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पुराने जमाने में रत्ती से तोला जाता था सोना, आखिर क्या होती है रत्ती?

रत्ती असल में जंगलों में पाई जाने वाली एक खास फली के बीजों को कहा जाता है. यह बीज लाल, काले और कभी-कभी सफेद रंग के होते हैं. खास बात यह है कि रत्ती के इन दानों का वजन लगभग एक जैसा होता है.

रत्ती भर भी लाज नहीं या रत्ती भर प्यार नहीं जैसे मुहावरे आपने अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में अक्सर सुनते हैं. यहां रत्ती का मतलब बहुत थोड़ा सा होता है.खासतौर पर सोना, चांदी और कीमती रत्नों को तौलने में रत्ती का खूब इस्तेमाल होता था. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह रत्ती शब्द आया कहां से और यह माप का पैमाना कैसे बना? दरअसल इसके पीछे इतिहास, प्रकृति और सोने-चांदी के कारोबार से जुड़ी एक दिलचस्प कहानी छिपी है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि पुराने जमाने में जिस रत्ती से सोना तोला जाता था आखिर वह रत्ती होती है. 

जंगलों से जुड़ा है रत्ती का रिश्ता

रत्ती असल में जंगलों में पाई जाने वाली एक खास फली के बीजों को कहा जाता है. यह बीज लाल, काले और कभी-कभी सफेद रंग के होते हैं. खास बात यह है कि रत्ती के इन दानों का वजन लगभग एक जैसा होता है. यही वजह है कि पुराने समय में इन्हें प्राकृतिक तराजू की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा. वहीं आज जहां सोना ग्राम और तोला में तौला जाता है, वहीं पहले कीमती धातुओं और रत्नों की खरीद-फरोख्त रत्ती के हिसाब से होती थी. एक रत्ती, दो रत्ती कहकर सोने और ज्वेलरी की कीमत तय की जाती थी. धीरे-धीरे रत्ती केवल तौल की इकाई ही नहीं रही बल्कि जरा सा या बहुत कम का प्रतीक बन गई और भाषा में मुहावरों का हिस्सा बन गई.

आदिवासी कल्चर में आज भी जिंदा है रत्ती

छत्तीसगढ़ के गौरेला पेंड्रा मरवाही जैसे इलाकों के जंगलों में आज भी लाल, काली और सफेद रत्ती देखने को मिल जाती है. स्थानीय आदिवासी समुदाय इन दानों से आभूषण बनाकर पहनते हैं. शादी जैसे आयोजनों में भी रत्ती का खास इस्तेमाल होता है. कहीं इसे कनकन कहा जाता है तो कहीं गुंजा जबकि कुछ स्थानीय भाषाओं में इसे गेमची या बेमची भी कहते हैं.

आज के दौर में भी क्यों अहम है रत्ती?

भले ही अब सोने की तौल के लिए ग्राम सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता हो, लेकिन कई जगह पर रत्ती आज भी प्रचलन में है. खासकर गहनों और रत्नों की खरीद में कई जौहरी अब भी रत्ती के हिसाब से वजन बताते हैं. आधुनिक मानक के अनुसार 1 रत्ती का वजन करीब 0.12125 ग्राम माना जाता है, जिससे इसे ग्राम में बदलकर कीमत तय की जाती है. इस तरह रत्ती सिर्फ एक बीज या माप की इकाई नहीं, बल्कि भाषा, संस्कृति और व्यापारिक इतिहास का अहम हिस्सा रही है. 

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कविता एबीपी नेटवर्क नोएडा के साथ बतौर कंटेंट राइटर काम कर रही है. वर्तमान में कविता का मुख्य फोकस शिक्षा, करियर और नौकरी से जुड़ी खबरों पर रहता है.

करीब 3.5 साल से पत्रकारिता की दुनिया से जुड़ी कव‍िता एबीपी नेटवर्क से पहले राजस्थान पत्रिका में काम कर चुकी है. यहां  उन्होंने नेशनल एडिशन और अलग-अलग सप्लीमेंट्स के लिए काम किया. राजस्थान पत्रिका में करियर की उड़ान और सी न्यूज जैसे कॉलम वह कवर करती थी. इसी दौरान उन्हें हेलो डॉक्टर शो के साथ काम करने का अवसर मिला, जिसने उन्हें न्यूज़ प्रोडक्शन की बारीकियों को समझने का अनुभव दिया. वहीं पत्रकारिता के अलावा कविता की खास रुचि खेल, विशेष रूप से क्रिकेट में है. राजस्थान पत्रिका में रहते हुए कविता ने मदर्स डे स्पेशल स्पोर्ट्स एडिशन में भी काम किया है.

पढ़ाई की बात करें तो कविता ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, भोपाल से न्यू मीडिया टेक्नोलॉजी में मास्टर्स और अपेक्स यूनिवर्सिटी जयपुर से बैचलर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की.

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