FIR रद्द करने का अधिकार किसके पास होता है, इसमें क्या आती हैं कानूनी अड़चनें?
1 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट के दिए गए आदेश में प्रदर्शनकारियों पर दर्ज FIR रद्द करने का फैसला सुनाया गया. ऐसे में जानिए किसी भी मामले में FIR रद्द करने के पीछे क्या प्रक्रियां होती है.

Cockroach Janta Party यानी CJP से जुड़े NEET-UG पेपर लीक विरोध प्रदर्शन के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन में शामिल छात्रों के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने का आदेश दिया है. 1 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने विशेष संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल करते हुए छात्रों यह राहत दी. हालांकि गंभीर आपराधिक मामलों में आरोपी लोगों के खिलाफ कार्रवाई जारी रखी जाएगी. ऐसे में आइए जानते हैं कि FIR रद्द करने की क्या प्रक्रिया होती है और कौनसे कानून का उपयोग इसमें किया जाता है.
क्या होती है FIR?
FIR पुलिस को किसी कथित अपराध की जानकारी देने वाली पहली रिपोर्ट होती है. इसके बाद पुलिस जांच करती है और सबूत जुटाती है. जिसका मतलब FIR से कोई दोषी साबित नहीं होता. अगर जांच में आरोप सही नहीं पाए जाते या पर्याप्त सबूत नहीं मिलते, तो पुलिस अदालत के सामने फाइनल रिपोर्ट या क्लोजर रिपोर्ट पेश करती है. यानी पुलिस के पास जांच रोकने या अंतिम रिपोर्ट देने की भूमिका जरूर है, लेकिन FIR को न्यायिक रूप से खत्म करने की शक्ति अदालत के पास होती है.
Article 142 का किया गया उपयोग
CJP के नेतृत्व में हुए NEET-UG पेपर लीक विरोध प्रदर्शनों के दौरान कई छात्रों के खिलाफ FIR दर्ज हुई थीं. सुप्रीम कोर्ट ने 1 सितंबर को इन प्रदर्शनकारियों को बड़ी राहत देते हुए FIR रद्द करने का आदेश दिया. कोर्ट ने यह भी सुनिश्चित करने की बात कही कि इन मामलों का छात्रों के भविष्य पर असर न पड़े. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने Article 142 के तहत अपनी विशेष शक्ति का इस्तेमाल किया है. इस मामले की वजह से Article 142 चर्चा का विषय बन गया है.
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क्या है Article 142?
आर्टिकल 142 भारतीय संविधान का एक महत्वपूर्ण प्रावधान है. इसके तहत सुप्रिम कोर्ट को विशेष शक्ती प्राप्त है. संविधान का Article 142 सुप्रीम कोर्ट को “पूरा न्याय” करने की खास ताकत देता है. अगर किसी मामले में सामान्य कानून के तहत समाधान पूरा नहीं हो पा रहा हो, तो सुप्रीम कोर्ट न्याय के हित में जरूरी आदेश दे सकता है. इस शक्ति का इस्तेमाल अदालत किसी मामले की खास परिस्थितियों को देखते हुए करती है. कोर्ट अपने आदेश संविधान और कानून के दायरे में देता है. FIR के मामलों में भी सुप्रीम कोर्ट इसका इस्तेमाल तब कर सकता है, जब किसी मामले को खत्म करना न्याय के हित में जरूरी लगे.
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