Iran Protests: जब ईरान में इस्लाम नहीं था, तब वहां कैसे रहती थीं औरतें, कितनी थी आजादी?
Iran Protests: ईरान में इस वक्त विरोध प्रदर्शन चल रहा है. इसी बीच आइए जानते हैं कि इस्लाम से पहले वहां पर कौन सा धर्म था और महिलाओं को कितनी आजादी थी.

Iran Protests: 2026 की शुरुआत में ईरान में महंगाई, करेंसी गिरने और आर्थिक मुश्किलों को लेकर विरोध प्रदर्शन फैला हुआ है. इसी बीच लोगों के मन में एक सवाल उठ रहा है कि सदियों से ईरान समाज कैसे बदला है और खासकर महिलाओं के लिए. जब ईरान में इस्लाम नहीं था तब वहां पर औरतें कैसे रहती थीं और उन्हें कितनी आजादी मिली हुई थी. आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.
इस्लाम से पहले कौन सा धर्म था वहां
सातवीं सदी में अरबों की जीत से पहले ईरान ज्यादातर पारसी था. पारसी फिलॉस्फी में नैतिक चुनाव, सच्चाई और आध्यात्मिक समानता पर जोर दिया गया था. इसका असर सीधा इस बात पर पड़ा कि समाज में महिलाओं को कैसे देखा जाता था. हालांकि समाज पितृसत्तात्मक था लेकिन महिलाएं शक्तिहीन नहीं थी.
कानूनी अधिकार और आर्थिक स्वतंत्रता
ससानियन साम्राज्य में महिलाओं को मान्यता प्राप्त कानूनी अधिकार थे. वे संपत्ति की मालिक हो सकती थीं, धन विरासत में पा सकती थीं, जमीन खरीद और बेच सकती थीं और व्यवसाय भी चला सकती थीं. कानूनी विवादों में महिलाओं को अदालत में गवाही देने की अनुमति थी और कुछ मामलों में वे परिवार की संपत्ति को अकेले भी संभाल सकती थीं.
राजनीतिक शक्ति और महिला शासक
ईरानी इतिहास में ऐसी महिलाओं का जिक्र है जिन्होंने खुद साम्राज्य पर शासन किया. रानी बोरान और रानी अजरमिदोख्त 7वीं सदी में ससानियन सिंहासन पर बैठी. इसी के साथ कुलीन और शाही परिवारों की महिलाओं को औपचारिक शिक्षा भी मिलती थी. ऐतिहासिक ग्रंथ और शिलालेख बताते हैं कि कुछ महिलाओं ने डॉक्टर, प्रशासक और यहां तक की सैन्य अधिकारी के रूप में भी काम किया है.
सामाजिक रीति रिवाज
आधुनिक मान्यताओं के उलट पर्दा इस्लाम से पहले भी मौजूद था. लेकिन यह जरूरी नहीं था. इसे घशियेह कहा जाता था. यह कुलीन महिलाओं के बीच सामाजिक दर्जे का प्रतीक था. आम महिलाएं जैसे कि किसान, कारीगर, व्यापारी बिना किसी जबरदस्ती के पर्दे के सार्वजनिक जगहों पर आजादी से घूमती थीं. पारसी धर्म में पुरुषों और महिलाओं को आध्यात्मिक रूप से एक समान ही माना जाता था. महिलाएं धार्मिक अनुष्ठान, अग्नि मंदिर समारोह और सामुदायिक पूजा में भाग ले सकती थी. नैतिक जिम्मेदारी भी अलग-अलग थी, जिसमें लिंग की प्रवाह किए बिना सभी एक साथ काम करते थे.
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Source: IOCL
























