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History of Muharram: किसने किया था इमाम हुसैन को शहीद, जानिए मोहर्रम पर क्यों मनाया जाता है मातम?

History of Muharram: मोहर्रम इमाम हुसैन की शहादत और कर्बला की जंग की याद में मनाया जाता है. यह महीना कुर्बानी, इंसाफ और अत्याचार के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक माना जाता है.

History of Muharram: मुसलमानों के लिए मोहर्रम का महीना कोई सामान्य महीना नहीं होता, बल्कि इस दौरान इस्लामिक साल का पहला महीना शुरू होता है, जिसे मातम का महीना भी कहा जाता है. इस दौरान गलियों और मोहल्लों में मातम की आवाजें सुनाई देने लगती हैं. मोहर्रम का महीना इस साल जून के महीने में शुरू हुआ है.  चांद दिखने के हिसाब से इसकी तारीख तय होती है. मोहर्रम की दसवीं तारीख यानी आशूरा का दिन 26 जून 2026 को पड़ने का अनुमान है. 

यह पूरा महीना जुलाई के मध्य तक, यानी करीब 14 या 15 जुलाई तक चलेगा. ऐसे में कई लोगों के मन में यह सवाल आता है कि इतने सालों बाद भी इस दर्द को इतनी शिद्दत से क्यों याद किया जाता है? आखिर किसने किया था इमाम हुसैन को शहीद? यह किस्सा उस शख्सियत से जुड़ा है जिसकी कुर्बानी ने इंसाफ और हक की लड़ाई में एक मिसाल कायम कर दी. 

इमाम हुसैन और यजीद के बीच संघर्ष की शुरुआत कैसे हुई?

यह कहानी है पैगंबर मोहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन की शहादत की, जिसकी याद में लोग शोक मनाते हैं. बात उस वक्त की है जब इस्लाम की खिलाफत पर एक ऐसे शख्स का कब्जा हो गया था जो ताकत के नशे में सही और गलत का फर्क भूल बैठा था. यजीद खुद को इस्लाम का खलीफा घोषित करना चाहता था और उसने हर किसी को अपना गुलाम बनाना था. इमाम हुसैन ने इस अन्याय के सामने सिर झुकाने से साफ इनकार कर दिया, क्योंकि उनके लिए जुल्म के आगे झुकना मुमकिन नहीं था.  वे मदीना से निकलकर इराक की तरफ बढ़े और यहीं से शुरू हुआ वह सफर जिसने इतिहास का सबसे दर्दभरा अध्याय लिख दिया. 

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कर्बला की जंग में क्या हुआ था?

कर्बला के मैदान में जो हुआ, उसे सुनकर आज भी कई लोगों की रूह कांप जाती है.  एक तरफ था इमाम हुसैन का छोटा सा काफिला, जिसमें सिर्फ 72 साथी थे, और दूसरी तरफ यजीद की करीब आठ हजार सैनिकों की भारी फौज थी. दिन था आशूरा का, यानी मोहर्रम की दसवीं तारीख. इस जंग में महज छह महीने के मासूम अली असगर तक को नहीं बख्शा गया, जिसने इस घटना को और भी ज्यादा दर्दनाक बना दिया.  यही वह पल था जब हक की आवाज को दबाने की कोशिश हुई, लेकिन वह आवाज आज भी हर मोहर्रम में जिंदा हो उठती है. उस दौर से लेकर आज तक इमाम हुसैन कि मैत को लोग एक मौत नहीं मानते है वे उनकी इसलाम धर्म के लिए दी गई कुरबानी के रूप में देखते हैं. 

मोहर्रम आज भी क्यों है कुर्बानी और इंसाफ का प्रतीक?

इसी वजह से मोहर्रम सिर्फ एक इस्लामी महीना नहीं, बल्कि कुर्बानी और इंसाफ का प्रतीक बन गया है.  मातम इस बात का इजहार है कि इमाम हुसैन ने जो रास्ता चुना, वह सच और ईमानदारी का रास्ता था, चाहे उसकी कीमत जान देकर ही क्यों न चुकानी पड़े.  मोहर्रम के दसवें दिन ताजिए का जुलूस निकाला जाता है, मजलिसें होती हैं और शिया समुदाय के लोग सीना पीटकर अपना गम जाहिर करते हैं. 

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