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संसद में बोलने के क्या हैं नियम, क्या कोई कुछ भी बयान दे सकता है?

संसद में बोलने की आजादी सभी को है, लेकिन वह नियमों की सीमा में बंधी हुई है. एक गलत उद्धरण न सिर्फ हंगामा खड़ा कर सकता है, बल्कि सदस्यता तक पर सवाल खड़े कर सकता है. आइए उन नियमों को जानें.

संसद में दिया गया एक-एक शब्द महज कोई बयान नहीं होता है, बल्कि उसका कानूनी और संवैधानिक मतलब भी होता है. हाल ही में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के एक बयान को लेकर ऐसा हंगामा हुआ कि सदन की कार्यवाही तक प्रभावित हो गई. ऐसे में सवाल उठने लगा कि क्या सांसद सदन में कोई कुछ भी बोल सकते हैं, क्या किसी भी किताब या दस्तावेज का हवाला देना जायज है और आखिर स्पीकर को उनके भाषण के बीच में हस्तक्षेप क्यों करना पड़ा. आइए जानें कि संसद में बोलने के क्या नियम हैं. 

संसद में बयान क्यों बने विवाद की वजह?

सोमवार को लोकसभा में उस वक्त माहौल गरमा गया, जब विपक्ष के नेता राहुल गांधी भारत-चीन संबंधों से जुड़े एक मुद्दे पर बोल रहे थे. उन्होंने पूर्व सेना प्रमुख एमएम नरवणे से जुड़ी एक किताब का हवाला दिया, लेकिन बताया गया कि यह किताब अभी प्रकाशित ही नहीं हुई है. इसी बात पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह ने आपत्ति जताई. उनका कहना था कि सदन में किसी अप्रकाशित किताब को कोट करना नियमों के खिलाफ है. इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने हस्तक्षेप किया और नियमों का हवाला देकर बयान रोक दिया.

लोकसभा का नियम 349 क्या कहता है?

सदन में बोलने और आचरण से जुड़े नियमों में लोकसभा का नियम 349 बेहद अहम माना जाता है. यह नियम सदन में सदस्यों द्वारा पालन किए जाने वाले नियमों से जुड़ा है. इसके तहत सांसदों को बताया गया है कि सदन की कार्यवाही के दौरान उन्हें कैसे व्यवहार करना चाहिए और किन बातों से बचना चाहिए. इस नियम में कुल 23 उपखंड हैं, जो सांसदों के आचरण से जुड़े अलग-अलग पहलुओं को कवर करते हैं.

किताब, अखबार या पत्र को कोट करने का क्या है नियम?

नियम 349 के उपखंड में साफ लिखा है कि सदन की बैठक के दौरान कोई भी सदस्य, सदन के कामकाज से अलग कोई पुस्तक, समाचार पत्र या पत्र नहीं पढ़ सकता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सांसद कभी भी किसी किताब या अखबार का हवाला नहीं दे सकते हैं. लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य के मुताबिक, अगर कोई दस्तावेज या सामग्री सीधे तौर पर सदन की कार्यवाही से जुड़ी हो, तो उसका उल्लेख किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए तय प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है.

राहुल गांधी के मामले में आपत्ति क्यों हुई?

राहुल गांधी के मामले में विवाद इसलिए हुआ क्योंकि वह जिस किताब का हवाला दे रहे थे, वह अभी प्रकाशित नहीं हुई है. नियमों के अनुसार, किसी अप्रकाशित किताब या दस्तावेज का उल्लेख करना गंभीर मामला माना जाता है, क्योंकि उसकी जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं होती और उसकी सत्यता की जांच संभव नहीं होती है. इसी कारण रक्षा मंत्री ने सवाल उठाया कि बयान का स्रोत क्या है और क्या उसे सत्यापित किया जा सकता है. 

नोटिस और स्पीकर की अनुमति क्यों जरूरी?

संसद में किसी किताब, अखबार या पत्र को कोट करने के लिए पहले से नोटिस देना होता है और लोकसभा अध्यक्ष की अनुमति लेनी जरूरी होती है. अनुमति मिलने के बाद ही किसी सामग्री को सदन में उद्धृत किया जा सकता है. इसका मकसद यह सुनिश्चित करना होता है कि सदन में रखी जा रही जानकारी तथ्यात्मक, सत्यापित और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हो.

नियम तोड़ने पर क्या हो सकती है कार्रवाई?

अगर कोई सांसद नियमों का उल्लंघन करता है, तो मामला गंभीर हो सकता है. ऐसे मामलों को संसद की विशेषाधिकार समिति के पास भेजा जा सकता है. यह समिति पूरे मामले की जांच करती है और अगर सदस्य दोषी पाया जाता है, तो उस पर कार्रवाई हो सकती है. गंभीर स्थिति में सांसद की सदस्यता पर भी खतरा आ सकता है. यही वजह है कि संसद में बोलते समय हर शब्द को सोच-समझकर रखने की जरूरत होती है.

संसद में बोलने से जुड़े अन्य अहम नियम

नियम 349 सिर्फ किताब या अखबार तक सीमित नहीं है. इसके तहत किसी सदस्य के बोलते समय बीच में शोर मचाना, नारे लगाना, सीट से उठकर टिप्पणी करना या सीटी बजाना भी नियमों के खिलाफ है. जब कोई सदस्य बोल रहा हो, तो उसके सामने से गुजरना या कार्यवाही में बाधा डालना भी मना है. इसके अलावा संसद भवन परिसर में ऐसा कोई साहित्य, पर्चा या पैम्फलेट बांटना भी प्रतिबंधित है, जिसका संबंध सदन के काम से न हो.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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