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दवा के साथ दारू का क्या है पुराना कनेक्शन, जानें क्यों इलाज के साथ जुड़ गया शराब का नाम?

आपने अक्सर अपने घर के बड़े-बुजुर्गों के मुंह से सुना होगा कि अगर तबीयत खराब है तो दवा-दारू ले लो. लेकिन क्या आपको पता है कि यहां पर दारू का मतलब वह नहीं होता है जो आमतौर पर समझा जाता है.

हमारे या आपके घरों में जब भी कोई बीमार पड़ता है तो अक्सर बड़े-बुजुर्ग कहते हैं कि वक्त पर दवा-दारू कर लो. पहली बार में तो यह बात सुनने में अजीब लगती है कि बीमारी के इलाज में भला दारू का क्या काम होता है? लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि इस मशहूर मुहावरे का शराब से कोई लेना-देना नहीं है. आम बोलचाल के इस शब्द के पीछे भाषा, इतिहास और प्राचीन चिकित्सा पद्धति का एक बेहद दिलचस्प सफर छिपा है, जिसे लोगों ने गलत अर्थ में ले लिया. आइए दवा-दारू शब्द की अनोखी कहानी को समझते हैं.

लकड़ी से निकला इलाज का रास्ता

दरअसल हिंदी और कई अन्य भारतीय भाषाओं में इस्तेमाल होने वाले शब्द दारू का एक पुराना और एतिहासिक अर्थ औषधि यानी दवाई होता है. इस शब्द की जड़ें संस्कृत के दारू शब्द से जुड़ी हैं, जिसका असली मतलब लकड़ी होता है. पुराने जमाने में जब एलोपैथी दवाइयां नहीं हुआ करती थीं, तब आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा में ज्यादातर दवाएं पेड़-पौधों की छाल, उनकी जड़ों और लकड़ियों को पीसकर बनाई जाती थीं. चूंकि इलाज की मुख्य सामग्री लकड़ी से आती थी, इसलिए धीरे-धीरे जड़ी बूटियों से बनी इन औषधियों को दारू कहा जाने लगा.

विदेशी भाषा में आज भी है यह नाम

दिलचस्प बात तो यह है कि भारत ही नहीं बल्कि विदेशी भाषाओं में भी इस शब्द का दवाओं से गहरा नाता रहा है. फारसी भाषा में आज के आधुनिक दौर में भी मेडिकल स्टोर या फार्मेसी को दारूखाना कहा जाता है, जिसका साफ अर्थ दवाखाना ही होता है. समय बदलने के साथ जब भारत में पेड़-पौधों और वनस्पतियों को सड़ाकर या फिर उनके अर्क को डिस्टिल करके शराब तैयार की जाने लगी, तो लोग उस नशीले पेय को भी दारू कहने लगे. इस वजह से धीरे-धीरे यह शब्द शराब के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा.

क्या है दवा-दारू मुहावरे का असली अर्थ?

आज के वक्त में भले ही दारू सुनते ही हर किसी के मन में शराब की बोतल घूमने लगती हो, लेकिन मुहावरे के तौर पर इसका मतलब आज भी दवा से ही है. जब कोई आपसे कहे कि अपनी दवा-दारू समय पर कराओ तो इसका सीधा मतलब है कि समय पर अपना इलाज कराओ, डॉक्टर की सलाह लो और अपनी सेहत का ध्यान रखो. यह दो अलग-अलग भाषाओं और संस्कृतियों के मेल से बना सुंदर शब्द है, जो हमारी प्राचीन चिकित्सा पद्धति की याद दिलाता है.

यह भी पढ़ें: Harmonium History: विदेशी पैदाइश, तवायफखाने का दाग और 40 साल का बैन; जानें कैसे संगीत का शहंशाह बना हारमोनियम?

About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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