ब्लैक सी से क्या इंपोर्ट करता है भारत? समझें व्यापार का गणित
India Black Sea Imports: रूस यूक्रेन युद्ध का असर अब ब्लैक सी पर पड़ा है. आइए जानते हैं कि यहां से भारत क्या-क्या इंपोर्ट करता है?

- काला सागर भारत के लिए महत्वपूर्ण रणनीतिक व्यापार मार्ग है।
- भारत कच्चा तेल, सूरजमुखी तेल, खाद यहाँ से आयात करता है।
- रूसी-यूक्रेनी संघर्ष ने व्यापार मार्ग को जोखिम भरा बनाया है।
India Black Sea Imports: रूस-यूक्रेन संघर्ष की वजह से ग्लोबल सप्लाई चेन में बदलाव के बाद काला सागर दुनिया के सबसे अहम रणनीतिक व्यापार मार्गों में से एक बनकर उभरा है. भारत के लिए यह समुद्री इलाका सिर्फ एक जल मार्ग नहीं है बल्कि कच्चा तेल, सूरजमुखी का तेल, खाद और कई औद्योगिक सामानों का एक बड़ा जरिया है. हाल ही में इस इलाके में चल रहे कमर्शियल जहाज पर हुए हमले में भारतीय नाविकों की मौत पर भारत की चिंता के बाद काला सागर एक बार फिर से चर्चा में आ चुका है. इसी बीच आइए जानते हैं कि काला सागर से भारत क्या-क्या इंपोर्ट करता है.
भारत के लिए काला सागर जरूरी क्यों?
काले सागर के आस-पास रूस, यूक्रेन, रोमानिया, बुल्गारिया और तुर्की जैसे देश हैं. ये सभी ग्लोबल कमोडिटी व्यापार में एक बड़ी भूमिका निभाते हैं. यह इलाका ऊर्जा उत्पाद, कृषि उत्पाद और औद्योगिक सामानों के लिए एक बड़ा एक्सपोर्ट हब है. भारत के लिए यह सप्लाई ऊर्जा सुरक्षा, भोजन की उपलब्धता और कृषि उत्पादकता को मजबूत करने के लिए जरूरी है. ऐसा इसलिए क्योंकि काले सागर से कम ट्रांसपोर्ट लागत पर भारी मात्रा में सामान मंगाया जा सकता है।

सबसे ज्यादा किस चीज का इंपोर्ट?
कच्चा तेल वह सबसे कीमती सामान है जिसे भारत काले सागर से मंगाता है. काला सागर तट पर स्थित रूस का नोवोरोस्सियस्क बंदरगाह देश के सबसे बड़े तेल एक्सपोर्ट टर्मिनल में से एक है और यहां से बड़ी मात्रा में यूराल्स और साइबेरियन लाइट क्रूड का कारोबार होता है.
युद्ध शुरू होने के बाद से भारत ने रियायती दर पर रूसी कच्चा तेल खरीदना काफी बढ़ा दिया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक काला सागर बंदरगाह से भेजा जाने वाला तेल भारत के कुल रूसी कच्चे तेल के इंपोर्ट का लगभग 28% है. इससे यह इलाका भारत की ऊर्जा सप्लाई के लिए एक जरूरी आधार बन चुका है.
सूरजमुखी के तेल के लिए भी काला सागर जरूरी
कच्चे तेल के अलावा भारत खाने के तेल के इंपोर्ट के लिए भी काले सागर पर काफी ज्यादा निर्भर है. रूस, यूक्रेन और तुर्की मिलकर ग्लोबल सूरजमुखी तेल एक्सपोर्ट पर दबदबा बनाए रखते हैं और काला सागर दुनिया भर में सूरजमुखी तेल के एक्सपोर्ट का लगभग 76% हिस्सा कवर करता है. भारत अपनी घरेलू जरूरत को पूरा करने के लिए इस इलाके से हर महीने लगभग 2 लाख से ढाई लाख मीट्रिक टन सूरजमुखी का तेल इंपोर्ट करता है.

फर्टिलाइजर इंपोर्ट
भारत का खेती का सेक्टर भी काफी हद तक इसी जगह पर निर्भर है. यूरिया, पोटाश और फॉस्फेट जैसे जरूरी फर्टिलाइजर इस रीजन के देशों से भारत लाए जाते हैं. ये न्यूट्रिएंट्स पूरे देश में फसल उत्पादन के लिए काफी जरूरी हैं. इससे फूड सिक्योरिटी के लिए बिना रुकावट फर्टिलाइजर सप्लाई जरूरी हो जाती है. फर्टिलाइजर के अलावा भारत रोमानिया, और बुल्गारिया जैसे देशों से इंडस्ट्रियल मशीन, स्पेशलिटी स्टील, गेहूं और सीमित मात्रा में कोयला भी इंपोर्ट करता है.
ब्लैक सी रूट आर्थिक रूप से क्यों जरूरी?
दरअसल यह रास्ता भारत के लिए कई आर्थिक फायदे देता है. इस कॉरिडोर से बल्क कार्गो ट्रांसपोर्टेशन दूसरे रास्तों के मुकाबले माल ढुलाई का खर्च काफी कम रखता है. इससे जरूरी चीजें भारत तक ज्यादा सस्ते में पहुंच पाती हैं.
डिस्काउंट पर मिलने वाले रूसी कच्चे तेल ने इस रास्ते की अहमियत को और भी बढ़ा दिया है. जबकि सूरजमुखी तेल और फर्टिलाइजर की रेगुलर सप्लाई घरेलू बाजार को स्थिर करने में मदद करती है.
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व्यापार में आने वाली चुनौतियां
अपनी अहमियत के बावजूद रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे झगड़े की वजह से ब्लैक सी दुनिया के सबसे मुश्किल समुद्री व्यापार रास्ते में से एक बन चुका है. बंदरगाह और कमर्शियल जहाज पर बार-बार होने वाले हमले ने पूरे इलाके में सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं. कई बड़े एक्सपोर्ट टर्मिनल ड्रोन हमलों और मिलिट्री एक्टिविटी के लिए कमजोर बने हुए हैं. इस वजह से सप्लाई में रुकावट की चिंता बढ़ चुकी है.
इस इलाके में काम करने वाली शिपिंग कंपनियों को भी काफी ज्यादा इंश्योरेंस प्रीमियम का सामना करना पड़ रहा है. ऐसा इसलिए क्योंकि ब्लैक सी को अब हाई रिस्क जोन माना जाता है. इस तरह के एक्स्ट्रा खर्च आखिर में इंपोर्टेड सामान की कीमत को बढ़ा देते हैं.
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