क्यों शुरू हुई महिलाओं में शेविंग की आदत? वर्ल्ड वॉर से जुड़ा है तगड़ा कनेक्शन
महिलाओं में शेविंग की शुरुआत प्राचीन मिस्र में सामाजिक रुतबे के रूप में हुई थी, जिसे बाद में विज्ञापनों और विश्व युद्ध के दौरान की कुछ मजबूरियों ने इसे एक जरूरी फैशन बना दिया.

आज के आधुनिक दौर में वैक्सिंग और शेविंग को महिलाओं की ग्रूमिंग और खूबसूरती का एक एक बेहद जरूरी हिस्सा माना जाता है. किशोरावस्था से लेकर कामकाजी महिलाओं तक, हर कोई शरीर के अनचाहे बालों से पूरी तरह से छुटकारा चाहता है. लेकिन क्या आपको पता है कि इतिहास में हमेशा से ऐसा बिल्कुल नहीं था? असल में महिलाओं में शरीर के अनचाहे बाल साफ करने की यह आदत प्राकृतिक रूप से नहीं आई थी, बल्कि इसके पीछे सदियों पुराना इतिहास, दुनिया के सबसे बड़े विज्ञापनों का खेल और विश्व युद्ध की कुछ अप्रत्याशित मजबूरियां छिपी हुई हैं, जिन्होंने इस चलन को एक बिजनेस मॉडल में तब्दील कर दिया. चलिए इसके बारे में समझें.
प्राचीन मिस्त्र और रोमन साम्राज्य में भी शेव करती थीं महिलाएं
महिलाओं के द्वारा शरीर के अनचाहे बाल हटाने का सिलसिला बेहद पुराना है, जिसका सीधा कनेक्शन प्रचीन मिस्त्र और रोमन साम्राज्य के दौर से मिलता है. उस जमाने में मिस्त्र के उच्च और संभ्रांत वर्ग की महिलाएं अपने सामाजिक रुतबे को दिखाने के लिए शरीर के बाल साफ करती थीं. इसके लिए वे सीपियों से बने ट्वीजर्स, मधुमक्खी के मोम और चीनी से बने खास लेप का सहारा लेती थीं. वहीं ग्रीस और रोमन साम्राज्य की अमीर महिलाएं पत्थरों और एक विशेष लेप का इस्तेमाल करती थीं, जो केवल राजघरानों तक सीमित था.
मध्यकाल में धार्मिक मान्यताओं के चलते बदला फैशन
समय का पहिया घूमने के साथ ही मध्यकाल आते-आते पूरे यूरोप में शरीर के बाल साफ करने के इस पुराने चलन में भारी गिरावट देखने को मिली थी. इस ऐतिहासिक बदलाव के पीछे उस दौर की रूढ़िवादी धार्मिक विचारधाराएं और सामाजिक मान्यताएं जिम्मेदार थीं. हालांकि, इस पाबंदी के दौर में भी महिलाओं के बीच एक अनोखा फैशन काफी लोकप्रिय था. उस समय महिलाएं अपनी आइब्रो और माथे के पास की हेयरलाइन के बाल काफी पीछे तक साफ कर देती थीं, ताकि उनका चेहरा दिखने में ज्यादा गोल और आकर्षक लग सके.
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कपड़ों की नई डिजाइन से शुरू हुआ विज्ञापनों का नया खेल
उन्नीसवीं सदी के अंत तक पश्चिमी देशों की आम महिलाओं के बीच शरीर के बाल हटाने का कोई विशेष रिवाज नहीं था, क्योंकि उस दौर के पारंपरिक कपड़े पूरे शरीर को अच्छी तरह ढककर रखते थे. लेकिन बीसवीं सदी की शुरुआत में औद्योगिक क्रांति के साथ ही फैशन की दुनिया में बड़े बदलाव आने शुरू हो गए. महिलाओं के पहनावे छोटे होने लगे और इसी बदलते हुए दौर का फायदा उठाकर बड़ी-बड़ी रेजर निर्माता कंपनियों ने मुनाफा कमाने के लिए विज्ञापनों का एक नया खेल शुरू कर दिया.
ऐतिहासिक विज्ञापन ने बदल दी दुनिया
साल 1915 से पहले तक अमेरिका और यूरोप की आम महिलाएं अपने अंडरआर्म्स के बाल साफ करने के बारे में सोचती तक नहीं थीं. लेकिन तभी बाजार में अचानक स्लीवलेस ड्रेसेज का फैशन तेजी से मशहूर होने लगा. इस मौके को भांपकर रेजर कंपनियों ने साल 1915 में एक बहुत बड़ा विज्ञापन अभियान शुरू किया, जिसे इतिहास में द फर्स्ट ग्रेट एंटी-हेयर मूवमेंट कहा गया. इस अभियान ने महिलाओं को मॉडर्न दिखने के नाम पर अंडरआर्म्स शेव करने के लिए पूरी तरह से मानसिक रूप से तैयार कर दिया.
विश्व युद्ध का महिलाओं की शेविंग से कनेक्शन
अंडरआर्म्स शेविंग के बाद भी महिलाएं अपने पैरों के बाल शेव नहीं करती थीं, क्योंकि वे लंबी पोशाकों के नीचे नायलॉन से बनी स्टॉकिंग्स पहनती थीं. लेकिन दूसरे विश्व युद्ध ने इस पूरी व्यवस्था को हिलाकर रख दिया. युद्ध के मैदान में सेना के लिए पैराशूट बनाने में नायलॉन का इस्तेमाल अनिवार्य कर दिया गया, जिससे आम बाजारों में नायलॉन स्टॉकिंग्स का भारी किल्लत हो गई. इस मजबूरी के कारण महिलाओं को बिना मोजे पहने ही स्कर्ट और छोटी ड्रेसेज पहनकर बाहर निकलना पड़ा.
बिकिनी ने नए दौर ने शेविंग को बनाया जरूरी
बिना स्टॉकिंग्स के पैरों को साफ और सुंदर दिखाने के लिए महिलाओं ने मजबूरी में अपने पैरों के बालों को शेव करना शुरू किया, जो बाद में उनकी आदत में शुमार हो गया. विश्व युद्ध खत्म होने के बाद जब बाजार में घुटनों से ऊपर की शॉर्ट ड्रेसेज और स्विमवियर के रूप में बिकिनी ने एंट्री ली, तो इस नए फैशन ने महिलाओं के बीच शेविंग को महिलाओं की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बना दिया.























