समुद्र के नीचे मिले तेल तो किसका अधिकार, क्या है इंटरनेशनल लॉ?
Oil And Gas EEZ Rules: आज के दौर में दुनिया बिना तेल और गैस के नहीं चल सकती है. ये दो चीजें बेहद जरूरी हैं, लेकिन सवाल यह है कि अगर किसी देश के समंदर के लिए तेल-गैस मिलता है तो उस पर किसका हक है.

- घरेलू उत्पादन से देश की अर्थव्यवस्था मजबूत, विदेशी मुद्रा बचती है।
Oil And Gas EEZ Rules: भारत सरकार ने देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और गहरे समुद्र से ईंधन तलाशने के लिए कुछ वक्त पहले 84,084 करोड़ रुपये की 'समुद्र मंथन योजना' को हरी झंडी दिखाई है. ऊर्जा और गैस किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं. यही वजह है कि अब तटीय सीमाओं के भीतर और उससे परे ईंधन के भंडार तलाशने की होड़ मची है, लेकिन सवाल उठना लाजिमी है कि गहरे पानी के नीचे छिपे इस बेहिसाब खजाने का आखिर असली मालिक कौन होता है? अंतरराष्ट्रीय नियम, कानूनी सीमाएं, भू-राजनीतिक अधिकार और तेल बनने का करोड़ों साल पुराना विज्ञान इसे कैसे परिभाषित करता है, आइए इसे समझते हैं.
समंदर में कैसे बनता है कच्चा तेल?
कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस कोई रातों-रात बनने वाली चीज नहीं है. करोड़ों साल पहले समुद्र, नदियों और झीलों में रहने वाले सूक्ष्मजीव जैसे डायटम और शैवाल जब मरते थे, तो वे तलहटी में जमा हो जाते थे. जीवनकाल में सूरज से सोखी गई ऊर्जा इनके अवशेषों में कार्बन के रूप में सुरक्षित रहती थीं. समय के साथ इन पर गाद, मिट्टी और चट्टानों की परतें चढ़ती गईं.
आक्सीजन की कमी के कारण ये अवशेष सड़े नहीं, बल्कि भारी दबाव और गर्मी से केरोजन नामक गाढ़े मोम जैसे पदार्थ में बदल गए. आगे चलकर जब तापमान 90 से 160 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचा, तो केरोजन कच्चे तेल में तब्दील हो गया. तापमान 160 डिग्री से ऊपर जाने पर यह प्राकृतिक गैस बन गया. अक्सर यह माना जाता है कि तेल डायनासोर के अवशेषों से बना है, लेकिन वैज्ञानिक तथ्य यह है कि ये सूक्ष्मजीव डायनासोर के अस्तित्व में आने से भी बहुत पहले से समुद्र की तलहटी में जमा हो रहे थे.
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समंदर में कैसे खोजा जाता है तेल?
शुरुआती दौर में तेल जमीन या समुद्र के ऊपरी हिस्सों में आसानी से मिल जाता था, लेकिन अब आसान भंडार लगभग खाली हो चुके हैं. यही वजह है कि तेल कंपनियां अब समुद्र की असीम गहराइयों में ड्रिलिंग कर रही हैं.
1949 का दौर: तेल कुओं की औसतन गहराई महज 3,500 फीट होती थी.
2008 का समय: तकनीक बदली और औसतन गहराई बढ़कर 6,000 फीट तक पहुंच गई.
वर्तमान स्थिति: आज दुनिया का सबसे गहरा तेल कुआं लगभग 40,000 फीट गहरा है, जो माउंट एवरेस्ट की कुल ऊंचाई (29,031 फीट) से भी लगभग 11,000 फीट अधिक है.
गहरे समंदर में तेल तलाशने के लिए सबसे पहले 'सीस्मिक सर्वे' से भूगर्भीय संरचना समझी जाती है, फिर विशालकाय फ्लोटिंग रिग्स लगाकर तली को भेदा जाता है.
किसका है समंदर का तेल क्या कहते हैं अंतरराष्ट्रीय कानून?
समुद्र के नीचे मौजूद खनिजों और ईंधन पर मालिकाना हक तय करने के लिए संयुक्त राष्ट्र का समुद्री कानून यानी UNCLOS (United Nations Convention on the Law of the Sea) लागू होता है, जिसके नियम बहुत साफ हैं:
1. विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ): किसी भी तटीय देश की तटरेखा से 200 नॉटिकल मील (लगभग 370 किलोमीटर) तक का समुद्री दायरा उस देश का Exclusive Economic Zone होता है. इस क्षेत्र में मिलने वाले सभी संसाधनों, तेल और गैस पर उसी देश का एकाधिकार होता है.
2. महाद्वीपीय शेल्फ का विस्तार: यदि किसी देश की समुद्री तली भौगोलिक रूप से आगे तक फैली है, तो वैज्ञानिक सबूत देकर वह अपने अधिकार क्षेत्र को 350 नॉटिकल मील तक बढ़ा सकता है.
3. आमने-सामने के देश: यदि दो देशों के बीच की दूरी 400 नॉटिकल मील से कम हो, तो सीमा निर्धारण मध्यस्थता या आपसी द्विपक्षीय समझौतों के जरिए होता है.
अथाह समंदर और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं
तटरेखा से 200 नॉटिकल मील के पार का इलाका हाई सीज या अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र कहलाता है. यहां किसी एक देश की दादागिरी नहीं चलती है.
International Seabed Authority (ISA): खुले समुद्र की तलहटी में मिलने वाले खनिजों और संसाधनों का प्रबंधन आईएसए के हाथों में होता है.
साझा नियम: अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र से संसाधन निकालने के लिए ISA की मंजूरी अनिवार्य है और इसका उपयोग शांतिपूर्ण कार्यों एवं पर्यावरणीय सुरक्षा को ध्यान में रखकर ही किया जा सकता है.

ऊर्जा आत्मनिर्भरता से बदलती देश की तस्वीर
यदि किसी देश को अपने ईईजेड (EEZ) में तेल का बड़ा भंडार मिल जाता है, तो उसकी किस्मत बदल जाती है. भारत जैसे देशों के लिए, जो अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करते हैं, घरेलू उत्पादन बढ़ने से विदेशी मुद्रा भंडार की भारी बचत होती है. इससे न केवल महंगा क्रूड ऑयल खरीदने से राहत मिलती है, बल्कि परिवहन, विनिर्माण उद्योग और संपूर्ण अर्थव्यवस्था को रणनीतिक मजबूती मिलती है.
कब तक चलेगा तेल का खजाना?
ब्रिटिश पेट्रोलियम (BP) के एक अध्ययन के अनुसार, यदि वर्तमान खपत और मौजूदा तकनीक के आधार पर ही निकासी चलती रही, तो वर्ष 2067 तक दुनिया का कच्चा तेल समाप्त हो सकता है. हालांकि, यह अंतिम आंकड़ा नहीं है. अगर समुद्र मंथन जैसी योजनाओं से नए भंडार खोज लिए जाते हैं, या नई तकनीक विकसित होती है, तो यह समय सीमा बढ़ भी सकती है.
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