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Indian Army Reservation: भारतीय सेना में नहीं होती रिजर्वेशन पॉलिसी, जानें कब और क्यों लिया गया था यह फैसला

Indian Army Reservation: भारतीय सेना में किसी भी तरह का कोई आरक्षण नहीं होता है. आइए जानते हैं कि कब से है यह नियम और क्यों लिया गया था ऐसा फैसला.

Indian Army Reservation: भारतीय सेना देश के उन कुछ संस्थानों में से एक है जहां पर बिना किसी जाति या फिर धर्म आधारित आरक्षण के भर्ती की जाती है. यहां पर चयन पूरी तरह से योग्यता, शारीरिक फिटनेस, मानसिक शक्ति और अनुशासन के आधार पर होता है. इस नीति को आजादी के बाद से बदला नहीं गया है और इसे अक्सर सेना के प्रोफेशनलिज्म और ऑपरेशनल प्रभावशीलता के पीछे की बड़ी वजहों में से एक बताया जाता है.

1949 में लिया गया ऐतिहासिक फैसला 

आजादी के बाद 1949 में सेना नेतृत्व के सामने सैन्य भर्ती में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण को शुरू करने का प्रस्ताव रखा गया था. इस प्रस्ताव को स्वतंत्र भारत के पहले भारतीय कमांडर इन चीफ फील्ड मार्शल के.एम. करिअप्पा ने खारिज कर दिया था. उनका मानना था की सेना मानकों में किसी भी तरह की ढील नहीं दी जा सकती. उनका ऐसा कहना था कि आरक्षण शुरू करने से युद्ध की तैयारी में समझौता हो सकता है और बल के लड़ने की क्षमता कमजोर हो सकती है.

क्या थे मुख्य सिद्धांत 

सेना में आरक्षण न होने की मुख्य वजह युद्ध का स्वरूप ही है. युद्ध के मैदान में जीवित रहना शारीरिक सहनशक्ति और तुरंत निर्णय लेने के साथ-साथ साहस और दबाव में नेतृत्व पर निर्भर करता है. नागरिक सेवाओं के उलट सेना प्रशासनिक समायोजन के जरिए से कमजोरी की भरपाई नहीं कर सकती. हर सैनिक को सामान ऑपरेशनल मानकों को पूरा करना होगा क्योंकि युद्ध में गलती की कोई गुंजाइश नहीं होती. यही वजह है की योग्यता, फिटनेस और प्रशिक्षण चयन के मुख्य सिद्धांत हैं.

एक समरूप बल का विचार 

भारतीय सेना एक एकल, एकजुट एक रूप में काम करती है. यहां सैनिक किसी जाति, समुदाय या क्षेत्र के सदस्य के रूप में नहीं बल्कि देश के प्रतिनिधि के रूप में लड़ते हैं. जाति आधारित आरक्षण शुरू करने से इकाई के अंदर विभाजन पैदा हो सकता है. इस वजह से मनोबल और अनुशासन प्रभावित हो सकता है. 

हालिया बदलाव 

वैसे तो सेना में जाति आधारित आरक्षण कभी नहीं रहा लेकिन कुछ शाखाओं में लिंग आधारित सीट आवंटन का एक रूप मौजूद था. अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने जज एडवोकेट जनरल ब्रांच में पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग 6:3 सीट अनुपात को खत्म कर दिया. कोर्ट ने यह फैसला सुनाया की भर्ती एक ही संयुक्त मेरिट लिस्ट के जरिए होनी चाहिए.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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