इंडोनेशिया और मोनाको के एक जैसे क्यों हैं झंडे, क्या है दोनों देशों के बीच विवाद की जड़?
इंडोनेशिया और मोनाको दोनों देशों के राष्ट्रीय ध्वज में ऊपर लाल और नीचे सफेद रंग की दो क्षैतिज पट्टियां है. इनमें कोई प्रतीक बना है. यही वजह है कि दोनों झंडे देखने में लगभग एक जैसे नजर आते हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन दिनों इंडोनेशिया दौरे पर है. इस यात्रा के दौरान भारत और इंडोनेशिया के बीच रणनीति, व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंधों को लेकर कई बड़ी चर्चाएं हो रही है. इस बीच एक बार फिर इंडोनेशिया के राष्ट्रीय ध्वज की चर्चा तेज हो गई है. इसकी वजह दुनिया के उन सबसे चर्चित झंडो में से एक है जो दिखने में लगभग इंडोनेशिया के राष्ट्रीय ध्वज जैसा ही है. यह देश मोनाको है. पहली नजर में दोनों देशों के झंडों में फर्क कर पाना बहुत मुश्किल होता है. ऐसे में कई लोगों का सवाल रहता है कि आखिर दो अलग-अलग देशों के झंडे इतने सामान कैसे हैं, तो चलिए आज हम आपको बताते हैं कि इंडोनेशिया और मोनाको के एक जैसे झंडे क्यों हैं और दोनों देशों के बीच विवाद की क्या जड़ है.
इंडोनेशिया और मोनाको के झंडे क्यों है एक जैसे?
इंडोनेशिया और मोनाको दोनों देशों के राष्ट्रीय ध्वज में ऊपर लाल और नीचे सफेद रंग की दो क्षैतिज पट्टियां है. इनमें कोई प्रतीक, चिन्ह या निशान नहीं बना होता है. यही वजह है कि दोनों झंडे देखने में लगभग एक जैसे नजर आते हैं. हालांकि दोनों की डिजाइन समान होने के बावजूद उनके इतिहास, अर्थ और अपनाने की कहानी पूरी तरह अलग है.
पहले किसने अपनाया था लाल सफेद झंडा?
मोनाको ने 4 अप्रैल 1881 को आधिकारिक तौर पर लाल और सफेद रंग वाला अपना राष्ट्रीय ध्वज अपनाया. यह रंग वहां के शासक ग्रिमाल्डी राजवंश के पारंपरिक प्रतीक और राज्य चिन्ह से जुड़े हुए हैं, जिनका इतिहास 13वीं शताब्दी तक बताया जाता है. वहीं इंडोनेशिया ने 17 अगस्त 1945 को नीदरलैंड से आजादी की घोषणा के साथ अपने राष्ट्रीय ध्वज को अपनाया. इंडोनेशिया के अनुसार लाल और सफेद रंग की परंपरा उससे भी कहीं पुरानी है और इसका संबंध 13वीं से 15वीं शताब्दी के शक्तिशाली मजापहित साम्राज्य से है. इसी ऐतिहासिक विरासत के कारण देश ने स्वतंत्रता के समय यही झंडा चुना था. इंडोनेशिया के स्वतंत्र होने के बाद जब उसने यह झंडा अपनाया तो मोनाको ने इस पर आपत्ति जताई. मोनाको का कहना था कि दोनों देशों के झंडे एक जैसे होने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है. इसलिए इंडोनेशिया को अलग डिजाइन अपनाना चाहिए. हालांकि इंडोनेशिया ने यह बात नहीं मानी उसका तर्क था कि उसके राष्ट्रीय ध्वज के ऐतिहासिक जड़ें सदियों पुरानी है और यह देश की सांस्कृतिक पहचान और स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक है. इसलिए झंडा बदलने का कोई सवाल नहीं उठाता.
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कैसे निकाला विवाद का समाधान?
दोनों देशों ने अपने राष्ट्रीय ध्वज बरकरार रखें, लेकिन भ्रम कम करने के लिए उनके आकार में अंतर रखा गया. इंडोनेशिया के झंडे का अनुपात 2:3 है, जिससे वह लंबा और आयताकार दिखाई देता है. दूसरी और मोनाको के झंडे का अनुपात 4:5 है, इसलिए वह थोड़ा छोटा और लगभग वर्गाकार नजर आता है. इसके अलावा दोनों देशों में इस्तेमाल होने वाले लाल रंग की टोन में भी हल्का अंतर रखा गया है, हालांकि सामान्य नजर में इसे पहचानना आसान नहीं होता है.
संयुक्त राष्ट्र में भी बना था चर्चा का विषय
दोनों देशों के लगभग एक जैसे झंडों ने एक समय पर संयुक्त राष्ट्र में भी अधिकारियों को उलझन में डाल दिया था. उसे दौर में यह सवाल उठा था कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसे मामलों से बचने के लिए झंडे का कोई वैश्विक रजिस्ट्रेशन होना चाहिए. हालांकि दोनों देशों के ऐतिहासिक दावों को स्वीकार किया गया और किसी भी देश को अपना झंडा बदलने की जरूरत नहीं पड़ी थी.
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