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जमानत मिलने के बाद जेल से रिहाई में कितना वक्त लगता, जानें क्या हैं नियम

कोर्ट से जमानत मिलने के बाद आरोपी को जेल से कितने देर में रिहाई मिलती है. क्या इसके लिए किसी अन्य पेपर वर्क की जरूरत होती है ? जानिए सुप्रीप कोर्ट ने इसको लेकर क्या दिशा-निर्देश दिए हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने आज यानी मंगलवार को दिल्ली शराब घोटाला मामले से संबंधित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आप नेता संजय सिंह को जमानत दे दी है. वहीं ईडी ने सुप्रीम कोर्ट में संजय सिंह की जमानत याचिका का विरोध नहीं किया है. लेकिन सवाल ये है कि किसी आरोपी को जमानत मिलने के बाद रिहाई में कितना वक्त लगता है. आसान भाषा में कहें तो कोर्ट से जमानत का ऑर्डर मिलने के बाद जेल से निकलने में कितना समय लगता है.  

संजय सिंह का मामला

ताजा मामला आप नेता संजय सिंह का है. इसलिए सबसे पहले हम बताएंगे कि संजय सिंह को जमानत के बाद जेल से बाहर आने में कितना वक्त लगेगा. दरअसल सुप्रीम कोर्ट से जमानत का ऑर्डर पहले राउज़ एवेन्यू कोर्ट जाएगा और वहां बेल की कंडीशन तय होगी. जिसके बाद जमानत का बेल बांड भरने के बाद कोर्ट से रिलीज़ ऑर्डर तिहाड़ जेल भेजा जाएगा. जिसके बाद ही संजय सिंह जेल से बाहर आ सकेंगे.

किसी आरोपी को रिहाई में कितना वक्त लगता ?

जमानत को लेकर सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि कोर्ट जब किसी अंडर ट्रायल या दोषी को जमानत देता है तो उसके बाद जेल प्रशासन आगे की कार्यवाही को शुरू करेगा. वहीं अगर 7 दिन के अंदर जमानत मिलने के बाद कैदी को रिहा नहीं किया जा रहा है, तो जेल अधीक्षक को इसकी जानकारी डिस्ट्रिक्ट लीगल सर्विस अथॉरिटी को देनी होती है. वहीं दिल्ली हाईकोर्ट ने इससे पहले जेल प्रशासन से कहा था कि एसओपी तैयार करके ये सुनिश्चित होना चाहिए कि जिन कैदियों को जमानत दी गई है, उन्हें 48 घंटे की अवधि के अंदर जेल से रिहा किया जाना चाहिए. कोर्ट ने यह भी कहा था कि अंतिम संस्कार जैसी स्थिति में ये अवधि 5 से 6 घंटे की होनी चाहिए. 
 

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश

• अदालत जो एक अंडरट्रायल कैदी/दोषी को जमानत देती है, उसे उसी दिन या अगले दिन जेल अधीक्षक के माध्यम से कैदी को ई-मेल द्वारा जमानत आदेश की सॉफ्ट कॉपी भेजनी होगी. वहीं जेल अधीक्षक को ई-जेल सॉफ्टवेयर या कोई अन्य सॉफ्टवेयर जेल विभाग द्वारा उपयोग किया जा रहा उसमें जमानत देने की तारीख दर्ज करनी होगी.
• किसी भी आरोपी को जमानत देने की तिथि से 7 दिनों की अवधि के भीतर रिहा नहीं किया जाता है, तो यह जेल अधीक्षक का कर्तव्य होगा कि वह जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव को सूचित करें.  वहीं कैदी के साथ और उसकी रिहाई के लिए हर संभव तरीके से कैदी की सहायता और बातचीत करने के लिए पैरा लीगल वालंटियर या जेल विजिटिंग एडवोकेट को नियुक्त कर सकता है.

• इसके अलावा एनआईसी ई-जेल सॉफ्टवेयर में आवश्यक फ़ील्ड बनाने का प्रयास करेगा. जिससे जेल विभाग द्वारा जमानत देने की तारीख और रिहाई की तारीख दर्ज की जा सके. अगर कैदी 7 दिनों के भीतर रिहा नहीं होता है, तो एक स्वचालित ईमेल सचिव, DLSA को भेजा जा सकता है.

• वहीं डीएलएसए के सचिव अभियुक्तों की आर्थिक स्थिति का पता लगाने की दृष्टि से परिवीक्षा अधिकारियों या पैरा लीगल वालंटियर्स की मदद ले सकता है. जिससे कैदी की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर एक रिपोर्ट तैयार की जा सके. जिसे संबंधित न्यायालय को जमानत की शर्तों ढील देने के अनुरोध के साथ समक्ष रखा जा सके.

• इसके अलावा ऐसे मामलों में जहां अंडरट्रायल या दोषी अनुरोध करता है कि वह एक बार रिहा होने के बाद जमानत बांड या जमानत दे सकता है. उस वक्त एक उपयुक्त मामले में अदालत अभियुक्त को एक विशिष्ट अवधि के लिए अस्थायी जमानत देने पर विचार कर सकती है, ताकि वह जमानत बांड या जमानत प्रस्तुत कर सके.

• इसके अलावा जमानत देने की तारीख से एक महीने के भीतर जमानत बांड प्रस्तुत नहीं किया जाता है, तो संबंधित न्यायालय इस मामले को स्वतः संज्ञान में ले सकता है और विचार कर सकता है कि क्या जमानत की शर्तों में संशोधन/छूट की आवश्यकता है.

• सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियुक्त/दोषी की रिहाई में देरी का एक कारण स्थानीय जमानत पर जोर देना है. यह सुझाव दिया जाता है कि ऐसे मामलों में अदालतें स्थानीय जमानत की शर्त नहीं लगा सकती हैं.

 

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