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जिंदा ही नहीं, मरा हुआ चूहा भी होता है बेहद खतरनाक, फैलाता है इतनी बीमारियां

घर के किसी कोने में चूहा मर भी गया है तो भी वह कई बीमारियां फैला सकता है. वर्ल्ड रैट डे के मौके पर ऐसे में हम आपको चूहों से होने वाली उन बीमारियों के बारे में बताएंगे जो काफी घातक हो सकती हैं.स

Rat Diseases: आप अपने घर को चाहे जितना साफ-सुथरा रख लें, किसी एक कोने में चूहे अपनी जगह बना ही लेते हैं. इसके बाद चूहे घर में जो आतंक फैलाते हैं वो अलग. कभी किचन में रखे सामान को नुकसान तो कभी अलमारी में रखे कपड़ों को कुतरना इन चूहों का काम होता है. हालांकि, नाली या गंदी जगहों से आपके घर में दाखिल होने वाले ये चूहे अपने साथ कई बीमारियां भी लेकर आते हैं, जो जानलेवा हो सकती हैं. इतना ही नहीं अगर घर के किसी कोने में चूहा मर भी गया है तो भी वह कई बीमारियां फैला सकता है. वर्ल्ड रैट डे के मौके पर ऐसे में हम आपको चूहों से होने वाली उन बीमारियों के बारे में बताएंगे जो चूहों की मौत के बाद भी काफी घातक हो सकती हैं. चलिए जानते हैं इसके बारे में... 

रैट बाइट फीवर

रैट बाइट फीवर अक्सर चूहों के काटने या उनके यूरीन या मले संपर्क में आने से फैलता है. दरअसल, नाली या गंदगी से निकलकर जब चूहे आपके घर में आते हैं तो कई सारे बैक्टीरिया भी अपने साथ ले आते हैं, रैट बाइट फीवर जैसी बीमारी फैलने का खतरा रहता है. 

लेप्टोस्पायरोसिस

यह बीमारी चूहों के यूरीन के संपर्क आने से फैलती है. यह एक तरह का बैक्टीरियल इंफेक्शन है, जिससे पीड़ित व्यक्ति को बुखार, सिर दर्द, मांसपेशियों में थकान और उल्टी जैसे लक्षण नजर आने लगते हैं. गंभीर मामलों में यह किडनी फेलियर और मौत का भी कारण बन जाता है. 

प्लेग

यह भी एक तरह का बैक्टीरियल इंफेक्शन है, जो चूहों की वजह से फैलता है. इसमें भी बुखार, थकान और ज्यादा पसीना आने से जैसे लक्षण नजर आते हैं. शुरुआती इलाज न मिलने पर यह गंभीर भी हो सकता है. 

ट्यूबरक्लोसिस

यह एक तरह का वायरस है, जो चूहों के मल या यूरीन के संपर्क में आने से फैलता है. इसमें सीधे इंसान के फेफड़े प्रभावित होते हैं. ज्यादा खांसी की वजह से फेफड़ो में दर्द होना शुरू हो जाती है. खांसी के साथ थकान, वजन कम होना और बुखार जैसे लक्षण दिखते हैं. 

यह भी पढ़ें: दुनिया के किस देश में हैं सबसे ज्यादा चूहे, किस नंबर पर आता है भारत?

प्रांजुल श्रीवास्तव एबीपी न्यूज में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. फिलहाल फीचर डेस्क पर काम कर रहे प्रांजुल को पत्रकारिता में 9 साल तजुर्बा है. खबरों के साइड एंगल से लेकर पॉलिटिकल खबरें और एक्सप्लेनर पर उनकी पकड़ बेहतरीन है. लखनऊ के बाबा साहब भीम राव आंबेडकर विश्वविद्यालय से पत्रकारिता का 'क, ख, ग़' सीखने के बाद उन्होंने कई शहरों में रहकर रिपोर्टिंग की बारीकियों को समझा और अब मीडिया के डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े हुए हैं. प्रांजुल का मानना है कि पाठक को बासी खबरों और बासी न्यूज एंगल से एलर्जी होती है, इसलिए जब तक उसे ताजातरीन खबरें और रोचक एंगल की खुराक न मिले, वह संतुष्ट नहीं होता. इसलिए हर खबर में नवाचार बेहद जरूरी है.

प्रांजुल श्रीवास्तव काम में परफेक्शन पर भरोसा रखते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता सिर्फ सूचनाओं को पहुंचाने का काम नहीं है, यह भी जरूरी है कि पाठक तक सही और सटीक खबर पहुंचे. इसलिए वह अपने हर टास्क को जिम्मेदारी के साथ शुरू और खत्म करते हैं. 

अलग अलग संस्थानों में काम कर चुके प्रांजुल को खाली समय में किताबें पढ़ने, कविताएं लिखने, घूमने और कुकिंग का भी शौक है. जब वह दफ्तर में नहीं होते तो वह किसी खूबसूरत लोकेशन पर किताबों और चाय के प्याले के साथ आपसे टकरा सकते हैं.

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