ये वाला खजाना लुटने पर मुगलों का निकल गया था दिवाला, तीन साल के लिए अमीर हो गया था इजरायल का कट्टर दुश्मन
मुगल शान को गिराने वाला और इजराइल के कट्टर दुश्मन को अचानक अमीरी देने वाला यह खजाना आज भी इतिहास की सबसे रहस्यमयी लूट माना जाता है. आइए जानते हैं कि वह आखिर कौन सा खजाना था.

इतिहास के पन्नों में कई ऐसे मोड़ छिपे हैं, जो पढ़ते वक्त भी रोंगटे खड़े कर देते हैं. लेकिन एक ऐसा किस्सा भी है, जिसे जानकर यकीन करना मुश्किल हो जाता है कि किसी एक खजाने की लूट ने एक विशाल साम्राज्य की कमर तोड़ दी थी, जबकि उसी खजाने ने एक दूसरे देश को अचानक अमीरी की चरम सीमा पर पहुंचा दिया था. आखिर वह कौन-सा धन था, जिसे खोकर मुगल लगभग दिवालिया हो गए और जिसे पाकर इजरायल का कट्टर दुश्मन, यानी ईरान, तीन साल तक टैक्स-फ्री चल पड़ा?
मुगल शान का प्रतीक मयूर सिंहासन
भारत में मुगल साम्राज्य का नाम आते ही वैभव, शान और अद्भुत कला से भरे युग की तस्वीर मन में उभर आती है. खासकर शाहजहां का दौर, जिसकी पहचान सिर्फ ताजमहल से नहीं, बल्कि एक ऐसी अनोखी रचना से भी जुड़ी है, जिसे दुनिया आज भी हैरत से याद करती है- तख्त-ए-ताऊस, यानी मयूर सिंहासन. यह सिर्फ एक सिंहासन नहीं था, बल्कि मुगलों की असीमित संपन्नता, श्रेष्ठ कलाकारी और उस दौर की आर्थिक हैसियत का प्रतीक था.
इस अनोखे तख्त को बनाने में लगभग 1150 किलो शुद्ध सोने का इस्तेमाल किया गया था. इसकी सतह रुबी, नीलम, पन्ना, हीरे और हजारों मोतियों से ऐसी सजाई गई थी कि चमक से आंखें झिलमिला जाएं. इसमें सबसे खास थे, दो नाचते हुए मोर, जिनके बीच एक विशाल 80-90 कैरेट का हीरा जड़ा था, जिसे इतिहासकार कोहिनूर मानते हैं. साथ ही यहां दुनिया का एक और प्रसिद्ध हीरा दरिया-ए-नूर भी लगा था.
यह अद्भुत तख्त बनाने में पूरे सात वर्ष लगे. यह छह फीट लंबा और चार फीट चौड़ा एक ऐसा सिंहासन था, जिसे देखकर किसी भी राजा की सांसें थम जाएं.
नादिर शाह की नजर मुगल खजाने पर कैसे पड़ी?
साल 1739 आते-आते दिल्ली में मुगल सत्ता भीतर से हिल चुकी थी. मुहम्मद शाह रंगीला युद्ध और रणनीति दोनों में कमजोर साबित हो रहे थे. इसी बीच ईरान का शासक नादिर शाह भारत पर टूट पड़ा. करनाल की लड़ाई में मुगल सेना की करारी हार हुई और मजबूरी में मुहम्मद शाह को दिल्ली का खजाना खोलना पड़ा.
लेकिन एक अफवाह ने सब कुछ बदल दिया. शहर में यह खबर फैल गई कि नादिर शाह की हत्या कर दी गई है. गुस्से से बौखलाए नादिर शाह ने उसी रात आदेश दिया और दिल्ली में ऐसा कत्लेआम हुआ, जिसे इतिहास आज भी काले अध्याय की तरह याद करता है. एक ही दिन में 30 से 50 हजार लोगों की जान चली गई.
इसी कत्लेआम के बाद नादिर शाह ने दिल्ली का लगभग पूरा खजाना, अनगिनत जवाहरात और अंत में तख्त-ए-ताऊस को भी अपनी जीत की निशानी के तौर पर लूट लिया. इतिहासकारों का मानना है कि वह इतनी संपत्ति लेकर ईरान लौटा कि तीन साल तक उसे अपने देश में एक भी टैक्स नहीं लगाना पड़ा. ईरान उसी खजाने की वजह से अचानक अमीर बना रहा.
अब कहां है मयूर सिंहासन?
ईरान पहुंचते ही नादिर शाह ने मयूर सिंहासन को तोड़कर उसके दो सबसे बड़े खजाने कोहिनूर और दरिया-ए-नूर अलग कर दिए. बाद में नादिर शाह के मारे जाने के बाद यह तख्त धीरे-धीरे गायब हो गया. माना जाता है कि सिंहासन को या तो टुकड़ों में तोड़ दिया गया या नष्ट कर दिया गया.
लेकिन उसके दो अनमोल रत्न आज भी मौजूद हैं, कोहिनूर आज ब्रिटिश क्राउन में जड़ा है और दरिया-ए-नूर आज भी ईरान के म्यूजियम में सुरक्षित रखा है.
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