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अब प्लास्टिक वेस्ट से बनेगा क्लीन फ्यूल, जानें सूरज की रोशनी से कैसे होगा यह काम?

वैज्ञानिकों ने सूरज की रोशनी और प्लास्टिक कचरे को हाइड्रोजन और औद्योगिक ईंधन में बदलने की तकनीक विकसित की है. यह शोध प्लास्टिक प्रदूषण को खत्म करने के साथ-साथ जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करता है.

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  • कचरे की विविधता और उत्प्रेरक की मजबूती प्रमुख चुनौतियां हैं.

दुनिया इस समय दो सबसे बड़े संकटों से जूझ रही है पहला प्लास्टिक प्रदूषण और दूसरा स्वच्छ ऊर्जा की बढ़ती जरूरत. कल्पना कीजिए कि अगर हमारे समुद्रों और कचरे के ढेरों में पड़ा प्लास्टिक प्रदूषण फैलाने के बजाय आपकी गाड़ियों और फैक्ट्रियों के लिए ईंधन बन जाए? एडिलेड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी ही क्रांतिकारी तकनीक खोजी है, जो सूरज की रोशनी का इस्तेमाल करके बेकार प्लास्टिक को हाइड्रोजन और क्लीन फ्यूल में बदल सकती है. यह तकनीक न केवल कचरे की समस्या सुलझाएगी, बल्कि भविष्य के लिए एक प्रदूषण मुक्त ऊर्जा का रास्ता भी साफ करेगी.

प्लास्टिक प्रदूषण अब बनेगा अवसर

दुनिया भर में हर साल 46 करोड़ टन से ज्यादा प्लास्टिक का उत्पादन होता है, जिसका एक बड़ा हिस्सा हमारे पर्यावरण और समुद्रों में मिलकर उसे जहरीला बना रहा है. एडिलेड यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता शियाओ लू और उनकी टीम ने इस संकट को एक अवसर के रूप में देखा है. उनके ताजा शोध के मुताबिक, प्लास्टिक में कार्बन और हाइड्रोजन की मात्रा काफी अधिक होती है. अगर इसे सही तरीके से रिसाइकिल किया जाए, तो यह कचरा नहीं बल्कि ऊर्जा का एक बेशकीमती स्रोत साबित हो सकता है. यह तकनीक एक 'सर्कुलर इकोनॉमी' बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है.

सूरज की रोशनी का जादुई कमाल

इस पूरी प्रक्रिया को 'सोलर-ड्रिवन फोटोरेफॉर्मिंग' कहा जाता है. इसमें वैज्ञानिकों ने विशेष प्रकार के 'फोटोकैटालिस्ट' (प्रकाश-सक्रिय सामग्री) का इस्तेमाल किया है. जब सूरज की रोशनी इन सामग्रियों पर पड़ती है, तो वे कम तापमान पर ही प्लास्टिक के जटिल अणुओं को तोड़ना शुरू कर देती हैं. इस प्रक्रिया से हाइड्रोजन जैसी गैसें और औद्योगिक रसायन प्राप्त होते हैं. यह तकनीक इसलिए खास है क्योंकि यह सूरज की मुफ्त और प्राकृतिक ऊर्जा का उपयोग करती है, जिससे ऊर्जा की खपत काफी कम हो जाती है.

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क्लीन फ्यूल के तौर पर मिलती है हाइड्रोजन

फोटोरेफॉर्मिंग की प्रक्रिया से सबसे महत्वपूर्ण चीज जो निकलती है, वह है हाइड्रोजन. हाइड्रोजन को दुनिया का सबसे स्वच्छ ईंधन माना जाता है, क्योंकि इसे जलाने पर कार्बन डाइऑक्साइड नहीं, बल्कि केवल पानी की बूंदें निकलती हैं. पारंपरिक तरीके से पानी से हाइड्रोजन निकालना काफी महंगा और ऊर्जा खपत वाला काम है, लेकिन प्लास्टिक को ऑक्सीडाइज करना ज्यादा आसान है. इसलिए, प्लास्टिक से हाइड्रोजन बनाना न केवल किफायती है, बल्कि बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन के लिए भी एक बेहतर विकल्प बनकर उभरा है.

सफलता के शुरुआती शानदार नतीजे

एडिलेड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर शियाओगुआंग डुआन ने बताया कि हाल के अध्ययनों में इसके बेहद उत्साहजनक परिणाम मिले हैं. शोधकर्ताओं ने न केवल उच्च दर पर हाइड्रोजन बनाई, बल्कि एसिटिक एसिड और डीजल श्रेणी के हाइड्रोकार्बन भी तैयार करने में सफलता पाई है. कुछ परीक्षणों में तो यह सिस्टम लगातार 100 घंटों से अधिक समय तक काम करता रहा, जो इसकी स्थिरता और भविष्य की संभावनाओं को दर्शाता है. यह साबित करता है कि प्रयोगशाला के नतीजे अब धीरे-धीरे औद्योगिक हकीकत बनने की ओर बढ़ रहे हैं.

कचरे की जटिलता है सबसे बड़ी बाधा

हालांकि, इस तकनीक को घर-घर पहुंचाने से पहले वैज्ञानिकों के सामने कुछ बड़ी चुनौतियां भी हैं. सबसे बड़ी समस्या प्लास्टिक कचरे की विविधता है. हर प्लास्टिक एक जैसा नहीं होता; उनमें अलग-अलग रंग (डाइज) और स्टेबलाइजर्स मिले होते हैं, जो रासायनिक प्रक्रिया में बाधा डालते हैं. तकनीक को सही से काम करने के लिए प्लास्टिक कचरे की सटीक छंटाई और प्री-ट्रीटमेंट करना बहुत जरूरी है. जब तक कचरे की गुणवत्ता एक समान नहीं होगी, तब तक इससे निकलने वाले ईंधन की शुद्धता पर असर पड़ सकता है.

कैटालिस्ट और सिस्टम की मजबूती

एक और चुनौती फोटोकैटालिस्ट डिजाइन की है. इन सामग्रियों को न केवल सूरज की रोशनी के प्रति संवेदनशील होना चाहिए, बल्कि इन्हें रसायनों के बीच लंबे समय तक टिके रहने के लिए टिकाऊ भी होना होगा. वर्तमान सिस्टम में समय के साथ गिरावट आने लगती है, जिससे उनकी दक्षता कम हो जाती है. वैज्ञानिकों का मानना है कि हमें ऐसे मजबूत उत्प्रेरकों की जरूरत है जो वास्तविक दुनिया की कठोर परिस्थितियों को झेल सकें. साथ ही, प्रक्रिया के बाद निकलने वाली गैसों और तरल पदार्थों को अलग करना भी एक खर्चीला काम है.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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