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RSS Ban History: RSS पर कब-किसने लगाया प्रतिबंध, जानें यह संगठन कब-कब आया विवादों में?

कर्नाटक गृहमंत्री के द्वारा आरएसएस के रजिस्ट्रेशन पर उठाए गए सवाल के बाद संगठन का पुराना इतिहास और विवाद फिर से चर्चा में हैं. आइए जानें कि इस पर आखिर कब-कब बैन लगा और यह कितनी बार विवादों में रहा.

RSS Ban History: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ RSS के रजिस्ट्रेशन को लेकर देश में एक बार फिर से सियासी घमासान मचा हुआ है. कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खरगे ने संघ प्रमुख मोहन भागवत को पत्र लिखकर सीधा सवाल दाग दिया है कि क्या आरएसएस एक रजिस्टर्ड संस्था है? इसके जवाब में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने तर्क दिया है कि देश में हिंदू धर्म समेत कई बड़ी चीजें रजिस्टर्ड नहीं हैं, हालांकि उन्होंने माना कि संघ को रजिस्टर्ड होना चाहिए. इस नए विवाद ने आरएसएस के इतिहास, उनकी कार्यप्रणाली और अतीत में उस पर लगे प्रतिबंधो की यादें ताजा कर दी हैं. चलिए जानें कि यह संगठन कब-कब विवादों में आया.

आजादी के बाद लगा पहला ग्रहण

आरएसएस की स्थापना साल 1925 में हुई थी, लेकिन स्वतंत्र भारत में इस संगठन का सफर काफी उतार-चढ़ाव से भरा रहा है. देश को आजादी मिले अभी कुछ ही महीने हुए थे कि 30 जनवरी 1948 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या हो गई. इस जघन्य हत्याकांड के बाद देश के तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने कड़ा रुख अपनाते हुए 4 फरवरी 1948 को आरएसएस पर देश का पहला प्रतिबंध लगाया था. सरकार का मानना था कि संघ की गतिविधियां देश की आंतरिक सुरक्षा और सांप्रदायिक सौहार्द के लिए गंभीर खतरा बन चुकी हैं.

लिखित आश्वासन के बाद हटा बैन

गांधी जी की हत्या के बाद संघ के तत्कालीन प्रमुख एम.एस. गोलवलकर को भी गिरफ्तार कर लिया गया था. करीब डेढ़ साल तक चले इस कड़े प्रतिबंध के बाद संघ ने सरकार से साथ बातचीत का रास्ता तलाशा. आखिरकार जुलाई 1949 में सरदार पटेल ने कुछ सख्त शर्तों के साथ संघ से प्रतिबंध हटाया. इसके लिए आरएसएसको लिखित में आश्वासन देना पड़ा कि वह देश के संविधान का पूरी तरह से सम्मान करेगा, लोकतंत्र के मूल्यों को मानेगा, खुद को केवल सांस्कृतिक कार्यों तक सीमित रखेगा और राजनीति से पूरी तरह दूर रहेगा.

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आपातकाल के दौर में दूसरा बड़ा झटका

आरएसएस पर दूसरा प्रतिबंध साल 1945 में लगा, जब देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25 जून को देश में आपातकाल की घोषणा की. इंदिरा सरकार के इस फैलले के खिलाफ, देशभर के विपक्षी दलों ने एक बड़ा आंदोलन छेड़ दिया था, जिसमें आरएसएस के स्वयंसेवकों ने बेहद सक्रिय भूमिका निभाई. संघ के कार्यकर्ताओं ने सरकार की नजरों से बचकर भूमिगत आंदोलन चलाना शुरू कर दिया. इसे अपनी सत्ता के लिए चुनौती मानते हुए इंदिरा सरकार ने संघ पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी थी.

सरकार बदली तो मिली आजादी

आपातकाल के उस काले दौर में संघ के हजारों कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया. करीब 21 महीने तक यह प्रतिबंध लागू रहा. साल 1977 में जब देश से आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए तो इंदिरा गांधी को सत्ता से हाथ धोना पड़ा. इसके बाद केंद्र में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली बार गैर-कांग्रेसी जनता पार्टी की सरकार बनी. नई सरकार के आते ही आरएसएस पर यह दूसरा प्रतिबंध भी हट गया. 

बाबरी विध्वंस और तीसरा सरकारी एक्शन

संघ के इतिहास में तीसरा और आखिरी प्रतिबंध साल 1992 में लगा, जब 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित बाबरी मस्जिद का ढांचा ढहा दिया गया. इसके बाद पूरे देश में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे थे. देश के माहौल को बिगड़ता देख तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार ने कड़ा कदम उठाया. उन्होंने केंद्र के माहौल को शांत करने के लिए आरएसएस समेत कुछ अन्य दक्षिणपंथी और वामपंथी संगठनों पर बैन लगा दिया. हालांकि यह बैन ज्यादा लंबा नहीं चला और 1993 में कानूनी दखल के बाद इसे रद्द कर दिया गया.

विचारधारा और विवादों का चोली-दामन का साथ

अपने सौ साल के सफर में आरएसएस लगातार किसी न किसी वजह से विवादों के केंद्र में रहा है. सबसे बड़ा विवाद हिंदू-राष्ट्र की उनकी मूल विचारधारा को लेकर ही है. आलोचकों और विपक्षी दलों का यह आरोप है कि संघ की यह सोच भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान के खिलाफ है. इसके अलावा देश में जब भी कभी कोई बड़ा सांप्रदायिक तनाव या दंगा होता है तो विरोधी दल संघ की विचारधारा और उसके कार्यकरताओं की भूमिका पर सवाल उठने लगते हैं. यही वजह है कि संघ हमेशा विवादों में रहता है.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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