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Pakistan Afghanistan War: सोवियत रूस से लेकर अमेरिका तक... अब तक कोई क्यों नहीं जीत पाया अफगानिस्तान?

Pakistan Afghanistan War: हाल ही में पाकिस्तान ने अफगानिस्तान पर हवाई हमले करने का दावा किया है. इसी बीच आइए जानते हैं कि आज तक अफगानिस्तान को कोई क्यों नहीं जीत पाया.

Pakistan Afghanistan War: अफगानिस्तान को काफी लंबे समय से साम्राज्यों का कब्रिस्तान कहा जाता है. यह एक ऐसा देश है जहां दुनिया की सबसे ताकतवर सेनाएं भी इसे हमेशा के लिए कंट्रोल करने में नाकाम रही हैं. हाल ही में पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच भी युद्ध जैसे हालात बन रहे हैं. पाकिस्तान एयर फोर्स ने अफगानिस्तान के कई इलाकों पर हवाई हमले किए हैं. पाकिस्तान का कहना है कि उसने आज सुबह अफगान आर्मी की चार पोस्ट तबाह कर दी है. इन सबके बीच आइए जानते हैं कि आज तक कोई भी देश अफगानिस्तान को पूरी तरह से क्यों नहीं जीत पाया.

सोवियत यूनियन का हमला

सोवियत यूनियन जैसी विदेशी ताकतें बार-बार एडवांस्ड हथियार और बड़ी सेनाओं के साथ अफगानिस्तान में घुसी हैं. लेकिन इसके बावजूद भी अपने मंसूबे पूरे नहीं कर पाई. सोवियत यूनियन ने कम्युनिस्ट सरकार को सपोर्ट करने और अपने इलाके में असर को बनाए रखने के लिए 24 दिसंबर 1979 को अफगानिस्तान पर हमला किया था.  मुजाहिदीन के नाम से जाने जाने वाले अफगान लड़ाकों ने सोवियत सेनाओं के खिलाफ जबरदस्त गुरिल्ला विरोध शुरू कर दिया था. 

 लगभग 9 साल की लड़ाई के बाद भारी मिलिट्री और आर्थिक नुकसान झेलने के बाद सोवियत यूनियन ने 15 फरवरी 1989 को अपनी आखिरी सेना को वापस बुला लिया. इस हार ने सोवियत ताकत को कमजोर कर दिया और आखिरकार उसके खत्म होने की नौबत आ गई. 

यूनाइटेड स्टेट्स की सबसे लंबी लड़ाई 

यूनाइटेड स्टेट्स ने 9/11 के आतंकी हमले के बाद अक्टूबर 2001 में अफगानिस्तान पर हमला किया. इसका मकसद अल-कायदा को खत्म करना और तालिबान सरकार को हटाना था. कुछ ही हफ्तों के अंदर तालिबान का राज खत्म हो गया और एक नई सरकार बन गई. लेकिन तालिबान फिर से इकट्ठा हो गया और 2 दशकों तक बगावत के ऑपरेशन जारी रखे. 

भारी मिलिट्री खर्च और NATO के सपोर्ट के बावजूद भी यूनाइटेड स्टेट्स तालिबान के असर को हमेशा के लिए खत्म नहीं कर पाया. 30 अगस्त 2021 को यूनाइटेड स्टेट्स ने वापसी कर ली और तालिबान ने जल्द ही अफगानिस्तान पर फिर से कंट्रोल कर लिया. 

क्या है अफगानिस्तान की ताकत? 

अफगानिस्तान का ऊबड़-खाबड़ इलाका इसके सबसे बड़े  डिफेंसिव फायदों में से एक है. देश में हिंदू कुश पहाड़ों की रेंज, गहरी घाटियां और दूर-दराज के इलाके हैं. इन्हीं कुदरती रूकावटों की वजह से विदेशी सेनाओं के लिए टैंक, गाड़ी और भारी हथियार तैनात करना काफी मुश्किल है. पहाड़ लड़ाकों को छुपने की कुदरती जगह देते हैं. इस वजह से वह अचानक हमला कर सकते हैं और फिर जल्दी से गायब हो सकते हैं. 

गुरिल्ला लड़ाई की टैक्टिक्स

अफगान लड़ाके गुरिल्ला लड़ाई में काफी ज्यादा माहिर हैं. इसमें हिट एंड रन हमला, घात लगाकर हमला करना और अचानक छापे मारना शामिल हैं. सीधे टकराव के बजाय वे लोकल इलाके की अपनी जानकारी के फायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं. 

इसी के साथ अफगान समाज कई कबीलों और कुलों में बंटा हुआ है. इनमें से हर एक का अपना लीडरशिप और असर है. इस डिसेंट्रलाइज्ड स्ट्रक्चर की वजह से बाहरी ताकतों के लिए पूरे देश में सेंट्रलाइज्ड अथॉरिटी को बनाना मुश्किल हो जाता है.

यह भी पढ़ें: 50 करोड़ में नीलाम हो रहा इंदौर का शराब ठेका, जानें पिछले साल क्या थी इसकी कीमत?

स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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