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Truth of Grass Bread: कैसे बनाई जाती है घास की रोटी, जिसे खाकर महाराणा प्रताप ने दिखाई थी वीरता?

Truth of Grass Bread: हल्दीघाटी युद्ध के बाद महाराणा प्रताप ने जंगलों में कठिन जीवन बिताया. घास की रोटी से जुड़ी कहानी, उनके संघर्ष, स्वाभिमान और त्याग की प्रेरणादायक गाथा को दर्शाती है.

Truth of Grass Bread: महाराणा प्रताप की बहादुरी के किस्से तो आपने सुने ही होंगे. यह भी सुना होगा कि अकबर से युद्ध के दौरान उन्होंने घास से बनी रोटियां खाई थीं. दरअसल, साल 1576 के दौरान हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप का सामना अकबर की सेना से हुआ था, जो महाराणा की सेना से चार गुनी थी. जब महाराणा प्रताप युद्ध हारने लगे, तब उन्होंने एक बड़ा फैसला लिया. उन्होंने प्रजा की भलाई के लिए अरावली के घने जंगल में जाने का फैसला कर लिया. माना जाता है कि जब महाराणा प्रताप अपने परिवार के साथ जंगल में दिन काट रहे थे, उस दौरान उनके पास न रहने के लिए छत थी और न ही खाने के लिए खाना. उस दौरान उन्होंने घास की बनी रोटी खाकर गुजारा किया था. 

जंगलों में संघर्ष भरा जीवन

यह वही समय था, जब उनके छोटे बेटे अमर सिंह के साथ एक दिल छू लेने वाली घटना हुई.  एक दिन छोटे अमर सिंह घास की रोटी खा रहे थे, तभी अचानक एक जंगली बिल्ला उनके हाथ से रोटी छीनकर भाग गया. भूख से तड़पता मासूम बेटा डर और भूख से रोने लगा. यह नजारा देखकर महाराणा प्रताप का दिल टूट गया.  एक ऐसा पिता जो खुद को कभी झुकने नहीं देता था, अपने बेटे की यह हालत देखकर भीतर से हिल गया.

इस पर उन्होंने सोचा कि वे अकबर को माफीनामा लिखकर माफी मांग लेंगे, लेकिन तभी अकबर के दरबारी कवि पृथ्वीराज राठौड़, जो खुद राजपूत थे. उन्होंने महाराणा प्रताप को एक कविता लिखकर भेजी, जिसे पढ़कर महाराज को अपनी प्रतिज्ञा और स्वाभिमान याद आ गया. और उन्होंने उस माफीनामे को पढ़कर फेंक दिया और कभी किसी के सामने न झुकने का प्रण लिया. इसलिए आज के दौर में महाराणा प्रताप को मिसाल की तरह याद किया जाता है. 

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क्या सच में घास से बनती थी रोटी?

अब सवाल यह है कि आखिर घास की रोटी बनती कैसे थी? दरअसल, यह रोटी सच में घास से नहीं, बल्कि फिकार और समई नाम के मोटे अनाज से बनाई जाती थी, जो बाजरे जैसा ही अनाज था. इसके अलावा कोदो, कुटकी, रागी और मांडवा जैसे अनाज भी इसमें मिलाए जाते थे. सबसे पहले इन अनाज को सुखाकर साफ किया जाता था, फिर इन्हें पीसकर मोटा आटा तैयार किया जाता था. यह आटा गेहूं के आटे जैसा मुलायम नहीं होता था, इसलिए इसे बेलन से बेलना मुश्किल होता था. ऐसे में लोग हाथों से ही थपथपा-थपथपा कर इसकी छोटी-छोटी रोटियां बनाते थे.

फिर इन्हें सीधे आग पर पका लिया जाता था. खास बात यह थी कि फिकार जैसे अनाज की फसल सिर्फ साठ दिन में तैयार हो जाती थी और इसे कई साल तक मिट्टी के मटकों में बंद करके रखा जा सकता था, ताकि सूखे और अकाल के समय में भी परिवार का पेट भरा जा सके. जंगलों में भटकते हुए महाराणा प्रताप और उनकी सेना के लिए यही मोटी और सख्त रोटी जीवन जीने का सहारा बनी थी.

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