भूटान इतना छोटा देश, फिर भारत को बिजली कैसे बेचता है? जानें यहां
भूटान हिमालयी इलाके में बसा है. यहां पहाड़ी रास्ते से होकर कई नदियां तेजी से बहती हैं. इन नदियों में बारिश, पिघलती बर्फ और ग्लेशियर से पानी आता है. इससे हाइड्रो पावर बनाने के हालात बनते हैं.

- भूटान नदियों और कम घरेलू खपत से बिजली का बड़ा निर्यातक बना।
- भारत की आर्थिक व तकनीकी सहायता से पनबिजली परियोजनाएं विकसित हुईं।
- यह निर्यात भूटान की आय और भारत की स्वच्छ ऊर्जा मांग पूरी करता है।
भूटान भले ही भौगोलिक क्षेत्रफल और आबादी के मामले में छोटा हो लेकिन यह हाइड्रोपावर के एक जरूरी उत्पादक और निर्यातक के तौर पर उभरा है. पहाड़ी इलाका, ढेर सारी नदी और देश के अंदर बिजली की कम मांग इसे एक खास फायदा देती है. भारत की आर्थिक और तकनीकी मदद से भूटान ने कई बड़े हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट बनाए हैं और बची हुई बिजली भारत को बेचता है. इससे दोनों पड़ोसियों के बीच आपसी फायदे वाली साझेदारी बनी है.
भूटान की नदी उसकी सबसे बड़ी ताकत
भूटान हिमालयी इलाके में बसा है. यहां पहाड़ी रास्ते से होकर कई नदियां तेजी से बहती हैं. इन नदियों में बारिश, पिघलती बर्फ और ग्लेशियर से पानी आता है. इससे हाइड्रो पावर बनाने के लिए बेहतरीन हालात बनते हैं. भूटान की कुल हाइड्रो पावर क्षमता का अनुमान लगभग 30000 मेगावाट है. यह जल संसाधनों को देश की सबसे कीमती प्राकृतिक संपत्तियों में से एक बनाता है.

देश के अंदर बिजली की मांग काफी कम
भूटान की आबादी 8 लाख से भी कम है. साथ ही देश में बड़े पैमाने पर ऐसे भारी उद्योग नहीं हैं जिन्हें काफी ज्यादा बिजली की जरूरत हो. यही वजह है कि इसकी नदियों से जितनी बिजली बन सकती है उसके मुकाबले देश के अंदर बिजली की जरूरत काफी कम है. जब भी बड़े हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट पूरी क्षमता से काम करते हैं तो बिजली बच जाती है. इस बिजली को बेकार जाने देने के बजाय भूटान इसे भारत को एक्सपोर्ट करता है.
भारत के सहयोग से बड़े प्रोजेक्ट मुमकिन हुए
बड़े हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट बनाने के लिए काफी ज्यादा पैसे के निवेश, एडवांस्ड इंजीनियरिंग और तकनीकी जानकारी की जरूरत होती है. भूटान को 1960 के दशक से ही इन क्षेत्रों में भारत से काफी मदद मिली है.
भारत सरकार ने ग्रांट और कम ब्याज वाले लोन के जरिए आर्थिक मदद दी है. साथ ही हाइड्रो पावर इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के लिए तकनीकी मदद भी दी है. इस सहयोग ने भूटान को अपनी नदी को आर्थिक कमाई का एक बड़ा जरिया बनाने में मदद की.
प्रमुख हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट
भारत की मदद से भूटान में कई बड़े हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट बनाए गए हैं. इनमें चुखा, ताला, मांगदेछु और पुनातसांगछु II शामिल हैं. इन प्रोजेक्ट ने भूटान की बिजली बनाने की क्षमता को काफी बढ़ाया है. साथ ही भारत को बची हुई बिजली एक्सपोर्ट करने की उसकी ताकत को मजबूत किया है.
हाल ही में 570 मेगावाट के एक प्रोजेक्ट के विकास के लिए अडानी पावर और भूटान की सरकारी कंपनी के बीच लगभग ₹6000 करोड़ का एक बड़ा समझौता हुआ, इससे हाइड्रो पावर क्षेत्र में सहयोग और बढ़ा है.

भूटान के लिए बिजली का एक्सपोर्ट काफी जरूरी है
भूटान के लिए हाइड्रो पावर सिर्फ ऊर्जा का स्रोत नहीं है बल्कि उससे काफी ज्यादा है. भारत को बिजली का एक्सपोर्ट देश के लिए व्यावसायिक इनकम का एक बड़ा जरिया है. बिजली की बिक्री से होने वाली कमाई भूटान के आर्थिक विकास में योगदान देती है. साथ ही देश के अलग-अलग विकास कार्यों के लिए फंड जुटाने में मदद करती है.
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भारत को भी भूटान की बिजली से फायदा होता है
यह रिश्ता एक तरफा नहीं है. भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और वहां बिजली की मांग काफी ज्यादा है और लगातार बढ़ रही है. भूटान से हाइड्रो पावर इंपोर्ट करने से भारत को देश में ही सारी बिजली पैदा किए बिना अतिरिक्त बिजली मिल जाती है. कोयले से चलने वाले थर्मल पावर प्लांट से बनने वाली बिजली के उलट भूटान की हाइड्रो पावर साफ और नवीकरणीय होती है. इस वजह से हाइड्रो पावर का ज्यादा इस्तेमाल भारत को अपनी नवीकरणीय ऊर्जा की आपूर्ति बढ़ाने और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को कम करने में मदद कर सकता है.
भूटान का बिजली निर्यात दिखाता है कि कैसे प्राकृतिक संसाधन और क्षेत्रीय सहयोग एक दूसरे के पूरक हो सकते हैं. भूटान नदिया और हाइड्रो पावर की क्षमता उपलब्ध कराता है पर भारत का वित्तीय सहयोग, तकनीकी विशेषज्ञता और बिजली का बड़ा बाजार उस क्षमता को आर्थिक मूल्य में बदलने में मदद करता है.
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