोमैट के लिए दुःस्वप्न है, लेकिन भारत फिलहाल अपनी अगली चाल सोच रहा है, क्योंकि मोदी-ट्रंप की जुगलबंदी फिलहाल तो चल ही रही है. 

व्यालोक जेएनयू और आइआइएमसी से पढ़े हैं. विभिन्न मीडिया संस्थानों जैसे ईटीवी, दैनिक भास्कर, बीबीसी आदि में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव. फिलहाल स्वतंत्र पत्रकारिता और अनुवाद करते हैं.
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