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हॉन्गकॉन्ग की हाईराइज बिल्डिंग्स में क्यों बनाए जाते हैं बांस के मचान? जानें इसके फायदे और नुकसान

हॉन्गकॉन्ग दुनिया के उन कुछ शहरों में से एक है जहां आज भी बड़े पैमाने पर बांस के मचान बनाए जाते हैं. इसका बड़ा कारण है कि यह स्टील की तुलना में बहुत हल्की होती है. इसे लगाना और हटाना भी आसान होता है.

हॉन्गकॉन्ग में बुधवार को एक भीषण हादसा हुआ. इस हादसे ने हॉन्गकॉन्ग में निर्माण व्यवस्था पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं. दरअसल हॉन्गकॉन्ग के ताइ पो जिले के वांग फुक कोर्ट में भीषण आग लग गई थी. इस आग में अब तक 44 लोगों की मौत हो गई है और लगभग 300 लोग लापता है. 35 मंजिला इमारत के इस बड़े परिसर में लगी आग देखते ही देखते सात टावरों में फैल गई. बताया जा रहा है कि इमारत के बाहर लगे बांस के मचान आग के तेजी से फैलने की बड़ी वजह बने थे. वहीं, बांस की वजह से आग लगने के बाद यह चर्चा फिर से शुरू हो गई कि हॉन्गकॉन्ग में आखिर बांस के मचान क्यों बनाए जाते हैं. जानते हैं कि इसके फायदे और नुकसान क्या-क्या हैं?

हॉन्गकॉन्ग में क्यों इस्तेमाल की जाती है बांस के मचान?

हॉन्गकॉन्ग दुनिया के उन कुछ शहरों में से एक है जहां आज भी बड़े पैमाने पर बांस के मचान बनाए जाते हैं. इसका बड़ा कारण यह है कि यह स्टील की तुलना में बहुत हल्के होते हैं. इसे लगाना और हटाना भी आसान होता है. वहीं बांस की लागत भी काफी कम होती है. इसके अलावा कई एक्सपर्ट्स मानते हैं कि बांस सदियों से इस्तेमाल होता आया है इसलिए इसे आज भी सुरक्षित माना जाता है वहीं कुछ एक्सपर्ट्स इसे पुरानी तकनीक भी बताते हैं.

क्या बांस के मचान होते हैं सुरक्षित?

बांस के मचान सुरक्षित होने को लेकर एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इस मचान की मेटल स्कैफोल्डिंग ज्यादा स्थिर है और कम खतरे से भरी होती है. वहीं कुछ एक्सपर्ट्स बताते हैं कि बांस में छिपी हुई टूट फूट पता नहीं चलता है, तेज हवा और आग में बांस जल्दी कमजोर भी पड़ जाती है. वहीं कुछ एक्सपर्ट्स यह भी बताते हैं कि बांस के मचान को स्टील सपोर्ट और एंकर बोल्ट से मजबूती दी जाती है. ऐसे में अगर नियमित जांच हो तो या आसानी से नहीं गिरती हैं लेकिन अगर इसकी जांच नहीं की जाए तो इससे भारी नुकसान हो सकता है.

क्या है ट्रस-आउट स्कैफोल्डिंग, जिसमें लगी आग?

हॉन्गकॉन्ग हादसे में जो 15*8 मीटर की संरचना गिरी वह ट्रस-आउट स्कैफोल्डिंग थी. यह वह मचान होती है जो जमीन से नहीं बल्कि इमारत की दीवारों से बाहर निकाल ली होती है. इसे तब लगाया जाता है जब नीचे स्कैफोल्डिंग खड़ी करना मुमकिन या सुरक्षित न हो. हालांकि नियमों के अनुसार इसकी ऊंचाई 6 मीटर से ज्यादा नहीं होनी चाहिए. लेकिन इंजीनियर की डिजाइन के आधार पर इससे भी ऊपर बनाया जा सकता है. एक्सपर्ट्स इसे लेकर कहते हैं कि यह डिजाइन सुरक्षित तो है मगर इसमें पर्याप्त स्टील के सपोर्ट लगाए जाने चाहिए. वहीं वायर टाई सही मात्रा में हो और नियमित जांच भी होनी चाहिए. वहीं वांग फुक कोर्ट के सभी टावर बांस के मचान से ढंके हुए थे, क्योंकि वहां रिनोवेशन का काम चल रहा था. वहीं आग सबसे पहले इसी मचान में लगी और फिर तेज हवा, जलता हुआ मलबा और टावरों की ऊंचाई इन सब की वजह से लपटें एक इमारत से दूसरी इमारत तक फैल गई. इसी कारण सात टावरों में आग फैलती गई और हादसा इतना बड़ा हो गया.

ये भी पढ़ें-Hong Kong Fire: हॉन्गकॉन्ग की ऊंची इमारतों में आग लगने की वजह क्या, क्या भारत में भी हो सकता है ऐसा हादसा?

कविता एबीपी नेटवर्क नोएडा के साथ बतौर कंटेंट राइटर काम कर रही है. वर्तमान में कविता का मुख्य फोकस शिक्षा, करियर और नौकरी से जुड़ी खबरों पर रहता है.

करीब 3.5 साल से पत्रकारिता की दुनिया से जुड़ी कव‍िता एबीपी नेटवर्क से पहले राजस्थान पत्रिका में काम कर चुकी है. यहां  उन्होंने नेशनल एडिशन और अलग-अलग सप्लीमेंट्स के लिए काम किया. राजस्थान पत्रिका में करियर की उड़ान और सी न्यूज जैसे कॉलम वह कवर करती थी. इसी दौरान उन्हें हेलो डॉक्टर शो के साथ काम करने का अवसर मिला, जिसने उन्हें न्यूज़ प्रोडक्शन की बारीकियों को समझने का अनुभव दिया. वहीं पत्रकारिता के अलावा कविता की खास रुचि खेल, विशेष रूप से क्रिकेट में है. राजस्थान पत्रिका में रहते हुए कविता ने मदर्स डे स्पेशल स्पोर्ट्स एडिशन में भी काम किया है.

पढ़ाई की बात करें तो कविता ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, भोपाल से न्यू मीडिया टेक्नोलॉजी में मास्टर्स और अपेक्स यूनिवर्सिटी जयपुर से बैचलर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की.

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