SIR Policy: क्या है SIR की क्लीन डेटा पॉलिसी ? क्या इससे सच में हो रहा लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन
SIR Policy: हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने SIR प्रक्रिया को पूरी तरह से संवैधानिक बताया है. आइए जानते हैं कि क्या है क्लीन डेटा पॉलिसी.

- सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया को संवैधानिक बताया है।
- यह प्रक्रिया मतदाता सूची से मृत, स्थानांतरित लोगों के नाम हटाती है।
- आलोचकों ने गरीब, वंचितों पर इसके प्रभाव की चिंता जताई थी।
- कोर्ट ने कहा, सूची से नाम हटना नागरिकता रद्द नहीं करता।
SIR Policy: सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया के संबंध में एक बड़ा फैसला सुनाया है. फैसले में कहा गया है कि इस प्रक्रिया में कुछ भी असंवैधानिक नहीं है. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने टिप्पणी की कि चुनाव आयोग ने अपनी कानूनी शक्ति के दायरे में रहकर काम किया है और अपनी संवैधानिक अधिकार सीमा का उल्लंघन नहीं किया है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद SIR की क्लीन डेटा पॉलिसी को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं. इसी बीच आइए जानते हैं कि क्या है क्लीन डेटा पॉलिसी.
क्या है SIR ?
स्पेशल इंसेंटिव रिवीजन प्रक्रिया को एक बड़े पैमाने पर मतदाता सत्यापन अभियान के रूप में तैयार किया गया है. इसे राज्यों और जिलों में चलाया जाता है. इस प्रक्रिया के तहत बूथ लेवल अधिकारी घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन करते हैं. अधिकारी डिटेल्स की पुष्टि करने और इस बात को पक्का करने के लिए कि मतदाता रिकॉर्ड सटीक रहे घरों का कई बार दौरा कर सकते हैं. नए मतदाताओं को पहचान और निवास के प्रमाण वाले दस्तावेजों के साथ फॉर्म-6 जमा करना आवश्यक होता है.
चुनाव आयोग का कहना है कि इस अभियान का उद्देश्य मतदाता सूचियों से मृत व्यक्तियों, उन लोगों के नाम हटाना है जो स्थायी रूप से कहीं और चले गए हैं. इसी के साथ डुप्लीकेट प्रविष्टियों और फर्जी मतदाताओं के नाम हटाना है. इसे ही आसान शब्दों में क्लीन डेटा पॉलिसी कहा जा रहा है. इसके साथ ही आयोग का यह भी कहना है कि इस प्रक्रिया में सुरक्षा उपाय भी शामिल किए गए हैं. नियमों के मुताबिक किसी भी मतदाता का नाम मतदाता सूची के मसौदे से तब तक नहीं हटाया जा सकता जब तक कि कोई जांच ना हो जाए या फिर संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का अवसर न दिया जाए.
क्या यह लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है?
इस प्रक्रिया को चुनौती देने वाली कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर की गईं. ये याचिकाएं एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स जैसे संगठनों और अलग-अलग विपक्षी नेताओं द्वारा दायर की गई थीं. मुख्य चिंताओं में से एक चिंता मतदाता सूची के मसौदे से बड़ी संख्या में नाम को हटाए जाने से संबंधित थी. बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में विपक्षी दलों ने यह आरोप लगाया कि लाखों नाम गलत तरीके से हटा दिए गए. इसका संभावित असर गरीब और वंचित समुदायों पर पड़ सकता है.
आलोचकों ने यह तर्क भी दिया है कि दस्तावेजों की जिन जरूरतों को अनिवार्य किया गया है उनसे कमजोर तबके की आबादी पर भारी बोझ पड़ता है. बताया गया है कि 2003 के बाद पंजीकृत व्यक्तियों से विरासत या फिर पुश्तैनी दस्तावेज मांगे गए थे. इन्हें जुटाने में प्रवासी श्रमिक, आदिवासी समुदाय और दिहाड़ी मजदूरों को अक्सर काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.
एक और बड़ा आरोप यह था कि यह प्रक्रिया एक छिपी हुई राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर जैसी कवायत थी. आलोचकों का दावा था कि चुनाव आयोग परोक्ष रूप से नागरिकता की स्थिति की जांच कर रहा था. विपक्ष के मुताबिक यह एक ऐसा काम है जो संवैधानिक दायरे से बाहर है.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने उन आरोपों को खारिज कर दिया कि SIR प्रक्रिया लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन करती है या फिर संवैधानिक सीमाओं का अतिक्रमण करती है. कोर्ट ने यह साफ किया है कि संविधान के अनुच्छेद 324 और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 के तहत चुनाव आयोग के पास मतदाता सूची को संशोधित और शुद्ध करने का पूरा अधिकार है. साथ ही यह भी कहा गया है कि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटाए जाने का मतलब अपने आप यह नहीं हो जाता कि उसे गौर नागरिक घोषित कर दिया गया है.
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Source: IOCL


























