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इस मुस्लिम देश में मरने के बाद पेड़ में करते हैं दफन, बड़ी भयानक है यह परंपरा?

इंडोनेशिया में एक ऐसी परंपरा है, जो कि यह सिखाती है कि किसी भी रिवाज को डरावना कहने से पहले उसके पीछे की मान्यताओं को समझना जरूरी है. जो परंपरा बाहर से डरावनी दिखे, वही भीतर से आस्था हो सकती है.

दुनिया में मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार की परंपराएं हर संस्कृति में अलग-अलग होती हैं, लेकिन कुछ रिवाज ऐसे हैं जो पहली नजर में चौंका देते हैं. इंडोनेशिया में एक ऐसा इलाका भी है, जहां बच्चों को जमीन में नहीं बल्कि पेड़ के भीतर दफनाया जाता है. सुनने में यह डरावना लग सकता है, लेकिन स्थानीय लोगों के लिए यह प्रकृति और आत्मा के बीच जुड़ाव का प्रतीक है.

इंडोनेशिया और उसकी अनोखी सांस्कृतिक परंपराएं

इंडोनेशिया दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम-बहुल देश है, लेकिन यहां सैकड़ों जनजातियां और संस्कृतियां रहती हैं. दक्षिण सुलावेसी प्रांत की तोराजा जनजाति अपनी अनोखी अंतिम संस्कार परंपराओं के लिए जानी जाती है. यह परंपराएं धर्म से अधिक स्थानीय आस्था और प्रकृति से जुड़ी मान्यताओं पर आधारित हैं, इसलिए इन्हें समझने के लिए सामाजिक संदर्भ जरूरी है.

बच्चों को पेड़ में दफनाने की परंपरा

तोराजा समुदाय में यदि किसी बच्चे की मृत्यु दांत निकलने से पहले हो जाती है, तो उसे जमीन में दफन नहीं किया जाता है. गांव के लोग एक बड़े पेड़ के तने में छेद बनाते हैं और बच्चे के शरीर को कपड़े में लपेटकर उस गड्ढे में रख देते हैं. इसके बाद उस स्थान को ताड़ के पेड़ से बने फाइबर से बंद कर दिया जाता है. समय के साथ पेड़ बढ़ता है और वह गड्ढा अपने आप भर जाता है.

इसके पीछे क्या है मान्यता

स्थानीय लोगों का मानना है कि ऐसे बच्चों की आत्मा बेहद पवित्र होती है. पेड़ में दफनाने से हवा और प्रकृति उस आत्मा को अपने साथ बहा ले जाती है. उनके विश्वास के अनुसार, इस प्रक्रिया से बच्चे की आत्मा सीधे प्रकृति की गोद में समा जाती है. इसलिए इसे मृत्यु नहीं, बल्कि जीवन के एक नए रूप में लौटना माना जाता है.

क्या यह परंपरा डरावनी है

बाहरी लोगों को यह परंपरा भयावह लग सकती है, क्योंकि पेड़ों में बने गड्ढे और वहां का माहौल रहस्यमय दिखाई देता है, लेकिन स्थानीय समुदाय इसे सम्मान और श्रद्धा के साथ निभाता है. उनके लिए यह शोक नहीं, बल्कि आत्मा की शांति का मार्ग है. यही वजह है कि इस परंपरा को वे भयानक नहीं, बल्कि पवित्र मानते हैं.

वयस्कों के लिए अलग रिवाज

तोराजा समुदाय में वयस्कों और युवाओं के लिए अंतिम संस्कार की प्रक्रिया अलग होती है. यदि किसी वयस्क की मृत्यु होती है, तो पहले पूर्वजों के शवों को कब्र से बाहर निकाला जाता है. उन्हें नए कपड़े पहनाए जाते हैं और पूरे गांव में घुमाया जाता है. इसके बाद ही नए मृत व्यक्ति को दफनाया जाता है. यह रस्म मृतकों और जीवितों के बीच संबंध बनाए रखने का प्रतीक मानी जाती है.

आधुनिक दौर में परंपरा और पर्यटन

आज के समय में यह परंपरा दुनियाभर के लोगों के लिए जिज्ञासा का विषय बन चुकी है. बड़ी संख्या में पर्यटक तोराजा क्षेत्र में इन रीति-रिवाजों को देखने आते हैं. हालांकि स्थानीय प्रशासन और समुदाय इस बात का ध्यान रखते हैं कि इन परंपराओं का प्रदर्शन सम्मान के साथ हो, न कि सनसनी के रूप में.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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