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भारतीय नववर्ष: प्रकृति का नवोन्मेष और संस्कृति का संगम

भारत में नववर्ष के ये विविध उत्सव सांस्कृतिक प्रतीक के साथ साथ प्रकृति, कृषि और समाज के साथ हमारे गहरे संबंध को भी दर्शाते हैं. भारतीय नववर्ष केवल एक तिथि परिवर्तन नहीं है,

भारत अपनी सांस्कृतिक विविधता और अपनी प्राचीन परन्तु जीवंत परंपराओं के साथ एक मात्र जीवित बची सभ्यता है. यहां के प्रत्येक पर्व और त्योहार न केवल उत्सव और उल्लास का प्रतीक हैं, बल्कि हमारी गहरी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जड़ों से भी जुड़े हुए हैं. जहां विश्व के अधिकांश देशों में ग्रेगोरियन कैलेंडर के 1 जनवरी को नववर्ष का स्वागत किया जाता है, वहीं भारत में नववर्ष का आगमन प्रकृति के नवजागरण के साथ होता है, जो ग्रेगोरियन कैलेंडर के 1 जनवरी की बजाय चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाया जाता है. इस वर्ष, यह शुभ अवसर 30 मार्च को आया है, जो हमारी प्राचीन कालगणना और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की सटीकता को दर्शाता है. सनातन काल गणना में समय को युगों, वर्षों, महीनों, पखवाड़ों, दिनों, घंटों, मिनटों और यहाँ तक कि सेकंडों में भी विभाजित किया गया है. इसकी सबसे छोटी इकाई को तृटि कहा जाता है, जो लगभग 29.63 माइक्रोसेकंड के बराबर होती है. यह भारतीय समय गणना की सूक्ष्मता और वैज्ञानिक गहराई को दर्शाता है.

समय की गणना में माहिर था भारत

प्राचीन भारतीय खगोलविद, जैसे आर्यभट्ट और भास्कराचार्य, सदियों पहले ही सौर और चंद्र ग्रहणों की सटीक भविष्यवाणी करने में सक्षम थे. इसके अलावा, भारतीय गणितज्ञों ने शून्य और दशमलव प्रणाली की अवधारणा प्रस्तुत की, जो आधुनिक गणित की नींव बनी. त्रिकोणमिति की जड़ें भी भारतीय खगोल विज्ञान में बहुत पहले से मौजूद थीं, जबकि पश्चिमी दुनिया ने इसे बाद में विकसित किया. भारत में नववर्ष की अवधारणा प्रकृति के नवजीवन के साथ और भी विशेष हो जाती है. यह वह समय होता है जब वसंत ऋतु में प्रकृति एक नया स्वरूप धारण करती है. पुराने पीले पत्तों को त्यागकर वृक्ष नए हरे-भरे पत्तों से शृंगारित होते हैं. चारों ओर रंग-बिरंगे फूल खिलते हैं, जिससे ऐसा प्रतीत होता है जैसे संपूर्ण सृष्टि केंचुल छोड़कर नई पोशाक धारण कर रही हो. यह समय नई शुरुआत, सृजनात्मकता और नवाचार का प्रतीक बन जाता है. भारतीय नववर्ष के विपरीत, पश्चिमी नववर्ष उस समय मनाया जाता है जब उत्तरी गोलार्द्ध में अत्यधिक ठंड होती है और प्रकृति सुस्त अवस्था में होती है. भारतीय नववर्ष के समय नई फसलें पककर तैयार होती हैं, जो समृद्धि और उन्नति का संकेत देती हैं. यही कारण है कि भारतीय नववर्ष न केवल एक तिथि परिवर्तन, बल्कि प्रकृति और सृजनात्मकता के उत्सव के रूप में मनाया जाता है.

भारतीय पंचांग की है पूरी वैज्ञानिकता

ग्रेगोरियन कैलेंडर, जो पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर गति पर आधारित एक सौर कैलेंडर है, प्रतिवर्ष 1 जनवरी को नववर्ष मनाने की निश्चित तिथि प्रदान करता है. इसके विपरीत, भारतीय कैलेंडर एक लूनिसोलर प्रणाली पर आधारित है, जिसमें चंद्रमा की कलाओं और सूर्य की गति दोनों को ध्यान में रखा जाता है. इसी कारण भारतीय नववर्ष की तिथि हर वर्ष ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार भिन्न होती है. यह परिवर्तन हमारी कालगणना की वैज्ञानिकता और ब्रह्मांडीय परिवर्तनों के प्रति उसकी संवेदनशीलता को दर्शाता है, जो इसे एक निश्चित तिथि पर स्थिर रहने वाले कैलेंडर की तुलना में अधिक लचीला और प्रकृति के अनुरूप बनाता है.

भारतीय  कैलेंडर को ग्रेगोरियन कैलेंडर की तुलना में अधिक वैज्ञानिक माना जाता है क्योंकि यह सटीक खगोलीय गणनाओं पर आधारित है और सूर्य व चंद्रमा की गति को ध्यान में रखता है और चंद्र महीनों और सौर वर्ष को संतुलित करता है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हर क्षेत्र में वार्षिक कृषि गतिविधियाँ प्राकृतिक मौसमी परिवर्तनों के अनुरूप रहें. इसके अलावा, यह कैलेंडर चंद्रमा के मार्ग पर स्थित 27 नक्षत्रों या तारामंडलों का उपयोग करता है, जो खगोलीय पिंडों की गति से सीधे जुड़े होते हैं. ये नक्षत्र ऋतु परिवर्तन को दर्शाते हैं और धार्मिक अनुष्ठानों व सामाजिक उत्सवों के समय निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. भारतीय  कैलेंडर की वैज्ञानिकता को अधिमास या मलमास की अवधारणा भी प्रमाणित करती है. चंद्र वर्ष 354 दिनों का होता है, जो सौर वर्ष (365दिनों) से लगभग 11 दिन छोटा होता है. इस अंतर को संतुलित करने के लिए लगभग हर 32.5 महीनों में एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे अधिमास कहा जाता है. यह प्रणाली ग्रेगोरियन कैलेंडर में लीप वर्ष की अवधारणा के समान है, लेकिन अधिक लचीली और खगोलीय घटनाओं के अनुरूप है.

प्रकृति से है गहरा नाता

इस कारण भारतीय पंचांग न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक अनुष्ठानों के लिए बल्कि कृषि और पर्यावरणीय परिवर्तनों को समझने के लिए भी एक वैज्ञानिक और तार्किक प्रणाली प्रस्तुत करता है. भारतीय कैलेंडर में प्रत्येक दिन की गणना सूर्य के सापेक्ष चंद्रमा की स्थिति के आधार पर की जाती है. पंचांग के माध्यम से हर दिन की खगोलीय स्थिति की सटीक जानकारी मिलती है, जिसमें सूर्योदय और सूर्यास्त का समय, ग्रहों की स्थिति और ग्रहण जैसी महत्वपूर्ण घटनाएँ शामिल होती हैं. संस्कृत में पंचांग का अर्थ है पांच अंग, जो इसके पांच प्रमुख तत्वों - तिथि (चंद्र दिवस), नक्षत्र (तारा नक्षत्र), योग (ग्रहों का संयोजन), करण (तिथि का आधा भाग) और वार (सप्ताह के दिन) को संदर्भित करता है. इसके अलावा, भारतीय कैलेंडर वर्ष को छह ऋतुओं में विभाजित करता है, जो प्राकृतिक जलवायु चक्रों से पूरी तरह मेल खाती हैं. उदहारण के लिए मकर संक्रांति की अवधारणा, जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, पृथ्वी के वास्तविक झुकाव और उसकी परिक्रमा पर आधारित होती है. यह परिवर्तन सर्दियों से लंबे दिनों की ओर संक्रमण को चिह्नित करता है और कृषि सहित कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. इस प्रकार, भारतीय कैलेंडर खगोलीय हलचलों के साथ अधिक तालमेल रखता है, जबकि पश्चिमी ग्रेगोरियन कैलेंडर अपेक्षाकृत रैखिक और स्थिर प्रणाली है. 

भारत में नववर्ष का स्वरूप विविधतापूर्ण है, जो विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है. प्रकृति के इस बदलाव के लिए नववर्ष का निर्धारण मुख्य रूप से दो प्रमुख पद्धतियों—चंद्र नववर्ष और सौर नववर्ष के आधार पर किया जाता है. चंद्र नववर्ष चैत्र मास से प्रारंभ होता है, जो आमतौर पर मार्च या अप्रैल में आता है. इसे उत्तर भारत, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में मनाया जाता है. सौर नववर्ष की शुरुआत मेष संक्रांति से होती है, जो अप्रैल के मध्य में आती है. यह पंजाब, तमिलनाडु, बंगाल, असम, ओडिशा, बिहार, झारखण्ड, उत्तरप्रदेश और केरल में उत्साहपूर्वक मनाया जाता है.

नववर्ष के विविध रूप, पर आंतरिक एकता

महाराष्ट्र में नववर्ष का स्वागत गुड़ी पड़वा के रूप में किया जाता है, जबकि कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में इसे उगादि के नाम से जाना जाता है. कश्मीर में यह नवरेह के रूप में मनाया जाता है, जबकि सिंधी समुदाय इसे चेटी चंद के रूप में मनाता है. झारखण्ड में चैत्र के तीसरे दिन सरहुल मनाया जाता है. गुड़ी पड़वा के दिन  एक लंबी बाँस पर रेशमी कपड़ा, नीम के पत्ते, फूल, और एक उल्टा रखा हुआ तांबे या चाँदी का बर्तन लगाकर "गुड़ी" फहराई जाती है, जो विजय और समृद्धि का प्रतीक है| उगादि (कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना) के दिन विशेष स्नान किया जाता है, और पंचांग (नए वर्ष का ज्योतिषीय कैलेण्डर) और एक विशेष व्यंजन "उगादि पच्चड़ी" जिसमें मीठा, खट्टा, तीखा, कड़वा और नमकीन स्वाद होते हैं, जो जीवन के विभिन्न अनुभवों का प्रतीक है के साथ नए वर्ष के स्वागत का रिवाज है. कश्मीरी नववर्ष (नवरेह) से एक रात पहले थाली में चावल, दही, सिक्का, फूल और पंचांग रखा जाता है और अगले दिन इसे देखकर नए साल की शुरुआत की जाती है. चेटी चंद इस दिन झूलेलाल जी (सिंधु नदी के संरक्षक देवता) की पूजा के लिए समर्पित होता है. सिंधी समुदाय बड़े जुलूस निकालते हैं, मंदिरों में विशेष प्रार्थनाएँ होती हैं, और मीठे पकवान बनाए जाते हैं. सरहुल त्योहार प्रकृति की पूजा और आदिवासी परंपराओं के अनुसार जंगलों और जल स्रोतों की सुरक्षा को समर्पित होता है. सरना स्थलों पर सामूहिक पूजा होती है, ढोल-नगाड़ों के साथ पारंपरिक नृत्य होते हैं और साल के फूलों की पूजा की जाती है. पंजाब में इस दिन नई फसल की कटाई बैसाखी की धूम होती है. तमिलनाडु में पुथांडु के दिन विशेष व्यंजन, मंगई पचड़ी (कच्चे आम से बना व्यंजन) खाने का रिवाज है. बंगाल में पोइला बोइशाख, और केरल में विशु के रूप में मनाया जाता है. असम में इसे बिहू कहा जाता है, जबकि ओडिशा में यह पना संक्रांति के नाम से प्रसिद्ध है. 

असमिया लोग पारंपरिक बिहू नृत्य करते हैं और बैलों की पूजा कर कृषि कार्यों की शुरुआत की जाती है. विशु (केरल) के दिन सुबह सबसे पहले "विशु कणी" देखा जाता है, जिसमें केले के पत्ते, फल, चावल, दर्पण और दीपक रखे जाते हैं. बड़े बुजुर्ग बच्चों को "विशु कैनी" (धान) देते हैं और पारंपरिक भोजन बनाया जाता है. पना संक्रांति (ओडिशा) के दिन विशेष रूप से "पना" नामक पेय तैयार किया जाता है, जो गुड़, बेल और नारियल से बनाया जाता है. सतुआन (या सतुआ संक्रांति) एक महत्वपूर्ण लोक पर्व है, जिसे मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में मनाया जाता है. यह पर्व सूर्य के मेष राशि में प्रवेश करने के और गर्मी की शुरुआत के प्रतीक के रूप में देखा जाता है. इन सभी नववर्ष उत्सवों का एक प्रमुख पहलू यह है कि ये कृषि और फसल चक्र से गहराई से जुड़े होते हैं, जो प्रकृति और जीवन के पुनर्निर्माण का प्रतीक हैं.

भारत में प्रकृति, कृषि और समाज गहरे बंधे

भारत में नववर्ष के ये विविध उत्सव सांस्कृतिक प्रतीक के साथ साथ प्रकृति, कृषि और समाज के साथ हमारे गहरे संबंध को भी दर्शाते हैं. भारतीय नववर्ष केवल एक तिथि परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह गहरी वैज्ञानिक, खगोलीय रूप से संरेखित और सांस्कृतिक रूप से विविध सनातन परम्परा है जो जीवन के हर कार्यकलाप को परम्परागत रूप से निर्धारित करती आई है. भारतीय समय गणना की समझ रैखिक और स्थिर ग्रेगोरियन कैलेंडर के विपरीत ब्रह्मांडीय परिवर्तनों के अनुकूल है, जो इसे मानव इतिहास में सबसे सटीक कैलेंडर  प्रणालियों में से एक बनाती है. भारतीय कैलेंडर का महत्व न केवल सांस्कृतिक है, बल्कि वैज्ञानिक और आध्यात्मिक भी है. इसका उद्देश्य केवल तिथियों की गणना करना नहीं है, बल्कि यह आपके जीवन से संबंधित एक व्यक्तिपरक कैलेंडर है. भारत में पश्चिमी प्रभाव बढ़ने के साथ साथ सोलहवी शताब्दी से ही ग्रेगोरियन कैलेंडर का चलन बढ़ने लगा पर फिर भी परम्परागत कार्यो के लिए भारतीय कैलेंडर विक्रम संवत और क्षेत्रीय पंचांग व्यापक रूप में इस्तेमाल होते रहे. आजादी के बाद, नवंबर 1952 में वैज्ञानिक और औद्योगिक परिषद द्वारा पंचांग सुधार समिति की स्थापना की गई थी. इस समिति ने 1955 में अपनी रिपोर्ट सौंपी और विक्रम संवत को भी स्वीकार करने की सिफारिश की, लेकिन तत्कालीन शासन ने ग्रेगोरियन कैलेंडर को ही सरकारी कामकाज के लिए उपयुक्त मानकर 22 मार्च 1957 को इसे राष्ट्रीय कैलेंडर के रूप में स्वीकार कर लिया. 

भारत की विविधता गुड़ी पड़वा, बैसाखी, बिहू, विशु और युगादि जैसे त्योहारों के माध्यम से चमकती है. यह नववर्ष हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहने और अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संजोने की प्रेरणा देता है. यह केवल एक नववर्ष का उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति, विज्ञान और परंपरा का समन्वय है. यह हमें याद दिलाता है कि समय केवल एक गणितीय गणना नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और जीवनशैली से गहराई से जुड़ा हुआ है. भारतीय नववर्ष का यह स्वरूप न केवल हमें खगोलीय चक्रों के प्रति जागरूक करता है, बल्कि समाज और प्रकृति के साथ सामंजस्य बैठाने की सीख भी देता है. 

कुशाग्र राजेंद्र, एमिटी यूनिवर्सिटी हरियाणा में पर्यावरण विभागाध्यक्ष हैं. वे पर्यावरण के मुद्दे पर लगातार अलग-अलग मंचों पर लिखते रहते हैं. कुशाग्र राजेंद्र ने अपनी पढ़ाई जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पर्यावरण अध्ययन संस्थान यानी स्कूल ऑफ इनवॉयरनमेंटल स्टडीज से की है. वह वर्तमान में एमिटी यूनिवर्सिटी, गुरुग्राम में पर्यावरण अध्ययन विभाग में पढ़ाते हैं. अपने खाली समय में कुशाग्र फोटोग्राफी और घूमने का शौक रखते हैं और उनके संग्रह में प्रकृति की बहुत अच्छी तस्वीरें हैं. कुशाग्र मूलतः बिहार के रहने वाले हैं.
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