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High Altitude: कितनी ऊंचाई को कहते हैं हाई एल्टीट्यूड, आम इंसान कितने फीट की ऊंचाई तक कर सकता है ट्रैक

आज के वक्त अधिकांश युवा घूमना पसंद करते हैं.युवाओं के अंदर ट्रैकिंग करने को लेकर भी क्रेज बढ़ रहा है.लेकिन क्या आप जानते हैं कि ट्रैकिंग के दौरान कितनी ऊंचाई वाली जगहों को हाई एल्टीट्यूड कहा जाता है?

दुनियाभर में घूमने का क्रेज तेजी से बढ़ रहा है. खासकर युवाओं में ट्रैकिंग करने की दिलचस्पी बढ़ी है. अभी हाल ही में केदारनाथ का कपाट खुलने के बाद से ही लगातार युवा बाबा केदार के दर्शन के लिए ट्रैक कर रहे हैं. लेकिन सवाल ये है कि कितनी ऊंचाई को हाई एल्टीट्यूड कहा जाता है? इसके अलावा एक सामान्य इंसान कितनी ऊंचाई तक ट्रैक कर सकता है? आज हम आपको बताएंगे कि हाई एल्टीट्यूड क्या होता है. 

हाई एल्टीट्यूड

किसी भी ऊंचाई वाले स्थान पर आपने अक्सर एक बोर्ड देखा होगा. इस बोर्ड पर समुंद्र तल से उस जगह की ऊंचाई लिखी होती है. समुद्र तल से 6,560 फीट से नीचे का कोई भी स्थान कम ऊंचाई वाला माना जाता है. वहीं इससे ऊपर की यात्रा मध्यम ऊंचाई और उच्च ऊंचाई वाली मानी जाती है. बता दें कि समुद्र तल से 6,560 से 9,840 फीट के बीच वाले स्थानों को मध्यम ऊंचाई वाला माना जाता है. वहीं समुद्र तल से 9,840 फीट से ऊपर की जगहें उच्च ऊंचाई वाली होती हैं. ये वो जगह होती है, जहां पर एक आम इंसान को ऊंचाई से संबंधित प्रभाव महसूस होते हैं. इन जगहों पर आम इंसान को हाई एल्टीट्यूड से संबंधित समस्याएं भी हो सकती हैं. 

कितने फीट पर हाई एल्टीट्यूड? 

सवाल ये है कि आखिर कितनी ऊंचाई पर हाई एल्टीट्यूड के प्रभाव दिखने को मिलते हैं. बता दें कि भारतीय सेना उच्च ऊंचाई (एचए) क्षेत्रों को 9,000 फीट (2,750 मीटर) से ऊपर के क्षेत्रों को हाई एल्टीट्यूड मानती है. 

हाई एल्टीट्यूड को तीन स्टेज में बांटा गया है.

पहला स्टेज है. जिसकी ऊंचाई  9,000–12,000 फीट (2,750–3,657 मीटर) होती है.
दूसरा स्टेज है. जिसकी ऊंचाई  12,000-15,000 फीट (3,657-4,572 मीटर) होती है.
तीसरा स्टेज है. जिसकी ऊंचाई 15,000 फीट से ऊपर (4,572 मीटर) होती है. 

हाई एल्टीट्यूड पर होने वाली समस्या

ट्रैकिंग के दौरान हाई एल्टीट्यूड पर सबसे पहली समस्या ऑक्सीजन की होती है. इसके अलावा अधिक ऊंचाई पर जाने पर व्यक्ति हाई एल्टीट्यूड पल्मोनरी एडिमा का शिकार हो सकता है. हाई एल्टीट्यूड पल्मोनरी एडिमा फेफड़ों में बनने वाला एक द्रव है, जो आमतौर पर 8,000 फ़ीट (2,500 मीटर) से अधिक ऊंचे स्थान पर तेज़ी से चढ़ने के 24 से लेकर 96 घंटों बाद विकसित होता है. इसे आम बोलचाल की भाषा में माउंटेन सिकनेस भी कहा जाता है. इस दौरान आपात स्थिति में व्यक्ति को ऑक्सीजन की जरूरत होती है. अधिकांश मामलों में समय से उपचार नहीं मिलने के कारण व्यक्ति की मौत भी हो सकती है. 

ये भी पढ़ें: India-Bhutan Border: पाकिस्तान बॉर्डर पर तो तैनात रहती है बड़ी फोर्स, मगर इंडिया-भूटान बॉर्डर पर कौन सी फोर्स?

गिरिजांश गोपालन को मीडिया इंडस्ट्री में चार साल से ज्यादा का अनुभव है. फिलहाल वह डिजिटल में सक्रिय हैं, लेकिन इनके पास प्रिंट मीडिया में भी काम करने का तजुर्बा है. दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद गिरिजांश ने नवभारत टाइम्स अखबार से पत्रकारिता की शुरुआत की. उन्हें घूमना बेहद पसंद है. पहाड़ों पर चढ़ना, कैंपिंग-हाइकिंग करना और नई जगहों को एक्सप्लोर करना उनकी हॉबी में शुमार है। यही कारण है कि वह तीन साल से पहाड़ों में ज्यादा वक्त बिता रहे हैं. अपने अनुभव और दुनियाभर की खूबसूरत जगहों को अपने लेखन-फोटो के जरिए सोशल मीडिया के रास्ते लोगों तक पहुंचाते हैं.
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