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Cluster Bomb Cost: कितने रुपये में बन जाता है क्लस्टर बम, एक बार में कितनी मचा सकता है तबाही?

Cluster Bomb Cost: इजरायली अधिकारियों ने ऐसा दावा किया है कि ईरान ने उन पर क्लस्टर बमों का इस्तेमाल किया है. इसी बीच आइए जानते हैं कि कितने खतरनाक होते हैं ये बम.

Cluster Bomb Cost: ईरान-इजरायल लड़ाई के दौरान क्लस्टर बम वाली मिसाइलों के इस्तेमाल की खबरों के बाद मिडिल लिस्ट में तनाव बढ़ चुका है. इजरायली अधिकारियों का ऐसा दावा है कि ईरान ने क्लस्टर वॉरहेड वाली बैलिस्टिक मिसाइलों को इजरायली इलाके की ओर लॉन्च किया है. इन हथियारों के कथित इस्तेमाल ने इंटरनेशनल बहस छेड़ दी है. इसी बीच आइए जानते हैं कि यह हथियार कितने खतरनाक हैं और इन्हें बनाने में कितना खर्च आता है.

कितने में बनता है एक क्लस्टर बम? 

क्लस्टर बम की सही लागत उसके टाइप, डिलीवरी सिस्टम और टेक्नोलॉजी के लेवल के आधार पर काफी अलग-अलग होती है. आर्टिलरी शेल में इस्तेमाल होने वाले बेसिक क्लस्टर हथियार, एडवांस्ड प्रिसिजन गाइडेड सिस्टम की तुलना में काफी सस्ते होते हैं. जैसे एक स्टैंडर्ड 155 एमएम आर्टिलरी शेल की कीमत आमतौर पर $500 से $3000 के बीच होती है. भारतीय मुद्रा में यह रकम लगभग ₹42000 से  ₹2.5 लाख के बीच होती है. इसे क्लस्टर म्यूनिशन के तौर पर भी इस्तेमाल किया जा सकता है. यह शेल एक बार फायर होने पर कई छोटे एक्सप्लोसिव सब्म्यूनिशन को फैला देते हैं.

एडवांस्ड सेंसर और टारगेटिंग टेक्नोलॉजी से लैस मॉडर्न स्मार्ट क्लस्टर म्यूनिशन कहीं ज्यादा महंगे होते हैं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण SMArt-155 है. इसकी सटीक टारगेटिंग कैपेबिलिटी की वजह से हर यूनिट की कीमत लगभग 80000 डॉलर तक हो सकती है. अगर क्लस्टर वॉरहेड को बैलिस्टिक मिसाइल पर लगाया जाए तो कीमत काफी ज्यादा बढ़ जाती है. 

क्लस्टर बम कैसे काम करता है?

क्लस्टर बम आम बमों से काफी अलग होता है. यह एक ही धमाके में नहीं फटता. दरअसल इसका मेन कंटेनर हवा में खुल जाता है. इस मेन कंटेनर को अक्सर कैरियर या फिर डिस्पेंसरी भी कहा जाता है. खुलने के बाद यह दर्जनों या फिर सैकड़ों छोटे एक्सप्लोसिव छोड़ता है. इन्हें सबम्यूनिशन या बॉम्बलेट कहा जाता है. ये छोटे बम जमीन पर फटने से पहले एक बड़े एरिया में फैल जाते हैं. इस डिजाइन की वजह से क्लस्टर म्यूनिशन एक साथ कई टारगेट पर हमला कर सकते हैं.

तबाही का एक बड़ा एरिया 

क्लस्टर बमों की खासियत यह है कि वे काफी बड़े एरिया को कवर कर सकते हैं. जब कैरियर हवा में फटता है तो बॉम्बलेट एक ऐसे एरिया में फैल जाते हैं जो कई फुटबॉल फील्ड जितना बड़ा हो सकता है. हथियार के टाइप के आधार पर एक क्लस्टर कंटेनर 9 से लेकर कई सौ सबम्यूनिशन तक छोड़ सकता है.

सबम्यूनिशन का जानलेवा रेडियस

हर सबम्यूनिशन का अपना एक एक्सप्लोसिव चार्ज और फ्रैगमेंटेशन सिस्टम होता है. भले ही वे दिखने में छोटे लगें लेकिन काफी खतरनाक होते हैं. एक आम बम लगभग 50 से 100 मीटर के दायरे में जानलेवा चोट या गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है. जब इनमें से दर्जनों विस्फोटक एक बड़े इलाके में एक साथ फटते हैं तो नुकसान पहुंचाने वाला असर काफी बड़ा हो सकता है.

इनकी खास बात यह है कि सभी सबम्यूनिशन तुरंत नहीं फटते. रिपोर्ट्स के मुताबिक 2% से 40% बम फटने में फेल हो सकते हैं. यह बिना फटे विस्फोटक जमीन पर बिखरे रहते हैं और लैंडमाइन की तरह काम करते हैं. जिससे लड़ाई खत्म होने के काफी समय बाद भी खतरा बना रहता है. इन्हीं खतरों की वजह से क्लस्टर बमों पर 2008 में 100 से ज्यादा देशों ने कन्वेंशन पर साइन किए थे. यह एक ट्रीटी है जो इन हथियारों के इस्तेमाल, प्रोडक्शन और ट्रांसफर पर रोक लगाती है. अब तक इसमें 111 देशों ने साइन किए हैं लेकिन ईरान और इजरायल समेत कई देश इसमें शामिल नहीं हुए.

यह भी पढ़ें: क्या है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, जानें कैसे मिला था इसे इसका यह नाम?

स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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