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कोई करेंसी कैसे बनती है ग्लोबल, इसके लिए कौन देता है परमीशन?

कोई करेंसी किसी आदेश से नहीं, बल्कि भरोसे और मजबूती से ग्लोबल बनती है. वैश्विक व्यापार और आर्थिक ताकत किसी मुद्रा की असली पहचान ही तय करती है. आइए जानें कि इसके लिए परमिशन कौन देता है.

जब हम डॉलर, यूरो या येन का नाम सुनते हैं, तो मन में एक सवाल जरूर उठता है कि आखिर कुछ ही करेंसी पूरी दुनिया में कैसे चलने लगती हैं. क्या इसके लिए किसी वैश्विक संस्था से इजाजत लेनी पड़ती है या फिर यह अपने आप होता है? क्या कोई भी देश अपनी मुद्रा को अंतरराष्ट्रीय बना सकता है? आइए इन सवालों के जवाब जानें.

ग्लोबल करेंसी का मतलब क्या होता है?

जब किसी देश की मुद्रा का इस्तेमाल सिर्फ उसी देश तक सीमित न रहकर दूसरे देशों में भी होने लगे, तो उसे ग्लोबल या अंतरराष्ट्रीय करेंसी कहा जाता है. ऐसी करेंसी से देशों के बीच व्यापार होता है, निवेश किया जाता है और केंद्रीय बैंक इसे अपने विदेशी मुद्रा भंडार में रखते हैं. अमेरिकी डॉलर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जो दुनिया के ज्यादातर व्यापार और लेन-देन में इस्तेमाल होता है.

कोई करेंसी ग्लोबल कैसे बनती है?

कोई भी करेंसी अचानक अंतरराष्ट्रीय नहीं बन जाती. इसके पीछे उस देश की मजबूत और स्थिर अर्थव्यवस्था सबसे बड़ा कारण होती है. जिस देश का आर्थिक आकार बड़ा होता है, महंगाई काबू में रहती है और नीतियां भरोसेमंद होती हैं, उसकी मुद्रा पर दुनिया को भरोसा होता है. इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय व्यापार में उस करेंसी का ज्यादा इस्तेमाल होना जरूरी है, ताकि दूसरे देश उसे स्वीकार करें.

खुले बाजार की अहम भूमिका

ग्लोबल करेंसी बनने के लिए देश के वित्तीय बाजार खुले और पारदर्शी होने चाहिए. विदेशी निवेशक बिना डर के उस देश में पैसा लगा सकें और जरूरत पड़ने पर निकाल भी सकें. अगर किसी करेंसी पर ज्यादा नियंत्रण, पाबंदी या अनिश्चितता होती है, तो वैश्विक निवेशक उससे दूरी बना लेते हैं. यही वजह है कि मजबूत बैंकिंग सिस्टम और साफ नियम बेहद जरूरी होते हैं.

रिजर्व करेंसी क्यों बनती है खास?

जब दूसरे देशों के केंद्रीय बैंक किसी मुद्रा को अपने विदेशी मुद्रा भंडार में रखने लगते हैं, तो वह रिजर्व करेंसी कहलाती है. इसका मतलब है कि उस करेंसी पर लंबी अवधि का भरोसा है. आज दुनिया के ज्यादातर केंद्रीय बैंक अमेरिकी डॉलर, यूरो, जापानी येन और ब्रिटिश पाउंड को रिजर्व के तौर पर रखते हैं.

परमीशन कौन देता है?

अक्सर लोग सोचते हैं कि किसी करेंसी को ग्लोबल बनाने के लिए आईएमएफ या विश्व बैंक से परमीशन लेनी पड़ती है, लेकिन हकीकत यह है कि कोई भी संस्था इसके लिए सीधी इजाजत नहीं देती है. यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, जो बाजार, व्यापार और भरोसे से तय होती है. हां, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी IMF अपनी एसडीआर टोकरी में कुछ प्रमुख मुद्राओं को शामिल करता है, जिससे उन्हें वैश्विक पहचान मिलती है.

आईएमएफ की भूमिका क्या है?

आईएमएफ दुनिया की प्रमुख मुद्राओं को एसडीआर यानी स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स में शामिल करता है. इसमें वही करेंसी आती हैं, जिनका अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्त में बड़ा इस्तेमाल होता है. डॉलर, यूरो, येन और चीनी युआन इसका हिस्सा हैं. हालांकि यह मान्यता भी तब मिलती है, जब मुद्रा पहले से वैश्विक भरोसा बना चुकी हो.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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