ISS में ज्यादा से ज्यादा कितने दिन रह सकता है इंसान, क्या है लिमिट?
इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर अंतरिक्ष यात्री आमतौर पर 6 महीने बिताते हैं, लेकिन रेडिएशन और जीरो ग्रैविटी के खतरों के बीच नासा के फ्रैंक रुबियो ने वहां लगातार 371 दिन रहने का ऐतिहासिक रिकॉर्ड बनाया है.

ब्रह्मांड के रहस्यों को जानने और अंतरिक्ष में इंसानी बस्तियां बसाने की दिशा में इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन हमारा सबसे बड़ा ठिकाना है. धरती से करीब 400 किलोमीटर ऊपर तैरती इस आधुनिक प्रयोगशाला में दुनिया भर के अंतरिक्ष यात्री जाकर महीनों तक रिसर्च करते हैं.
लेकिन जब भी हम किसी अंतरिक्ष मिशन की खबर सुनते हैं, तो मन में यह सवाल जरूर आता है कि आखिर एक इंसान स्पेस स्टेशन में ज्यादा से ज्यादा कितने दिन रह सकता है? क्या वहां रहने की कोई निश्चित समय सीमा यानी लिमिट तय की गई है?
सामान्य मिशन की अवधि और वर्तमान रिकॉर्ड
आमतौर पर इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर जाने वाले वैज्ञानिकों का एक सामान्य मिशन लगभग 6 महीने का होता है. अंतरिक्ष एजेंसियों के मुताबिक, मानव शरीर को स्वस्थ बनाए रखने और मिशन को बिना किसी जोखिम के पूरा करने के लिए 6 महीने की अवधि को सबसे सुरक्षित माना जाता है.
हालांकि, विशेष परिस्थितियों और रिसर्च के उद्देश्य से अंतरिक्ष यात्रियों को इससे कहीं अधिक समय तक भी वहां रोका गया है. अगर हम इतिहास के सबसे लंबे सिंगल स्पेस मिशन की बात करें, तो यह रिकॉर्ड रूस के अंतरिक्ष यात्री वलेरी पोल्याकोव के नाम दर्ज है, जिन्होंने साल 1994-1995 के दौरान अंतरिक्ष स्टेशन Mir पर लगातार 437 दिन और 18 घंटे बिताए थे.
वहीं, अगर केवल इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन की बात की जाए, तो NASA के अंतरिक्ष यात्री फ्रैंक रूबियो के नाम सबसे लंबे समय तक लगातार 371 दिन रहने का अमेरिकी रिकॉर्ड है. हाल ही में रूसी अंतरिक्ष यात्रियों ने भी आईएसएस पर 370 दिनों से अधिक समय बिताया है.
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आखिर क्या है स्पेस स्टेशन में रहने की लिमिट?
अगर तकनीकी तौर पर देखा जाए, तो स्पेस स्टेशन में रहने की कोई तय या फिक्स्ड एक्सपायरी डेट नहीं होती. जब तक स्पेस स्टेशन को पृथ्वी से खाना, पानी और ऑक्सीजन जैसी जरूरी चीजें समय पर मिलती रहेंगी, तब तक इंसान वहां लंबे समय तक टिका रह सकता है. जीवन रक्षक प्रणालियों के बूते वहां पानी और हवा को रीसायकल किया जाता है.
ज्यादा समय रहने पर शरीर को होने वाले नुकसान
अंतरिक्ष में इंसानों को रोकने की सबसे बड़ी सीमा वहां का पर्यावरण और जीरो ग्रेविटी है. शून्य गुरुत्वाकर्षण में रहने के कारण मानव शरीर पर कई तरह के गंभीर दुष्प्रभाव पड़ते हैं, जो एक समय के बाद जानलेवा हो सकते हैं. धरती पर चलते-फिरते समय हमारी हड्डियां और मांसपेशियां शरीर का वजन उठाती हैं. स्पेस में वजन न होने के कारण मांसपेशियां सुस्त पड़ जाती हैं और हड्डियां अपनी डेंसिटी खोने लगती हैं, जिससे ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा बढ़ जाता है. इससे बचने के लिए वहां हर वैज्ञानिक को रोज 2 घंटे कड़ा वर्कआउट करना पड़ता है.
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