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अरुणा शानबाग से हरीश राणा तक, जानें इच्छामृत्यु के वे मामले, जिन्होंने भारत में बटोरीं सुर्खियां

हाल ही में, गाजियाबाद के हरीश राणा के मामले ने एक बार फिर इस बहस को सामने ला दिया है, लेकिन इस मुद्दे पर सबसे बड़ी चर्चा की शुरुआत 2011 में मुंबई की नर्स अरुणा शानबाग के मामले से हुई थी.

भारत में इच्छामृत्यु हमेशा से एक संवेदनशील और विवादास्पद विषय रही है. यह विषय सिर्फ कानून और न्यायपालिका तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि समाज, नैतिकता और धार्मिक विश्वासों के साथ भी जुड़ा रहा है. हाल ही में, गाजियाबाद के हरीश राणा के मामले ने एक बार फिर इस बहस को सामने ला दिया है, लेकिन इस मुद्दे पर सबसे बड़ी चर्चा की शुरुआत 2011 में मुंबई की नर्स अरुणा शानबाग के मामले से हुई थी , तो आइए अरुणा शानबाग से हरीश राणा तक इच्छामृत्यु के उन मामलों को जानते हैं , जिन्होंने भारत में सुर्खियां बटोरीं. 

अरुणा शानबाग से हरीश राणा तक इच्छामृत्यु के बड़े मामले

अरुणा शानबाग केस में  केईएम अस्पताल में नर्स अरुणा शानबाग के साथ हुए क्रूर हमले के बाद वे कोमा जैसी स्थिति में चली गईं. उनकी मित्र पिंकी विरानी ने 2011 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें निष्क्रिय इच्छामृत्यु की मांग की गई. सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज की, लेकिन इच्छामृत्यु के सिद्धांत को मान्यता दी. गैर-सरकारी संगठन कॉमन कॉज ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार मानते हुए निष्क्रिय इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता दी और लिविंग विल का अधिकार दिया. हरीश राणा केस में 31 वर्षीय हरीश राणा 12 साल से ज्यादा समय से कोमा में थे. उनके माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर उनकी जीवन रक्षक प्रणाली बंद करने की अनुमति दी. यह भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु का पहला लागू मामला माना जाता है. 

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निष्क्रिय इच्छामृत्यु और कानूनी प्रक्रिया

निष्क्रिय इच्छामृत्यु का मतलब है कि व्यक्ति की जीवन रक्षक प्रणाली या चिकित्सा उपचार को हटाया जाए, ताकि मृत्यु स्वाभाविक रूप से हो. सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इसके लिए विस्तृत प्रक्रिया तय की थी. जिसमें प्राथमिक और माध्यमिक चिकित्सा बोर्ड बनाना, लिविंग विल या अग्रिम चिकित्सा निर्देश की वैधता, विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम द्वारा रोगी की स्थिति का मूल्यांकन और साल 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रक्रिया को सरल बनाया. अब लिविंग विल को नोटरी या राजपत्रित अधिकारी के समक्ष सत्यापित कराना पर्याप्त है और डॉक्टरों के अनुभव की सीमा कम कर दी गई है. 

अरुणा से हरीश तक इच्छामृत्यु का भारत में सफर

अरुणा शानबाग (1973–2015)  पहला प्रमुख मामला जिसने देश में इच्छामृत्यु की बहस छेड़ी, पिंकी विरानी की याचिका (2011) के साथ सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु के सिद्धांत को स्वीकार किया, लेकिन आवेदन खारिज किया. इसके बाद कॉमन कॉज भारत सरकार (2018)  निष्क्रिय इच्छामृत्यु कानूनी मान्यता और लिविंग विल की शुरुआत हुई. हरीश राणा (2023) भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु लागू करने वाला पहला मामला रहा. ऐसे में अरुणा शानबाग से लेकर हरीश राणा तक, इच्छामृत्यु के मामलों ने न सिर्फ कानून, बल्कि समाज और चिकित्सा प्रणाली के नजरिए को बदलने में अहम भूमिका निभाई है. 

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