Mughal Era News System: क्या मुगलों के दौर में भी होते थे अखबार, जनता तक कैसे पहुंचते थे दरबार के शाही फैसले?
आज के दौर में न्यूज और न्यूज पेपर कितना जरूरी है यह बात सब जानते हैं. चलिए जानें कि मुगलों के दौर में खबरें जनता तक कैसे पहुंचती थीं, क्या उस दौर में भी अखबार होते थे.

Mughal Era News System: जब यूरोप के देश छपाई की मशीन की खोज कर दुनिया को हैरान कर रहे थे, ठीक उसी दौर में भारत के मुगल साम्राज्य सूचनाओं को सहेजने और बांटने का एक बेहद आधुनिक नेटवर्क तैयार कर चुका था. आज से समय में हमारे सुबह की शुरुआत चाय की चुस्की और अखबार के होती है, लेकिन सदियों पहले जब प्रिंटिंग का कोई वजूद नहीं था, तब मुगल सल्तनत में हाथ से लिखे जाने वाले समाचार पत्रों का बोलबाला था. इन एतिहासिक दस्तावेजों को अखबारात-ए-दरबार-ए-मुअल्ला कहा जाता था. फारसी भाषा में लिखे जाने वाले ये पन्ने सिर्फ सरकारी आदेश नहीं थे, बल्कि पूरे साम्राज्य की धड़कन हुआ करते थे.
हस्तलिखित पन्नों में कैद सल्तनत की रोजाना दास्तां
मुगलिया दौर में हर दिन शाही दरबार के लेखक बेहद बारीकी से अखबारात-ए-दरबार-ए-मुअल्ला तैयार करते थे. इन हस्तलिखित पत्रों में मुगल दरबार की रोज की कार्रवाही, खुफिया रिपोर्ट, राजा के शाही फरमान, सैन्य अभियानों के हाल, दूसरे देशों से आए राजनयिकों के संदेश, पैसों का हिसाब-किताब और बड़े पदों पर होने वाली नियुक्तियों का पूरा ब्यौरा दर्ज होता था. आज के इतिहासकारों के लिए विशेषकर क्रूर और विवादित माने जाने वाले मुगल शासक औरंगजेब आलमगीर के शासनकाल को गहराई से समझने के लिए ये पन्ने सबसे बड़ा और सबसे सटीक जरिया बन चुके हैं.
औरंगजेब, छत्रपति शिवाजी और राजपूत वीरों के किस्से
इन ऐतिहासिक दस्तावेजों की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इन्हें बेहद खूबसूरत फारसी शिकस्ता लिपि में लिखा गया था. इन पन्नों में जहां एक तरफ मुगल सेना के अभियान दर्ज हैं, वहीं दूसरी तरफ मराठा साम्राज्य के गौरव छत्रपति शिवाजी महाराज और मारवाड़ के वीर दुर्गादास राठौड़ जैसे प्रतापी भारतीय राजाओं के प्रतिरोध की कहानियां भी एक साथ पढ़ने को मिलती हैं. उस दौर में भी खबरें तेजी से सफर करती थीं. इन दिन इन शाही अखबारों की सैकड़ों-हजारों प्रतियां तैयार कर सूबों की राजधानियों में भेजी जाती थीं. जहां इन्हें राज्यपालों और राजपूत राजाओं के सामने जोर-जोर से पढ़कर सुनाया जाता था.
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लंदन में कैद हैं मुगल सल्तनत के 50 सालों के राज
मुगल काल के इन बेशकीमती समाचार पत्रों का एक बहुत बड़ा हिस्सा आज लंदन की रॉयल एशियाटिक सोसाइटी में सुरक्षित रखा हुआ था. उन्नीसवीं सदी में ब्रिटिश काल के दौरान इन बिखरे हुए पन्नों को हरे रंग के चमड़े की नौ बड़ी जिल्दों में बांधा गया था. इस विशाल संग्रह में साल 1660 से लेकर 1709 के बीच के यानी लगभग 50 साल के मुगल प्रशासन का पल-पल का प्रमाणिक इतिहास दर्ज है. हालांकि, ये भारत से ब्रिटेन कैसे पहुंचे, यह राज आज भी पूरी तरह से एक रहस्य बना हुआ है.
ब्रिटेन कैसे पहुंचे भारत के दस्तावेज
ज्यादातर इतिहासकारों का मानना है कि ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी और इतिहास प्रेमी जेम्स टॉड ने इन दस्तावेजों को राजस्थान के राजघरानों से इकट्ठा किया था और बाद में वे इसे अपने साथ इंग्लैंड ले गए. इन पन्नों के किनारों पर नागरी लिपि में लिखी गई छोटी टिप्पणियां इस बात का पुख्ता सबूत हैं कि ये कभी किसी राजपूत शासक के रिकॉर्ड कीपर के पास सुरक्षित थे, जिन्हें नियमित रूप से मुगल दरबार से ये सूचनाएं भेजी जाती थीं. सदियों तक ये पन्ने बिना किसी इंडेक्स या सूची के पुस्तकालयों में धूल फांकते रहे, जिससे इन तक पहुंच पाना बेहद मुश्किल था.
इतिहास के झूठे दावों और औरंगजेब के दौर का सच
बीबीसी की मानें तो उन्होंने इन हजारों पन्नों को खंगाला, तो कई ऐसी बातें सामने आईं जो पारंपरिक इतिहास की किताबों से बिल्कुल अलग हैं. उदाहरण के लिए औरंगजेब के दौर को लेकर बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन के दावे किए जाते हैं, इन समकालीन अखबारों में उनके कोई पुख्ता सबूत नहीं मिलते हैं. इसके उलट इन दस्तावेजों से यह पता चलता है कि उस दौर में औरंगजेब की बेटी जीनत-उन्-निसा और शाही हरम के अन्य सदस्यों राजनीति और शासन में कितनी बड़ी और प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं.
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